डिजिटल भुगतान में तेज उछाल के बावजूद भारत में चलन में नकदी बढ़ी: आरबीआई डिप्टी गवर्नर
भारत में पिछले एक दशक के दौरान डिजिटल भुगतान को अपनाने में तेज वृद्धि के बावजूद चलन में नकदी में कमी नहीं आई है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों, कम आय वाले समूहों, बुजुर्ग आबादी और छोटे कारोबारों में नकदी का इस्तेमाल बना हुआ है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर शिरीष चंद्र मुर्मु ने यह बयान दिया.
डिप्टी गवर्नर ने 13 अगस्त को जकार्ता में बैंक इंडोनेशिया द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में अपने भाषण के दौरान कहा, "डिजिटल भुगतान के बढ़ते चलन के कारण व्यक्तिगत लेनदेन में नकदी की हिस्सेदारी घटने के बावजूद, चलन में मुद्रा दोहरे अंकों की दर से बढ़ रही है. इस संयोजन के कारण भविष्य की मांग का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है, जिससे उत्पादन और वितरण क्षमता की हमारी योजना और जटिल हो जाती है."
उन्होंने कहा, "भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी भुगतान का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है और साफ-सुथरे नोटों, सुरक्षित लॉजिस्टिक्स और ऐसे मुद्रा तंत्र के जरिए नकदी में लोगों का भरोसा बनाए रखना, जिस पर वे निर्भर कर सकें, मौद्रिक संप्रभुता को बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है. यह ऐसा लक्ष्य है, जिसे सभी देशों के केंद्रीय बैंक साझा करते हैं, चाहे उनकी अर्थव्यवस्थाएं नकदी और डिजिटल भुगतान के किसी भी मिश्रण को अपनाएं."
डिप्टी गवर्नर ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में आरबीआई ने छह मूल्यवर्गों में हर साल 28 से 30 अरब बैंक नोटों का उत्पादन किया है और लगभग 21 अरब नोटों को हर साल चलन से हटा दिया है. फिलहाल भारत में 176 अरब बैंक नोट चलन में हैं. तुलना के लिए, पिछले साल के अंत में लगभग 56 अरब अमेरिकी डॉलर के नोट और 30 अरब यूरो के बैंक नोट चलन में थे.
मुर्मू ने कहा, "तुलना के लिहाज से एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हमारे आंकड़ों पर कुछ हद तक कम मूल्यवर्ग वाले नोटों की अधिक हिस्सेदारी का असर पड़ता है. इसका स्वाभाविक अर्थ है कि समान मूल्य के लेनदेन के लिए अधिक संख्या में नोट हाथ बदलते हैं. इसके बावजूद, यह मात्रा हमें हर दिन संभाले जाने वाले लॉजिस्टिक्स के पैमाने का अंदाजा देती है."
मुद्रा की टिकाऊपन सुनिश्चित करने के लिए आरबीआई बैंक नोटों की उम्र बढ़ाने के तरीकों पर विचार कर रहा है. इनमें नोट के आधार पर सतही कोटिंग और कम मूल्यवर्ग के लिए पॉलिमर नोट शामिल हैं. नियामक नकदी चक्र के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए भी काम कर रहा है.
उन्होंने कहा कि इसके तहत "दक्षता के लिए अपने वितरण नेटवर्क को बेहतर बनाना और बैंक नोटों के ब्रिकेट्स के निपटान के तरीके में वैल्यू चेन में आगे बढ़ना" शामिल है.
--आईएएनएस
एबीएस
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Explainer: हकीकत या ट्रंप का बड़बोलापन! क्या होर्मुज सच में बन सकता है अमेरिका का इलाका? क्या कहता है अमेरिकी और इंटरनेशनल कानून
Strait of Hormuz: मीडिल ईस्ट में गत फरवरी से जंग चल रही है. ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वजह से शुरू हुआ युद्ध अब होर्मुज पर आकर टिक गया है. ईरान और अमेरिका के बीच होर्मुज को लेकर कई महीनों से स्थिति साफ नहीं हो पा रही है. ईरान होर्मुज पर एकाधिकार चाहता तो वहीं अमेरिका होर्मुज को बिना शर्त सभी के लिए खोलने की मांग पर अड़ा है. इसके लिए अमेरिकी नौसेना ने होर्मुज में नाकाबंदी कर रखी है. इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने होर्मुज को अपना नया इलाका घोषित कर दिया है. ट्रंप ने बकायदा होर्मुज एक नक्शा भी पोस्ट किया है, उसमें लिखा - अमेरिका का नया इलाका!
हालांकि ट्रंप के दावा को अब उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता है. ईरान-इजरायल, रूस-यूक्रेन, भारत-पाकिस्तान, इजरायल-हमास को लेकर कई बार ट्रंप के दावा झूठे साबित हो चुके हैं. हाल ही में उदाहण इजरायल हमास को लेकर है. ट्रंप ने दावा किया था कि हमास लड़ाके हथियार छोड़ने को तैयार हो गए हैं. अब इजरायल की सेना पीछे हटेगी, लेकिन दोनों देशों में फिर हमले हुए. ट्रंप के दामाद कुशनर शांति समझौता कराने गए लेकिन बैठक पूरी फेल साबित हुई. ऐसे प्रमाणों से ट्रंप के ज्यादातर दावे अब हवाहवाई रह गए हैं.
President Donald J. Trump has posted a new image to his Truth Social feed declaring the Strait of Hormuz as a "NEW U.S. Territory". pic.twitter.com/1j9bxJk5N2
— OSINTdefender (@sentdefender) August 18, 2026
ट्रंप का दावा हकीकत या फसाना?
अब सवाल उठता है कि ट्रंप का हमास पर दावा हकीकत है सिर्फ हवा हवाई दावा. मंगलवार को ट्रंप ने ट्रूथ सोशल मीडिया पर एक पोस्ट की. इसमें होर्मुज का नक्शा था. पोस्ट में होर्मुज पर सर्कल करते हुए हाइ लाइट किया गया था. इस पोस्ट में एंग्लिश में लिखा था- New U.S. Territory. यानी अमेरिका का नया इलाका.
इसके अलावा कोई सरकारी अध्यादेश नहीं, कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं, कोई कांग्रेस (अमेरिकी संसद) की सहमति नहीं. साफ है कि अमेरिका किसी भी क्षेत्र को केवल अपने मौखिक बयान, सोशल मीडिया पोस्ट या घोषणा मात्र से अपना इलाका (Territory) घोषित नहीं कर सकता है.
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क्या कहता है अमेरिकी कानून?
अमेरिकी संविधान के तहत किसी नए क्षेत्र या इलाके के प्रशासन और उस पर नियम बनाने की व्यापक शक्ति अमेरिकी कांग्रेस के पास है. संविधान के अनुच्छेद IV, खंड 3, उपखंड 2 के प्रॉपर्टी क्लॉज के तहत कांग्रेस अमेरिकी क्षेत्रों और संपत्तियों के लिए जरूरी कानून और नियम बना सकती है. वहीं, नए राज्यों को अमेरिका में शामिल करने का अधिकार भी कांग्रेस के पास ही है.
कांग्रेस किसी अधिग्रहित क्षेत्र के लिए स्थानीय सरकार बनाने और उसकी प्रशासनिक व्यवस्था तय करने का फैसला कर सकती है. इतिहास में लुइसियाना परचेज जैसे मामलों में भी राष्ट्रपति के समझौते के साथ कांग्रेस की मंजूरी और कानून जरूरी रहा है. यानी राष्ट्रपति अकेले किसी विदेशी क्षेत्र को अमेरिका में शामिल नहीं कर सकते, इसके लिए कांग्रेस की संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया जरूरी होती है.
इन उदाहरणों से समझिए
अमेरिका के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब अमेरिकी कांग्रेस के प्रस्ताव और कानून के जरिए दूसरे इलाकों को अमेरिका में शामिल किया गया. 1845 में कांग्रेस ने एक संयुक्त प्रस्ताव के जरिए तत्कालीन स्वतंत्र टेक्सास गणराज्य को अमेरिका में शामिल किया, जो बाद में एक राज्य बना. इसी तरह 1898 में कांग्रेस ने न्यूलैंड्स रेजोल्यूशन के माध्यम से हवाई को अमेरिका में मिला लिया.
इसके अलावा 1856 के गुआनो आइलैंड्स एक्ट के तहत कांग्रेस ने अमेरिकी नागरिकों को ऐसे वीरान और बिना दावे वाले द्वीपों पर कब्जा करने की अनुमति दी, जहां गुआनो यानी खाद के रूप में इस्तेमाल होने वाला पदार्थ मिलता था. बाद में अमेरिका ने संबंधित द्वीपों को अमेरिकी क्षेत्र घोषित किया.
पारंपरिक तरीके से कब्जा
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) अपनी शुरुआत में केवल 13 ब्रिटिश औपनिवेशिक बस्तियों का एक छोटा सा हिस्सा था, लेकिन समय के साथ इसने विभिन्न तरीकों से अपने क्षेत्र का विस्तार किया और आज यह एक विशाल देश है. ऐतिहासिक रूप से अमेरिका ने संधियों (Treaties) द्वारा जमीन खरीदकर, युद्ध जीतकर या विधिवत समझौतों के जरिए नए इलाकों को अपने अधिकार क्षेत्र में लिया है. किसी भी राष्ट्रपति की अकेली घोषणा से जमीन अमेरिकी संप्रभुता में नहीं आती.
पैसे देकर खरीदना (Purchase):
खरीद (Purchase)- अमेरिका ने पैसों के बदले अन्य यूरोपीय देशों से बड़े-बड़े भूभाग खरीदे
लुइसियाना खरीद (1803): अमेरिका ने फ्रांस से 1.5 करोड़ डॉलर में 'लुइसियाना टेरीटरी' खरीदी, जिससे देश का क्षेत्रफल रातों-रात दोगुना हो गया.
अलास्का (1867): अमेरिका ने रूस से अलास्का को मात्र 72 लाख डॉलर में खरीद लिया था.
2. युद्ध और सैन्य विजय- ताकत के बल पर पड़ोसी देशों या क्षेत्रों को हरा-कर अपने में मिलाया
मैक्सिकन-अमेरिकी युद्ध (1846-1848): मैक्सिको के साथ युद्ध के बाद अमेरिका ने कैलिफोर्निया, न्यू मैक्सिको, यूटा और नेवादा जैसे बड़े क्षेत्र अपने कब्जे में ले लिए (जिसे मैक्सिकन सीशन कहा जाता है).
3. संधियां और कूटनीति (Treaties and Diplomacy)- अन्य महाशक्तियों के साथ समझौतों के जरिए सीमाएं तय कीं और जमीन हासिल की
फ्लोरिडा (1819): स्पेन के साथ 'एडम्स-ओनिस संधि के तहत फ्लोरिडा को अमेरिका को सौंप दिया गया.
ओरेगन क्षेत्र (1846): ब्रिटेन के साथ एक संधि के माध्यम से ओरेगन क्षेत्र का शांतिपूर्ण विभाजन किया गया.
4. विलय और कब्जा (Annexation)- स्वतंत्र गणराज्यों या द्वीपों को राजनीतिक या आंतरिक बगावत के बाद शामिल किया
टेक्सास (1845): टेक्सास ने मैक्सिको से अलग होकर खुद को एक स्वतंत्र गणराज्य घोषित किया था, जिसे बाद में अमेरिका ने अपने अंदर मिला लिया.
हवाई (1898): हवाई की स्थानीय राजशाही को अमेरिकी समर्थित ताकर्ती द्वारा हटाए जाने के बाद इसे मिला लिया गया.
क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून?
अवैध तरीका: बल या धमकी से कब्जा
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक किसी दूसरे देश के इलाके पर सैन्य ताकत, धमकी या आक्रमण के जरिए कब्जा करके उसे अपने देश में मिलाना अवैध है. संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) में किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग या उसकी धमकी पर रोक लगाई गई है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में यह सिद्धांत मजबूत हुआ कि केवल युद्ध जीत लेने या सैन्य कब्जे के आधार पर किसी देश को किसी क्षेत्र पर कानूनी संप्रभुता हासिल नहीं हो सकती. ऐसे कब्जे को अंतरराष्ट्रीय समुदाय आम तौर पर कानूनी मान्यता नहीं देता.
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वैध तरीका: आपसी सहमति से क्षेत्र का हस्तांतरण
अंतरराष्ट्रीय कानून में किसी क्षेत्र का वैध हस्तांतरण शांतिपूर्ण और आपसी सहमति से हो सकता है. इसे आम तौर पर सेशन (Cession) कहा जाता है. इसके तहत संबंधित देश एक औपचारिक संधि या समझौते के जरिए अपनी संप्रभुता दूसरे देश को सौंपता है. इसके अलावा किसी क्षेत्र के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून का भी सम्मान जरूरी होता है. यानी किसी इलाके को केवल एकतरफा कब्जे या सैन्य शक्ति के आधार पर अपने देश में शामिल करना वैध नहीं माना जाता.
क्या कहता है समुद्री कानून?
संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) एक अंतरराष्ट्रीय कानून है, जो समुद्र और महासागरों में देशों के अधिकार, जिम्मेदारियां और समुद्री संसाधनों के इस्तेमाल के नियम तय करता है. समुद्री कानून संधि के अनुसार, कोई भी देश अपनी मर्जी से किसी अन्य देश के तटीय क्षेत्र या अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग को अपनी संपत्ति घोषित नहीं कर सकता। अन्य देशों के अधिकार और संप्रभुता बने रहते हैं. इसे 1982 में अपनाया गया था और 16 नवंबर 1994 को लागू किया गया. इसके तहत तटीय देशों के आसपास के समुद्री क्षेत्र को अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है.
1. आंतरिक जल (Internal Waters): तट के अंदर आने वाले समुद्री हिस्से, जैसे कुछ खाड़ियां और जलमार्ग। इन पर संबंधित देश का पूरा अधिकार होता है.
2. प्रादेशिक सागर (Territorial Sea): तट से 12 नॉटिकल मील तक का समुद्री क्षेत्र, जिस पर देश की संप्रभुता होती है.
3. सन्निहित क्षेत्र (Contiguous Zone): प्रादेशिक सागर के आगे 12 नॉटिकल मील तक, यानी तट से कुल 24 नॉटिकल मील तक का क्षेत्र, यहां देश सीमा शुल्क, आव्रजन, स्वास्थ्य और कुछ कानूनों से जुड़े नियम लागू कर सकता है.
4. EEZ यानी अनन्य आर्थिक क्षेत्र: तट से 200 नॉटिकल मील तक का क्षेत्र, जहां देश को मछली, तेल-गैस और समुद्री ऊर्जा जैसे संसाधनों के इस्तेमाल के विशेष आर्थिक अधिकार मिलते हैं.
5. उच्च समुद्र (High Seas): EEZ के आगे का खुला समुद्री क्षेत्र, जो किसी एक देश के अधिकार में नहीं होता और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सभी देशों के लिए खुला रहता है.
अब होर्मुज पर क्या है संभावना?
वर्तमान स्थिति के हिसाब से अमेरिका का होर्मुज पर कब्जा असंभव है. पहले बात करते हुए अमेरिकी कानून की तो कांग्रेस पहले से ही ईरान युद्ध के खिलाफ है. अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के दोनों सदनों ने जून 2026 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने का निर्देश देने वाला वॉर पावर्स प्रस्ताव पास किया था. होर्मुज को अमेरिकी क्षेत्र में मिलाने का काम कांग्रेस में तो फिलहाल असंभव है.
रही बात पारंपरिक तरीके की तो युद्ध में अभी तक हार जीत का फैसला नहीं हो पाया है. ईरान लगातार अमेरिका से टक्कर ले रहा है. हार के बाद ईरान होर्मुज खो सकता है लेकिन ये अंसभव है. फरवरी 2026 से अभी तक ईरान लगातार अमेरिका को टक्कर दे रहा है. संधि या समझौता की बात करें तो ईरान परमाणु न बनाने पर सहमत हो गया है लेकिन होर्मुज पर किसी भी शर्त पर सहमत नहीं हो रहा है. होर्मुज के लिए ईरान हर कीमत चुकाने की बात कह चुका है.
इसके अलावा खरीदने का तरीका बचता है जो अमेरिका के लिए व्यर्थ है. ईरान ने सबकुछ दांव पर लगाकर होर्मुज को अपने नियंत्रण में रखा है. कई महीनों का युद्ध, ईरान में चरम पर महंगाई, सुप्रीम लीडर खामेनेई समेत कई नेता की कुर्बानी जैसी कीमत ईरान ने पहले ही चुका दी है. ऐसे में ईरान के लिए होर्मुज के लिए कोई कीमत मायने नहीं रखती है. अतंत: फिलहाल होर्मुज पर कब्जा ट्रंप का बड़बोलापन मात्र है. इससे ज्यादा कुछ नहीं.
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