'यह विपक्ष का आंदोलन नहीं', कांग्रेस सांसद ने ऐसा क्या कहा कि भड़क गए अभिजीत दीपके
सीजेपी चीफ अभिजीत दीपके ने कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के बयान पर भड़कते हुए कहा कि यह आंदोलन विपक्ष का नहीं बल्कि युवाओं और देश का है। इमरान मसूद ने सोनम वांगचुक पर टिप्पणी की थी।
Explainer: क्या सरकार हर सवाल का जवाब देने के लिए बाध्य है? जानिए क्या होता है संसद का प्रश्नकाल
Question Hour in Parliament: देश में संसद का मानसून सत्र चल रहा है और इस दौरान अक्सर खबरों में सुनने को मिलता है कि किसी सांसद ने सरकार से सवाल पूछा या किसी मंत्री ने संसद में जवाब दिया. संसद की कार्यवाही में यह प्रक्रिया प्रश्नकाल (Question Hour) के दौरान होती है. यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है क्योंकि इसी के जरिए सांसद सरकार से सीधे जवाब मांग सकते हैं.
हालांकि, कई बार यह सवाल भी उठता है कि क्या सरकार हर सवाल का जवाब देती है? क्या कोई भी सांसद किसी भी विषय पर प्रश्न पूछ सकता है? और आखिर किन नियमों के आधार पर तय होता है कि कौन-सा सवाल स्वीकार होगा और कौन-सा नहीं? आइए पूरी प्रक्रिया को आसान भाषा में समझते हैं.
संसद में प्रश्नकाल क्या होता है?
संसद की कार्यवाही शुरू होने के बाद लोकसभा की बैठक का पहला घंटा प्रश्नकाल (Question Hour) कहलाता है. इसी समय सांसद अलग-अलग मंत्रालयों से जुड़े जनहित के मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछते हैं.
प्रश्नकाल का उद्देश्य केवल जानकारी लेना नहीं होता, बल्कि सरकार को उसके कामकाज के लिए जवाबदेह बनाना भी होता है. इसी वजह से इसे संसदीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है.
जब किसी मंत्री से सवाल पूछा जाता है, तो उन्हें सदन में उसका जवाब देना होता है. इससे सरकार की नीतियों, योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों पर संसद की निगरानी बनी रहती है.
प्रश्नकाल इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
प्रश्नकाल लोकतंत्र में जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक प्रभावी माध्यम है. इसके जरिए सांसद अपने क्षेत्र और देश से जुड़े मुद्दों को संसद में उठाते हैं. सरकार को योजनाओं की प्रगति, खर्च, नीतियों और फैसलों के बारे में जानकारी देनी पड़ती है. इससे शासन में पारदर्शिता बढ़ती है और जनता के प्रतिनिधि सरकार से सीधे जवाब मांग सकते हैं. यही कारण है कि प्रतियोगी परीक्षाओं और सिविल सेवा की तैयारी में भी प्रश्नकाल से जुड़े सवाल अक्सर पूछे जाते हैं.
संसद में कितने प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं?
संसद में सभी सवाल एक जैसे नहीं होते. नियमों के अनुसार प्रश्न मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं.
- तारांकित प्रश्न (Starred Question): इसका जवाब संबंधित मंत्री को सदन में मौखिक रूप से देना होता है. जवाब के बाद सांसद पूरक प्रश्न भी पूछ सकते हैं.
- अतारांकित प्रश्न (Unstarred Question): इसका उत्तर लिखित रूप में दिया जाता है. इसमें पूरक प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं होती.
- शॉर्ट नोटिस प्रश्न (Short Notice Question): यदि कोई विषय अत्यंत महत्वपूर्ण और तत्काल जनहित से जुड़ा हो, तो कम समय की सूचना पर भी प्रश्न पूछा जा सकता है.
इन तीनों प्रकार के प्रश्नों का उद्देश्य अलग-अलग परिस्थितियों में सरकार से जानकारी प्राप्त करना होता है.
क्या कोई भी सवाल संसद में पूछा जा सकता है?
नहीं, संसद में सवाल पूछने की पूरी प्रक्रिया नियमों से संचालित होती है. सांसद कोई भी प्रश्न सीधे सदन में नहीं पूछ सकते.
प्रश्न पहले संसद सचिवालय को भेजे जाते हैं. इसके बाद यह देखा जाता है कि वे संसद के नियमों के अनुरूप हैं या नहीं. केवल वही प्रश्न स्वीकार किए जाते हैं जो निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं.
सवाल स्वीकार करने के क्या नियम हैं?
लोकसभा की कार्य-प्रक्रिया और कामकाज संचालन नियमों के तहत प्रश्न स्वीकार करने के लिए कुछ स्पष्ट शर्तें तय की गई हैं.
यदि प्रश्न किसी मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा हो, जनहित का विषय उठाता हो, किसी सरकारी नीति, योजना या प्रशासनिक कार्रवाई से संबंधित हो और उसका उत्तर तथ्यात्मक रूप से दिया जा सकता हो, तो उसे स्वीकार किए जाने की संभावना अधिक होती है.
यदि प्रश्न केवल आंकड़ों या जानकारी से जुड़ा हो, तो उसे सामान्यतः लिखित उत्तर वाले प्रश्न के रूप में लिया जाता है.
सरकार हर सवाल का जवाब क्यों नहीं देती?
यह धारणा सही नहीं है कि सरकार जानबूझकर हर सवाल का जवाब नहीं देती. वास्तव में कई प्रश्न संसद के नियमों के अनुसार स्वीकार ही नहीं किए जाते.
यदि कोई प्रश्न नियमों का पालन नहीं करता, तो उसे सूची में शामिल नहीं किया जाता. इसके अलावा कुछ परिस्थितियों में उत्तर देना संभव भी नहीं होता.
उदाहरण के लिए यदि मामला न्यायालय में विचाराधीन हो, प्रश्न काल्पनिक हो, उसमें आरोप या व्यक्तिगत टिप्पणी हो, या वह किसी विशेष व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला हो, तो ऐसे प्रश्न स्वीकार नहीं किए जाते.
किन सवालों को अस्वीकार किया जा सकता है?
कुछ तरह के प्रश्न संसदीय नियमों के तहत स्वीकार नहीं किए जाते.
यदि प्रश्न में किसी प्रकार का आरोप, तर्क, राय या अनुमान शामिल हो, यदि वह किसी लंबित न्यायिक मामले से जुड़ा हो, यदि उसकी भाषा अपमानजनक हो, यदि उसका उत्तर पहले से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो या प्रश्न बहुत अस्पष्ट हो, तो उसे अस्वीकार किया जा सकता है.
इसी तरह ऐसे प्रश्न भी स्वीकार नहीं किए जाते जिनका उद्देश्य किसी विशेष उत्तर की ओर संकेत करना हो.
प्रश्नकाल में सरकार की जवाबदेही कैसे तय होती है?
जब किसी मंत्री को सदन में खड़े होकर प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता है, तो उन्हें अपने मंत्रालय के कामकाज की पूरी जानकारी रखनी होती है. यदि उत्तर संतोषजनक नहीं होता, तो सांसद पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं और सरकार से अधिक स्पष्ट जवाब मांग सकते हैं. इससे सरकार की कार्यप्रणाली पर लगातार निगरानी बनी रहती है. इसी प्रक्रिया के कारण कई बार प्रशासनिक कमियां सामने आती हैं और सरकार को सुधारात्मक कदम उठाने पड़ते हैं.
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प्रश्नकाल और शून्यकाल में क्या अंतर है?
संसद की कार्यवाही की शुरुआत आमतौर पर प्रश्नकाल से होती है. इस दौरान सांसद सरकार से अलग-अलग मुद्दों पर सवाल पूछते हैं और मंत्री उनके जवाब देते हैं. इसके बाद दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक का समय शून्यकाल कहलाता है. शून्यकाल भारत की संसदीय व्यवस्था की एक खास परंपरा है और इसका उल्लेख संसद के नियमों में नहीं है. इस दौरान सांसद बिना पहले से तय एजेंडे के जनता से जुड़े जरूरी और तत्काल मुद्दे सदन में उठा सकते हैं. चूंकि यह समय ठीक 12 बजे शुरू होता है, इसलिए इसे शून्यकाल (Zero Hour) कहा जाता है.
प्रश्नकाल और लोकतंत्र का क्या संबंध है?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है और संसद जनता का प्रतिनिधित्व करती है. प्रश्नकाल इस जवाबदेही को व्यवहारिक रूप देता है.
सांसद अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याएं, सरकारी योजनाओं की स्थिति, सार्वजनिक खर्च, कानून-व्यवस्था और अन्य जनहित के विषय सीधे संसद में उठा सकते हैं. इससे सरकार को अपने फैसलों और नीतियों का स्पष्टीकरण देना पड़ता है. यही कारण है कि प्रश्नकाल को संसद की सबसे प्रभावशाली प्रक्रियाओं में गिना जाता है.
प्रश्नकाल भारतीय संसद की एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जिसके माध्यम से सांसद सरकार से जनहित के मुद्दों पर जवाब मांगते हैं. हालांकि हर प्रश्न स्वीकार नहीं किया जाता, क्योंकि इसके लिए संसद के निर्धारित नियमों का पालन करना जरूरी होता है. प्रश्नों की जांच, उनकी स्वीकार्यता और उत्तर देने की प्रक्रिया पूरी तरह संसदीय नियमों के अनुसार चलती है. यही व्यवस्था सरकार को जवाबदेह बनाती है, शासन में पारदर्शिता बढ़ाती है और लोकतंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
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