Right to Fly National Flag: आजादी के पांच दशक बाद तक आम नागरिकों को नहीं थी तिरंगा फहराने की छूट; जानिए कैसे मिला यह अधिकार
देशभर में स्वतंत्रता दिवस का उल्लास है और केंद्र सरकार के 'हर घर तिरंगा' अभियान के तहत करोड़ों नागरिक अपने घरों पर शान से राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहे हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 1947 में देश के आजाद होने के बाद करीब 50 वर्षों तक आम नागरिकों को अपनी मर्जी से रोजाना तिरंगा फहराने की इजाजत नहीं थी। तत्कालीन नियमों और फ्लैग कोड के सख्त प्रतिबंधों के कारण केवल गिने-चुने राष्ट्रीय पर्वों पर ही आम जनता को झंडा फहराने की अनुमति दी गई थी।
आजादी के बाद क्यों लगाई गई थी आम जनता पर पाबंदी
वर्ष 1950 में राष्ट्रीय ध्वज के अनावरण और संविधान लागू होने के बाद से ही ध्वज के सम्मान को बनाए रखने के लिए नियम तय किए गए थे। सरकार का मुख्य दृष्टिकोण यह था कि तिरंगे के उपयोग को सीमित रखा जाए ताकि किसी भी तरह से इसका अनादर न हो।
सरकार की आशंका थी कि बिना रोक-टोक छूट देने से इसका व्यावसायिक दुरुपयोग हो सकता है, रैलियों या प्रदर्शनों में अंधाधुंध इस्तेमाल होगा और रख-रखाव में लापरवाही बरती जा सकती है। इसी वजह से देश में यह आम धारणा बन गई कि राष्ट्रीय ध्वज का उपयोग केवल मंत्रियों, सरकारी भवनों और प्रशासनिक कार्यालयों तक ही सीमित है।
फ्लैग कोड की वैधानिक स्थिति और उससे जुड़े नियम
राष्ट्रीय ध्वज के उपयोग को नियमित करने के लिए संसद ने दो मुख्य कानून पारित किए थे- पहला, व्यावसायिक दुरुपयोग रोकने के लिए 'द एम्ब्लेम्स एंड नेम्स (प्रिवेंशन ऑफ इम्प्रॉपर यूज) एक्ट, 1950' और दूसरा, राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को रोकने के लिए 'प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971'। इन कानूनों के अलावा गृह मंत्रालय द्वारा 'फ्लैग कोड' जारी किया गया था।
यह कोड संसद से पारित कानून नहीं था, बल्कि कार्यपालिका के प्रशासनिक दिशा-निर्देशों का एक समूह था। इसके तहत आम नागरिकों, निजी संस्थानों और स्कूलों को केवल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे खास अवसरों पर ही झंडा फहराने की इजाजत थी, जबकि सामान्य दिनों में निजी परिसरों पर झंडा लगाना प्रतिबंधित माना जाता था।
रायगढ़ की फैक्ट्री में फहराया तिरंगा और कमिश्नर की आपत्ति
इस पूरी व्यवस्था को चुनौती तब मिली जब अमेरिका से पढ़ाई पूरी कर लौटे युवा उद्योगपति नवीन जिंदल ने अपने देश में तिरंगा फहराने की पहल की। अमेरिका में पढ़ाई के दौरान यूनिवर्सिटी स्टूडेंट सीनेट के अध्यक्ष रहते हुए उन्हें गर्व से ध्वज फहराने की आदत थी। 1990 के दशक में भारत लौटकर जब उन्होंने तत्कालीन मध्य प्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के रायगढ़ में अपनी फैक्ट्री के कार्यालय परिसर में रोजाना तिरंगा फहराना शुरू किया, तो सितंबर 1994 में बिलासपुर के तत्कालीन डिवीजनल कमिश्नर ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई।
कमिश्नर ने चेतावनी दी कि तत्कालीन फ्लैग कोड के तहत निजी परिसर में झंडा फहराना गैर-कानूनी है और ऐसा करने पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
अदालत की चौखट तक कैसे पहुंचा मामला
अपनी ही मातृभूमि पर अपनी इमारत पर राष्ट्रध्वज न फहरा पाने की पाबंदी नवीन जिंदल को स्वीकार नहीं हुई। उन्होंने पूर्व कानून मंत्री व वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण सहित देश के शीर्ष कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श लिया। कानूनी राय में यह बात सामने आई कि संसद के दोनों कानूनों में कहीं भी सम्मानपूर्वक झंडा फहराने पर रोक नहीं है, बल्कि यह पाबंदी केवल सरकारी प्रशासनिक निर्देशों के जरिए थोपी गई है।
इसके बाद नवीन जिंदल ने दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर फ्लैग कोड के उन कड़े प्रतिबंधों को चुनौती दी जो नागरिकों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने से रोकते थे।
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला और केंद्र सरकार के तर्क
मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि 'द एम्ब्लेम्स एंड नेम्स एक्ट, 1950' की धारा 3 के तहत सरकार को सार्वजनिक स्थानों या इमारतों पर ध्वज के उपयोग को नियंत्रित और प्रतिबंधित करने का पूरा अधिकार है, और यह नीतिगत फैसला अदालतों के दखल से बाहर होना चाहिए।
हालांकि, सितंबर 1995 में दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार के तर्कों को खारिज करते हुए नवीन जिंदल के पक्ष में फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फ्लैग कोड संसद से पारित कानून नहीं बल्कि प्रशासनिक निर्देश है, इसलिए इसके जरिए नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीना नहीं जा सकता। यदि कोई नागरिक देश के किसी वास्तविक कानून का उल्लंघन किए बिना गरिमा के साथ तिरंगा फहराना चाहता है, तो उसे रोका नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और फ्लैग कोड ऑफ इंडिया 2002
दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी। जब यह अपील शीर्ष अदालत में लंबित थी, तब सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े प्रतिबंधों की समीक्षा के लिए अक्टूबर 2000 में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया।
इस समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने 'फ्लैग कोड ऑफ इंडिया, 2002' तैयार किया, जो 26 जनवरी 2002 से देश में प्रभावी हुआ। इस नए कोड के जरिए पहली बार आम नागरिकों, निजी संस्थानों और शैक्षणिक संगठनों को साल के सभी दिनों में मर्यादा के साथ राष्ट्रध्वज फहराने की व्यवहारिक अनुमति मिल गई।
23 जनवरी 2004: सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ का ऐतिहासिक फैसला
रायगढ़ की फैक्ट्री से शुरू हुआ यह संघर्ष करीब एक दशक बाद 23 जनवरी 2004 को अपने अंतिम मुकाम पर पहुंचा। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी.एन. खरे, जस्टिस बृजेश कुमार और जस्टिस एस.बी. सिन्हा की तीन जजों की पीठ ने 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम नवीन जिंदल' मामले में सर्वसम्मति से ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में व्यवस्था दी कि सम्मान और गरिमा के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है, जो कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का एक मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिकार असीमित नहीं है और अनुच्छेद 19(2) तथा राष्ट्रीय सम्मान के संरक्षण से जुड़े कानूनों के तहत इस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लागू रहेंगे।
नियमों में निरंतर बदलाव और 24 घंटे तिरंगा फहराने की आधुनिक छूट
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े नियमों में समय-समय पर बड़े सुधार किए गए। दिसंबर 2021 में सरकार ने फ्लैग कोड में संशोधन कर हाथ से बने खादी के अलावा मशीन से बने और पॉलिएस्टर के झंडों के उपयोग को भी मंजूरी दी। इसके बाद जुलाई 2022 में एक और अहम संशोधन किया गया, जिसके तहत यदि तिरंगा खुले आसमान के नीचे या किसी नागरिक के निजी आवास पर फहराया गया है, तो उसे दिन और रात (24 घंटे) फहराए रखने की अनुमति दे दी गई। आज देश का हर नागरिक जिस गर्व से अपने घर पर तिरंगा लहराता है, उसकी नींव इसी ऐतिहासिक अदालती लड़ाई से जुड़ी हुई है।
Mahua Moitra Circuit House Row: आधी रात सर्किट हाउस खाली करने के आदेश पर भड़कीं महुआ मोइत्रा; बोलीं- 'गोलियों का सामना करूंगी, पीछे नहीं हटूंगी'
पश्चिम बंगाल के कृष्णनगर में तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा को लेकर देर रात भारी राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला। महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया है कि स्थानीय जिला प्रशासन ने उन्हें आधी रात को सर्किट हाउस का कमरा खाली करने का फरमान जारी कर दिया।
सांसद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कई पोस्ट साझा कर पूरे घटनाक्रम का ब्योरा दिया और साफ लफ्जों में कहा कि वे किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेंगी और कमरा खाली नहीं करेंगी।
Huge crowd outside Krishnagar Circuit House shouting “Jai Shree Ram” while district administration calling/messaging me repeatedly to vacate room. Supreme Court asked me to face bullets so here I am … not backing down pic.twitter.com/1o0GmywXg8
— Mahua Moitra (@MahuaMoitra) August 14, 2026
शाम को हुआ था आवंटन, रात 9:47 बजे आया कमरा खाली करने का फरमान
महुआ मोइत्रा के अनुसार, वह शाम 6:30 बजे कृष्णनगर स्थित सर्किट हाउस पहुंची थीं, जहां उन्हें वही नियमित कमरा आवंटित किया गया जिसमें वे आमतौर पर ठहरती हैं। रात 9:20 बजे उन्हें कमरे में भोजन परोसा गया। लेकिन इसके कुछ ही देर बाद यानी रात 9:47 बजे उनके पास अतिरिक्त जिलाधिकारी का फोन आया और कमरा तुरंत खाली करने के लिए कहा गया।
इसके बाद रात 10:52 बजे प्रशासन की तरफ से एक लिखित संदेश और आधिकारिक आदेश भी भेज दिया गया। महुआ ने कहा कि एक महिला सांसद के साथ अपने ही संसदीय क्षेत्र के सरकारी गेस्ट हाउस में इस तरह का बर्ताव बेहद चौंकाने वाला और अस्वीकार्य है।
बाहर नारेबाजी और अंदर प्रशासनिक दबाव, महुआ बोलीं- 'पीछे नहीं हटूंगी'
महुआ मोइत्रा ने सर्किट हाउस का वीडियो साझा करते हुए दावा किया कि मुख्य द्वार के बाहर भारी भीड़ जुटी थी और 'जय श्री राम' व विरोध के नारे लगा रही थी। ऐसे तनावपूर्ण माहौल के बीच प्रशासन लगातार कॉल और मैसेज कर उन पर बाहर निकलने का दबाव बना रहा था।
महुआ ने लिखा कि "सुप्रीम कोर्ट ने मुझसे गोलियों का सामना करने को कहा था, इसलिए मैं यहां डटी हुई हूं और पीछे नहीं हटूंगी।" उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन विपक्षी सांसदों और नेताओं को उनके ही क्षेत्र से बाहर रखने के लिए बेताब है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को किया टैग, उठाया विशेषाधिकार का मुद्दा
महुआ मोइत्रा ने इस मामले में सीधे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को टैग करते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने लिखा कि वे 2029 तक जनता द्वारा चुनी हुई सांसद हैं और लोकसभा का सत्र एक दिन पहले ही समाप्त हुआ है।
सर्किट हाउस सांसदों के लिए आधिकारिक सरकारी आवास की व्यवस्था के तहत आता है, ऐसे में स्थानीय प्रशासन का देर रात ऐसा आदेश देना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है। उन्होंने साफ कर दिया कि उन्होंने प्रशासन के इस मौखिक और लिखित आदेश को मानने से पूरी तरह इनकार कर दिया है।
अखिलेश यादव का सवाल- क्या यह सांसद के विशेषाधिकार का उल्लंघन नहीं?
इस पूरे मामले पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक्स पर महुआ मोइत्रा की पोस्ट को साझा करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से सीधा सवाल किया कि "लोकसभा अध्यक्ष जी स्पष्ट करें कि क्या यह किसी सांसद के विशेषाधिकार का हनन है या नहीं?" अखिलेश यादव के इस बयान के बाद इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं ने भी इसे निर्वाचित जनप्रतिनिधि के अधिकारों पर सीधा हमला करार दिया।
अभिषेक बनर्जी का तीखा वार- महिला सशक्तिकरण की बात करने वालों का दोहरा चेहरा उजागर
तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी इस घटनाक्रम पर बेहद तल्ख टिप्पणी की। अभिषेक बनर्जी ने कहा कि एक महिला सांसद को आधी रात को अंधेरे में सर्किट हाउस से बाहर निकालने का आदेश दिया जा रहा है और अगले ही दिन स्वतंत्रता दिवस के मंच से यही लोग महिला सशक्तिकरण की बातें करेंगे।
उन्होंने कहा कि जो व्यवस्था या सरकार एक महिला जनप्रतिनिधि की गरिमा को राजनीतिक प्रतिशोध का जरिया बनाती है, वह असल में खुद को ही छोटा साबित करती है, न कि उस महिला को जिसे वह अपमानित करने का प्रयास कर रही है।
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