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ऑस्ट्रेलिया में शोधकर्ताओं ने ग्रेट बैरियर रीफ की स्थिति का पता लगाने के लिए नया फ्रेमवर्क बनाया

कैनबरा, 18 अगस्त (आईएएनएस)। ऑस्ट्रेलिया में शोधकर्ताओं ने ग्रेट बैरियर रीफ पर जलवायु परिवर्तन से पड़ने वाले प्रभाव पर सही तरीके से जानकारी जुटाने के लिए एक नया फ्रेमवर्क बनाने में 30 साल से ज्यादा के डेटा का इस्तेमाल किया है।

यह फ्रेमवर्क समय के साथ कोरल रीफ के खराब होने को मापता है और अन्य शोधकर्ताओं को रीफ की हेल्थ चेक करने में मदद देता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी (यूएसवाईडी) ने मंगलवार को जारी एक बयान में कहा, इसका इस्तेमाल कोरल ब्लीचिंग, चक्रवात और बाढ़ जैसी गंभीर घटनाओं के रीफ पर पड़ने वाले असर को मापने के लिए किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने 1995 से अब तक का डेटा विश्लेषित किया, जिसमें कोरल कवर और शैवाल की वृद्धि पर फोकस किया गया। ज्यादा कोरल कवर का मतलब है कि रीफ स्वस्थ समुद्री जीवन को सहारा दे सकता है, और शैवाल का अधिक होना रीफ के खराब स्वास्थ्य की ओर इशारा करता है।

सिन्हुआ की ओर से साझा जानकारी के अनुसार, शोध टीम ने रीफ सिस्टम में व्यापक रूप से अलग-अलग होने वाले पूर्ण कोरल कवर पर भरोसा करने के बजाय, हर रीफ की तुलना 1980 के दशक के अंत से एकत्र किए गए उसके अपने ऐतिहासिक डेटा से की।

यूएसवाईडी की पीएचडी कैंडिडेट और समुद्री पर्यावरण अनुसंधान में प्रकाशित स्टडी की प्रमुख लेखिका केट व्हिटन ने कहा, एक जगह पर 30 फीसदी कोरल कवर वाली रीफ को स्वस्थ माना जा सकता है, लेकिन दूसरी जगह पर यही गिरावट का बड़ा संकेत हो सकता है।

इस स्टडी में रीफ के लिए तीन पारिस्थितिक श्रेणियां बनाई गईं, स्वस्थ, संघर्षरत और खतरे में।

व्हिटन ने कहा कि यह फ्रेमवर्क वैज्ञानिकों को खतरे में पड़ी रीफ की पहचान करने और रिकवरी में मदद के लिए समय पर कार्रवाई करने की सिफारिश में मदद कर सकता है।

इसमें पाया गया कि जब कोरल कवर ऐतिहासिक अधिकतम स्तर के लगभग 65 फीसदी से नीचे गिर जाता है, तो रीफ आमतौर पर संघर्ष की स्थिति में चले जाते हैं। वहीं, 35 फीसदी से नीचे की गिरावट खतरे वाली अवस्था से जुड़ी थी। इस अवस्था में शैवाल बढ़ जाते हैं और रीफ बनाने वाले कोरल में भारी गिरावट आती है।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि जटिल आकार वाले कोरल, साधारण गोल कोरल की तुलना में ज्यादा प्रभावित होने वाली श्रेणी में आते हैं। इसकी वजह से रीफ चपटे हो जाते हैं, मछलियों के लिए छिपने की जगहें कम हो जाती हैं और तूफानी लहरों से बचाव भी घट जाता है। इससे जीवों का पनपना और कोरल का दोबारा बढ़ना मुश्किल हो जाता है।

ग्रेट बैरियर रीफ ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी तट के पास प्रशांत महासागर में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति (कोरल रीफ) प्रणाली है। यह 2,300 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली है और इसमें 2,900 से अधिक अलग-अलग चट्टानों के साथ ही 900 द्वीप भी शामिल हैं। इसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है।

--आईएएनएस

केके/एबीएम

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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THDC टनल हादसा: 117 घंटे बाद रेस्क्यू अभियान पूरा, 12 श्रमिक सुरक्षित निकाले गए; 10 की मौत

THDC Tunnel Accident: उत्तराखंड में चमोली के पीपलकोटी में टीएचडीसी की निर्माणाधीन टनल में हुए हादसे के बाद करीब 117 घंटे तक चला खोज और बचाव अभियान मंगलवार को पूरा हो गया। रेस्क्यू टीमों ने टनल में फंसे और लापता सभी प्रभावित श्रमिकों को बाहर निकाल लिया। इस हादसे में 12 श्रमिकों को सुरक्षित बचाया गया, जबकि 10 श्रमिकों की मौत हो गई।

13 अगस्त 2026 की शाम टनल में अचानक पानी का रिसाव और भूस्खलन होने के बाद हादसा हुआ था। उस समय टनल में एचसीसी कंपनी के कर्मचारी काम कर रहे थे। शुरुआती जानकारी के अनुसार करीब 22 श्रमिकों के अंदर फंसे होने की सूचना मिली थी।

हादसे की सूचना मिलते ही शुरू हुआ रेस्क्यू

घटना की जानकारी मिलते ही जिला प्रशासन, पुलिस, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, आईटीबीपी, सेना, डीडीआरएफ, सीआईएसएफ, टीएचडीसी और अन्य एजेंसियों की टीमें मौके पर पहुंच गईं। इसके बाद टनल में फंसे श्रमिकों को बाहर निकालने के लिए बड़े स्तर पर रेस्क्यू अभियान शुरू किया गया। रेस्क्यू टीमों के सामने टनल के अंदर भरा पानी, मलबा और कठिन परिस्थितियां बड़ी चुनौती थीं। इसके बावजूद टीमें लगातार दिन-रात काम करती रहीं।

पानी निकालकर मलबे के बीच जारी रही तलाश

अभियान के दौरान टनल के अंदर जमा पानी को बाहर निकालने के लिए सक्शन पंप समेत कई जरूरी उपकरणों का इस्तेमाल किया गया। इसके साथ ही मलबा हटाने और टनल में फंसी मशीनरी को बाहर निकालने का काम भी किया गया। रेस्क्यू टीमें संभावित स्थानों पर लगातार सर्च अभियान चलाती रहीं। आधुनिक उपकरणों और उपलब्ध संसाधनों की मदद से टनल के अंदर तक पहुंच बनाने की कोशिश जारी रखी गई।

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सभी प्रभावित श्रमिकों को बाहर निकाला गया

अभियान के दौरान कुल 12 श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकाला गया, जबकि 10 श्रमिकों के शव बरामद किए गए। बचाए गए श्रमिकों को बाहर निकालने के बाद तत्काल जरूरी चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई। प्रशासन की ओर से उनके स्वास्थ्य और अन्य जरूरतों की लगातार जानकारी ली गई। जिला प्रशासन ने बताया कि रेस्क्यू अभियान का मुख्य लक्ष्य टनल में फंसे और लापता सभी श्रमिकों को बाहर निकालना था। कठिन परिस्थितियों के बावजूद रेस्क्यू टीमों ने लगातार काम करते हुए अभियान को पूरा किया।

डीएम ने पूरे अभियान की निगरानी की

जिलाधिकारी गौरव कुमार ने पूरे रेस्क्यू अभियान की लगातार निगरानी की। उन्होंने मौके पर मौजूद अधिकारियों और विभिन्न रेस्क्यू एजेंसियों से अभियान की प्रगति की जानकारी ली और सभी टीमों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित किया। जिला प्रशासन की ओर से बताया गया कि अभियान के दौरान घायल श्रमिकों को तत्काल चिकित्सा सहायता दी गई और उनके स्वास्थ्य पर नजर रखी गई।

इन एजेंसियों ने निभाई अहम भूमिका

रेस्क्यू अभियान में आईटीबीपी जोशीमठ, आईटीबीपी गौचर, सेना जोशीमठ, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, डीडीआरएफ, सीआईएसएफ, पुलिस, जिला प्रशासन और टीएचडीसी की टीमों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सभी एजेंसियों ने आपसी तालमेल के साथ लगातार सर्च और रेस्क्यू अभियान चलाया। करीब पांच दिन तक चले इस अभियान में कठिन परिस्थितियों के बावजूद टीमों ने पूरी क्षमता के साथ काम किया और टनल में फंसे सभी प्रभावित श्रमिकों को बाहर निकालने में सफलता हासिल की।  

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