सोशल मीडिया मंचों पर गैरकानूनी सामग्री को लेकर सरकार और मेटा के बीच बातचीत अब और गंभीर हो गई है। मौजूद जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार ने मेटा को साफ संदेश दिया है कि अगर कंपनी भारत के कानूनों का उल्लंघन करती है तो उसे सुरक्षित कानूनी संरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। हाल की बैठकों में खास तौर पर बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री और दूसरी हानिकारक सामग्री को लेकर चर्चा हुई है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के मामले में मेटा की ओर से कुछ कार्रवाई देखने को मिली है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारत में काम करने वाले डिजिटल मंचों को देश के कानूनों का पालन करना होगा। सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य सोशल मीडिया पर सेंसरशिप लगाना या वैध अभिव्यक्ति को रोकना नहीं है, बल्कि गैरकानूनी सामग्री के प्रसार पर रोक लगाना है।
बता दें कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत कुछ शर्तों के साथ डिजिटल मध्यस्थों को तीसरे पक्ष की ओर से डाली गई सामग्री के लिए कानूनी जिम्मेदारी से सुरक्षा मिलती है। इसे सुरक्षित संरक्षण कहा जाता है। सरकार पहले भी सवाल उठा चुकी है कि अगर कोई मंच तय कानूनी शर्तों का पालन नहीं करता है तो उसे इस सुरक्षा का लाभ मिलना चाहिए या नहीं।
मौजूद जानकारी के अनुसार, सरकार और मेटा के बीच हुई बातचीत में बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के अलावा आर्टिफिशियल तरीके से तैयार सामग्री, नकली वीडियो, स्वचालित खातों और सामग्री की सिफारिश करने वाली व्यवस्था पर भी चर्चा हुई है। सरकारी अधिकारियों ने मेटा से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि जिस सामग्री को गैरकानूनी या खतरनाक माना गया है, वह बार-बार लोगों तक न पहुंचे और उसे सिफारिश के जरिए आगे न बढ़ाया जाए।
गौरतलब है कि सरकार की एक बड़ी चिंता नकली वीडियो और एआई से तैयार सामग्री को लेकर भी है। अधिकारियों का मानना है कि लोगों को यह जानने का अधिकार है कि वे जो सामग्री देख रहे हैं वह वास्तविक है या मशीन की मदद से तैयार की गई है। इसलिए सरकार चाहती है कि ऐसी सामग्री की साफ पहचान हो और उपयोगकर्ताओं को इसकी जानकारी दी जाए।
सरकार ने मेटा की सामग्री की निगरानी व्यवस्था में भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को पर्याप्त महत्व देने पर भी जोर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि केवल वैश्विक मानकों के आधार पर भारतीय सामग्री का फैसला करना पर्याप्त नहीं है। निगरानी करने वाली टीमों को भारतीय भाषाओं, स्थानीय संदर्भ और सामाजिक परिस्थितियों की बेहतर समझ होनी चाहिए।
इससे पहले सरकार मेटा की सामग्री की सिफारिश और तेजी से फैलाने वाली व्यवस्था पर भी सवाल उठा चुकी है। खास तौर पर यह जानने की कोशिश की गई कि आपत्तिजनक या चिह्नित आर्टिफिशियल सामग्री को हटाने के बाद भी वह दोबारा लोगों तक कैसे पहुंच जाती है।
व्हाट्सऐप पर उपयोगकर्ता नाम की व्यवस्था का मुद्दा भी सरकार की निगरानी में है। हालांकि, इसे केवल मेटा से जुड़ा मामला नहीं माना जा रहा है। केंद्र इसे सभी संदेश भेजने वाले मंचों के स्तर पर देख रहा है।
मेटा और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के बीच बाल यौन शोषण सामग्री, नकली वीडियो, स्वचालित खाते, कृत्रिम सामग्री, सामग्री की सिफारिश और भारतीय कानूनों के पालन को लेकर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। सरकार का कहना है कि वह मेटा की पूरी तकनीकी व्यवस्था बदलने की मांग नहीं कर रही है, बल्कि यह चाहती है कि भारत में काम करने वाले उसके मंच कानून, भाषा और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप जिम्मेदारी से काम करें।
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नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की प्रस्तावित लिस्टिंग को लेकर बाजार में हलचल तेज है। मौजूद जानकारी के अनुसार, भारत का सबसे बड़ा शेयर बाजार संचालक अपनी प्रस्तावित आरंभिक शेयर बिक्री में करीब 5.26 लाख करोड़ रुपये के मूल्यांकन का लक्ष्य रख रहा है। निवेशकों के साथ हुई बैठकों में कंपनी ने अपने शेयर का संभावित मूल्य 2,000 से 2,100 रुपये प्रति शेयर के बीच बताया है।
अगर ऊपरी मूल्य सीमा के आधार पर सौदा आगे बढ़ता है तो नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का मूल्यांकन करीब 55 अरब डॉलर यानी लगभग 5.26 लाख करोड़ रुपये हो सकता है। इस स्तर पर यह दुनिया की बड़ी शेयर बाजार कंपनियों में छठे स्थान पर आ जाएगा। इसका मूल्यांकन लंदन स्टॉक एक्सचेंज समूह के आसपास रहेगा और नैस्डैक से थोड़ा अधिक हो सकता है। फिलहाल सीएमई समूह और इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज करीब 97 अरब डॉलर और 86.9 अरब डॉलर के मूल्यांकन के साथ सबसे ऊपर हैं।
बता दें कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने अपनी प्रस्तावित आरंभिक शेयर बिक्री को लेकर दुनिया के कई बड़े निवेशकों से बातचीत की है। कंपनी ने बोस्टन, न्यूयॉर्क, सैन फ्रांसिस्को, लंदन, सिंगापुर और हांगकांग में निवेशक बैठकें की हैं। जानकारी के मुताबिक, इन बैठकों में ब्लैकरॉक, कैपिटल ग्रुप, जीक्यूजी पार्टनर्स, जानस हेंडरसन ग्रुप और ऑलस्प्रिंग ग्लोबल इन्वेस्टमेंट्स समेत करीब 120 बड़े वैश्विक निवेशकों ने हिस्सा लिया है।
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की वैश्विक निवेशक बैठकें लगभग पूरी हो चुकी हैं, जबकि मध्य पूर्व में कुछ बैठकें अभी बाकी हैं। हालांकि, कंपनी के मूल्यांकन और शेयर मूल्य से जुड़ी बातचीत अभी अंतिम रूप में नहीं पहुंची है। ऐसे में आरंभिक शेयर बिक्री की शर्तों में बदलाव संभव है।
गौरतलब है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने जून में बाजार नियामक के पास आरंभिक शेयर बिक्री से जुड़े मसौदा दस्तावेज दाखिल किए थे। इस प्रस्ताव में कंपनी नए शेयर जारी नहीं करेगी। पूरी बिक्री मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी बेचकर की जाएगी। दस्तावेजों के अनुसार, मौजूदा निवेशक करीब 14.89 करोड़ शेयर बेच सकते हैं, जो कंपनी की लगभग 6 प्रतिशत हिस्सेदारी के बराबर हैं।
प्रस्तावित मूल्यांकन के ऊपरी स्तर पर 6 प्रतिशत हिस्सेदारी की बिक्री से करीब 31,500 करोड़ रुपये जुटाए जा सकते हैं। ऐसा होने पर यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा आरंभिक शेयर निर्गम बन सकता है। फिलहाल यह रिकॉर्ड हुंडई मोटर की भारतीय इकाई के नाम है, जिसने 2024 में करीब 27,870 करोड़ रुपये जुटाए थे।
मौजूद जानकारी के अनुसार, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड से मसौदा दस्तावेज पर मंजूरी अगस्त की शुरुआत तक मिलने की उम्मीद थी। लेकिन बिक्री करने वाले शेयरधारकों की सूची में भारतीय स्टेट बैंक की कंपनी एसबीआई कैपिटल मार्केट्स को शामिल किए जाने के कारण प्रक्रिया में करीब तीन सप्ताह की देरी हुई है। दस्तावेज में बदलाव के बाद आम लोगों से सुझाव लेने के लिए 21 दिन की अवधि जरूरी होती है।
अब आरंभिक शेयर बिक्री सितंबर के दूसरे पखवाड़े में आने की संभावना जताई जा रही है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने इस बिक्री के लिए कोटक महिंद्रा कैपिटल, जेएम फाइनेंशियल, मॉर्गन स्टेनली, एचएसबीसी और सिटीग्रुप समेत कुल 20 वित्तीय संस्थानों को जिम्मेदारी दी है।
बता दें कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज कारोबार की मात्रा के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा वायदा एवं विकल्प बाजार संचालक है। इसकी प्रस्तावित सूचीबद्धता ऐसे समय हो रही है जब भारतीय शेयर बाजार में खुदरा और संस्थागत निवेशकों की भागीदारी लगातार बढ़ी है। इसलिए इस आरंभिक शेयर बिक्री पर घरेलू के साथ वैश्विक निवेशकों की भी नजर टिकी हुई है।
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