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CM के गढ़ में रोजगार पर संकट! फैक्ट्रियां सील, हजारों मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का सवाल
Rajasthan News: राजस्थान की राजधानी जयपुर का सांगानेर इलाका अपने पारंपरिक रंगाई-छपाई और विश्व प्रसिद्ध सांगानेरी प्रिंट के लिए मशहूर है. यह उद्योग न सिर्फ प्रदेश की पहचान है बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका का भी प्रमुख आधार है. लेकिन इन दिनों सांगानेर का कपड़ा उद्योग गंभीर संकटों से गुजर रहा है. दरअसल, प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े नियमों के तहत प्रशासन की कार्रवाई में 100 से अधिक कपड़ा फैक्ट्रियों को सील कर दिया गया है. इससे उद्योग से जुड़े व्यापारियों, फैक्ट्री मालिकों और हजारों मजदूरों के सामने रोजगार का बड़ा संकट खड़ा हो चुका है.
सांगानेर में रंगाई, छपाई, धुलाई, स्पिनिंग, जिनिंग और कपड़ा प्रोसेसिंग से जुड़ी करीब 2500 इकाइयां चलती हैं. इन उद्योगों से बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के अलावा, उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों से आए मजदूर भी रोजगार प्राप्त करते हैं. लेकिन हाल ही में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रशासन की कार्रवाई के बाद पूरे क्षेत्र में भय और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है.
100 से ज्यादा फैक्ट्रियां हुईं सील
फैक्ट्री संचालकों का मानना है कि प्रदूषण फैलाने के आरोप में इस इलाके की 100 से ज्यादा फैक्ट्रियों को सील कर दिया गया है, जबकि कई अन्य फैक्ट्रियों के बिजली और पानी के कनेक्शन भी काट दिए गए हैं. उन सभी का आरोप है कि ये कार्रवाई अचानक की गई थी और कई मामलों में पहले से कोई ऑफिशियल नोटिस तक नहीं दिया गया था. कई फैक्ट्रियों में उस समय उत्पादन जारी था, जिसके कारण अधूरा तैयार माल मशीनों में ही फंसा हुआ रह गया है. ऐसे में वह सामान भी खराब हो गया है और मशीनों के भी खराब होने की संभावना बढ़ गई है. कपड़ा उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि इस कार्रवाई से फैक्ट्री मालिकों को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है. जिन उद्यमियों ने बैंक से लोन लेकर फैक्ट्री शुरू की थी, उनके सामने अब किस्तें चुकाने का भी संकट खड़ा हो चुका है.
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कॉमन ट्रीटमेंट प्लांट बना बड़ी समस्या
फैक्ट्री संचालकों के अनुसार, सरकार ने सालों पहले रंगाई-छपाई उद्योगों के लिए कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) बनाया था ताकि फैक्ट्रियों से निकलने वाले दूषित पानी का परीक्षण किया जा सके. लेकिन समय के साथ उद्योगों का विस्तार होता गया, जबकि ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता नहीं बढ़ाई गई.
आखिर क्यों नहीं जुड़ पाई फैक्ट्रियां?
उद्योग संघ के अनुसार, एसोसिएशन के करीब 892 सदस्य हैं लेकिन वर्तमान प्लांट से सिर्फ 156 इकाइयां ही जुड़ सकी हैं. बाकी उद्योगों को जोड़ने के लिए न तो नए प्लांट बनाए गए और न ही मौजूदा क्षमता का विस्तार किया गया. ऐसे में कई फैक्ट्रियां तकनीकी कारणों से प्लांट से नहीं जुड़ पा रही हैं.
मजदूरों पर सबसे ज्यादा असर
फैक्ट्रियों में ताला लगने का सबसे बड़ा असर मजदूरों पर पड़ा है. मजदूरों का कहना है कि फैक्ट्री बंद होने से उनकी रोज-रोटी रुक गई है. उत्तर प्रदेश और बिहार से आए मजदूरों के सामने परिवार का खर्च संभालना भी अब मुश्किल हो गया है. कुछ मजदूर वापस अपने गांव लौटने लगे हैं, जबकि कई लोगों के सामने दो समय की रोटी का भी बंदोबस्त करने का संकट खड़ा हो गया है.
कपड़ाउद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो हजारों लोगों का रोजगार प्रभावित हो चुका है और सांगानेर का पारंपरिक कपड़ा उद्योग भी गंभीर संकट में आ चुका है.
व्यापारियों ने सरकार से लगाई गुहार
फैक्ट्री संचालकों और उद्योग संगठन लगातार सरकार से राहत की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि वे प्रदूषण नियंत्रण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सरकार पहले आवश्यक आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराए. उनका सुझाव है कि या तो नया ट्रीटमेंट प्लांट बनाया जाए या मौजूदा प्लांट की क्षमता बढ़ाई जाए, ताकि सभी इकाइयों को इससे जोड़ा जा सके. उद्योग से जुड़े लोगों का यह भी आरोप है कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए सीधे फैक्ट्रियों को सील करना उचित नहीं है. उनका कहना है कि इससे उद्योग और रोजगार दोनों पर गहरा असर पड़ रहा है.
पर्यावरण और रोजगार के बीच संतुलन की चुनौती
सांगानेर का यह विवाद सिर्फफैक्ट्रियों पर हुई कार्रवाई तक सीमित नहीं है. यह मामला पर्यावरण संरक्षण और लाखों लोगों के रोजगार के बीच संतुलन बनाने की चुनौती भी बन गया है. एक ओर प्रदूषण नियंत्रण जरूरी है, वहीं दूसरी ओर हजारों परिवारों की आजीविका भी इसी उद्योग पर निर्भर है. अब सभी लोगों की निगाहें राज्य की भजनलाल सरकार पर टिकी हुई हैं. उद्योग जगत को उम्मीद है कि सरकार प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का पालन सुनिश्चित करते हुए ऐसा समाधान निकालेगी, जिससे पर्यावरण भी सुरक्षित रहे और सांगानेर के पारंपरिक कपड़ा उद्योग तथा उससे जुड़े हजारों लोगों का रोजगार भी बचाया जा सके.
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