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पंजाब पुलिस को बड़ी सफलता! मलेशिया से डिपोर्ट किए गए बंबीहा गैंग के 3 मोस्ट वांटेड गैंगस्टर गिरफ्तार, ISI कनेक्शन का खुलासा!

संगठित अपराध और विदेशों में बैठकर गैंग चलाने वाले अपराधियों के खिलाफ पंजाब पुलिस को एक और बड़ी कामयाबी मिली है। कुख्यात दविंदर बंबीहा गैंग (Davinder Bambiha Gang) से जुड़े 3 मोस्ट वांटेड गैंगस्टरों को मलेशिया से डिपोर्ट (Deported) करवाकर भारत वापस लाया गया है। जैसे ही तीनों आरोपी नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी इंटरनेशनल (IGI) एयरपोर्ट पहुँचे, पंजाब पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों की संयुक्त टीम ने उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया।
 
इन तीनों आरोपियों की पहचान जसप्रीत सिंह उर्फ ​​जस बेहबल, अजय सिंह और पवनदीप सिंह के तौर पर हुई है। पंजाब में हत्या, जबरन वसूली, विस्फोटक रखने और अन्य गंभीर अपराधों के मामलों में इनकी तलाश थी।

बंबीहा गैंग के तीन कथित सदस्य वापस लाए गए
ये तीनों व्यक्ति दविंदर बंबीहा गैंग से जुड़े होने के आरोपी हैं और मलेशिया में छिपे हुए थे। केंद्रीय एजेंसियों के सहयोग से OFTEC के नेतृत्व में चलाए गए ऑपरेशन के तहत उन्हें उस देश से डिपोर्ट करके भारत लाया गया। आरोपियों की तलाश पंजाब में कई गंभीर आपराधिक मामलों के सिलसिले में थी। उन पर लुधियाना में हैंड ग्रेनेड धमाका करने की साजिश में शामिल होने का भी आरोप है।
 

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पाकिस्तान की ISI से कनेक्शन की जांच
मामलों की जांच से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से भी कनेक्शन का संकेत मिला है। इन तीनों आरोपियों के खिलाफ चल रहे मामलों में ये कथित कनेक्शन भी शामिल हैं।

मलेशिया से डिपोर्ट किए जाने के बाद, नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पहुंचते ही तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया।
 

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पंजाब पुलिस अब तीनों आरोपियों को पूछताछ और मामलों की आगे की जांच के लिए पंजाब ले जाएगी, साथ ही संगठित अपराध नेटवर्क से उनके कथित संबंधों की भी जांच की जाएगी।

विदेशों में छिपे गैंगस्टरों और सीमा पार काम करने वाले संगठित अपराध नेटवर्क के खिलाफ पुलिस की कोशिशों में इस ऑपरेशन को एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है।

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Supreme Court छात्र प्रदर्शन मामले में जांच समिति गठित करेगी, FIR रद्द करने पर विचार

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वह दिल्ली में प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों के खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादती तथा पुलिसकर्मियों के विरूद्ध हिंसा के आरोपों की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करेगी जिसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीश, एक पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एवं केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के एक पूर्व निदेशक शामिल होंगे। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि शीर्ष अदालत संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करके उन प्राथमिकियों को रद्द करने पर विचार करेगी, जिनमें कोई विवाद या संदेह नहीं है और जो स्पष्ट रूप से छात्रों से जुड़ी हैं। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि सभी को संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत छात्रों के अधिकारों का ध्यान रखना चाहिए और रेखांकित किया कि शांतिपूर्ण विरोध करने या असहमति जताने के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।

पीठ ने कहा कि समिति में शामिल किए जाने वाले अन्य सदस्यों के बारे में अलग-अलग पक्षों से सुझाव मिलने के बाद उसके गठन का आदेश बुधवार को जारी किया जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस उच्चस्तरीय समिति को तथ्यों का पता लगाने का काम सौंपा जाएगा और उसे सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध करायी जायेंगी। कई याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने पीठ को बताया कि विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने की वजह से अधिकारियों और आम लोगों द्वारा उनके मुवक्किलों को निशाना बनाया जा रहा है।

इस पर शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘हमें पूरा भरोसा है कि समिति उसके पास आने वाले किसी भी पीड़ित की बात तत्काल सुनेगी और उसे अपनी बात रखने का मौका देगी। हम समिति की ओर से समय-समय पर की जाने वाली सिफारिशों का इंतजार करेंगे और उसके बाद जरूरी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।’’ शीर्ष अदालत ने कहा कि समिति महिला प्रदर्शनकारियों के साथ यौन उत्पीड़न और ऑनलाइन उत्पीड़न तथा सोशल मीडिया के जरिए अन्य कमज़ोर लोगों को परेशान किए जाने के आरोपों की भी जांच करेगी। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘जो भी इसके लिए जिम्मेदार है, उसके लिए कोई बहाना नहीं चलेगा और न ही किसी भी रूप में उसे सही ठहराया जायेगा।

इसे गंभीरता से लिया जाए और मामले को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जाए। इसीलिए हम एक उच्चस्तरीय समिति बना रहे हैं। समिति इन मामलों के हर पहलू की जांच करेगी।’’ उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि समिति उन महिला प्रदर्शनकारियों की शिकायतों और आरोपों की भी जांच करेगी, जिन्हें कथित तौर पर दिल्ली और अन्य इलाकों में विरोध मार्च के दौरान निशाना बनाया गया था।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि वह दिल्ली में 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा के वीडियो फुटेज और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति को सौंपने का निर्देश देगी। पीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी जिनमें कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में हुए आंदोलन के दौरान छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोप लगाए गए थे। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से उन प्राथमिकी की जानकारी मांगी जिनमें छात्र प्रदर्शनकारियों को आरोपी बनाया गया है और जिन्हें रद्द किया जाना है।

इससे संकेत मिलता है कि शीर्ष अदालत संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सकती है। पीठ ने बिना माफी छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले रद्द करने का विरोध कर रहे एक वकील से कहा, ‘‘छात्रों का भविष्य दांव पर है। हमें इस पर विचार करना होगा।

उनका पूरा भविष्य सामने है। उन्हें अनुच्छेद 19 के तहत प्रदर्शन करने का अधिकार है।’’ मेहता ने कहा कि पुलिस ने 2,800 से अधिक ऐसे ‘‘असामाजिक तत्वों’’ की पहचान की है जो पहले गंभीर अपराधों में शामिल रहे हैं और 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार थे। हिंसा के कई पीड़ितों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों-- मेनका गुरुस्वामी, वृंदा ग्रोवर और एन. हरिहरन ने कहा कि पुलिस को निगरानी तकनीक, चेहरे की पहचान की तकनीक और दूसरे डिजिटल तरीकों से निगरानी करने की तकनीक का इस्तेमाल करने एवं किसी निजी कंपनी के पास डेटा संभालकर रखने का अधिकार नहीं है, क्योंकि यह लोगों की निजता का उल्लंघन है।

पीठ ने कहा कि ‘चेहरे की पहचान करने वाली प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर ‘निगरानी’, निजता और अनुच्छेद 21 से जुड़े संवैधानिक सवालों पर फ़ैसला आखिरकार न्यायालय ही करेगा, न कि समिति। न्यायालय ने कहा, ‘‘समिति केवल तथ्यों से जुड़े सवालों की जांच करेगी, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या बल का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा किया गया था। समिति की रिपोर्ट के आधार पर, यह अदालत चेहरा पहचान करने वाली प्रौद्योगिकी से जुड़े बड़े कानूनी और संवैधानिक सवालों पर विचार करेगी।’’ मेहता ने साफ किया कि पुलिस जिस चेहरे की पहचान की तकनीक का इस्तेमाल करती है, वह सभी लोगों के चेहरे स्कैन नहीं करती, बल्कि सिर्फ़ उन लोगों की पहचान करती है जो पहले किसी गंभीर अपराध में शामिल रहे हों और जिनका डेटा राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी)के पास मौजूद हो।

उच्चतम न्यायालय ने तीन अगस्त को स्पष्ट किया था कि छात्र प्रदर्शनकारियों को रिहा करने के अपने आदेश में ‘आपराधिक इतिहास’शब्द का अभिप्राय केवल उन लोगों के संदर्भ में था जो गंभीर और जघन्य अपराधों में संलिप्त थे। शीर्ष अदालत ने कहा था कि राज्य कानून के मुताबिक बाकी छात्रों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पर आगे की कार्रवाई बंद कर सकते हैं या वापस ले सकते हैं।

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मेरठ के वीरपाल सिंह 75 साल की उम्र में भी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय दौड़ प्रतियोगिताओं में 100 से अधिक गोल्ड मेडल जीत चुके हैं. वह युवाओं के लिए प्रेरणा बने हुए हैं. बताते हैं कि बचपन में पहलवानी का शौक था. लेकिन जब कक्षा 7 में उन्होंने स्कूल में एडमिशन लिया. तब पीटीआई द्वारा उनकी खेल की दिशा बदलते हुए उन्हें रनिंग से संबंधित क्षेत्र में प्रेक्टिस करने के लिए कहा. इसके पश्चात उन्होंने इसी खेल में आगे बढ़ाने का फैसला लिया. वर्तमान समय में रनिंग से संबंधित क्षेत्र में ही दौड़ लगाकर मेडल ला रहे हैं. Wed, 19 Aug 2026 09:54:10 +0530

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