तमिलनाडु की सियासत में स्वतंत्रता दिवस का मंच इस बार राष्ट्रध्वज, विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दों से ज्यादा एक फिल्मी चेहरे और राजनीतिक तंज का अखाड़ा बन गया। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के साथ अभिनेत्री त्रिशा कृष्णन की मौजूदगी को लेकर डीएमके के मुखपत्र ‘मुरासोली’ ने ऐसा हमला बोला है, जिसने सत्ता और विपक्ष के बीच पहले से गर्म राजनीतिक माहौल में एक नया मसाला डाल दिया है।
हम आपको बता दें कि चेन्नई के फोर्ट सेंट जॉर्ज में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान त्रिशा को पहली कतार में बैठाया गया था। वह विजय के माता-पिता एस.ए. चंद्रशेखर और शोभा चंद्रशेखर के साथ बैठी नजर आईं। समारोह के दौरान मुख्यमंत्री जब आधिकारिक दायित्व निभाते हुए आगे बढ़े तो त्रिशा ने उन्हें सलामी दी और दोनों के बीच सलामी के आदान-प्रदान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। बस फिर क्या था, डीएमके के राजनीतिक तीर सीधे मुख्यमंत्री की ओर चल पड़े।
डीएमके के आधिकारिक मुखपत्र ‘मुरासोली’, जिसकी स्थापना पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने की थी, उसने सवाल उठाया कि क्या किसी आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस समारोह में एक अभिनेत्री को इस तरह पहली पंक्ति में बैठाना और मुख्यमंत्री के साथ इस तरह सलामी का आदान-प्रदान करना उचित था। संपादकीय ने इसे लेकर बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल किया और कहा कि इस दृश्य को वे लोग भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, जिन्होंने विजय को वोट दिया था।
‘मुरासोली’ का तंज यहीं नहीं रुका। उसने सवाल किया कि आखिर ऐसी व्यवस्था को उचित ठहराने की जरूरत ही क्यों पड़ी? अखबार ने सोशल मीडिया पर कथित तौर पर चल रहे उन संदेशों का भी हवाला दिया, जिनमें लोग लिख रहे हैं, ‘हमने आपको वोट दिया था... अब हमें वोट देने का अफसोस है।’
डीएमके ने त्रिशा प्रकरण को विजय सरकार के शुरुआती तीन महीनों की कथित बेचैनी से भी जोड़ दिया। ‘मुरासोली’ ने मुख्यमंत्री के स्वतंत्रता दिवस भाषण के उस हिस्से को निशाना बनाया, जिसमें विजय ने जनता से सरकार का साथ बनाए रखने की अपील की थी। विजय ने कहा था कि सरकार का काम अभी खत्म नहीं हुआ है और जनता आगे भी सरकार के साथ बनी रहे, तभी वह उनके लिए अच्छी योजनाओं को लागू कर पाएंगे। डीएमके ने इसी अपील को पकड़कर सवाल दागा कि अगर सरकार को अपने काम पर इतना भरोसा है तो फिर जनता से इस तरह साथ बने रहने की अपील क्यों करनी पड़ रही है?
हालांकि स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में विजय ने स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि दी और तमिलनाडु को रिश्वत तथा भ्रष्टाचार से बचाने को अपनी सरकार की प्राथमिकता बताया। उन्होंने 376 वर्ष पुराने किले में 80वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अवसर देने के लिए जनता का आभार भी जताया।
हम आपको यह भी बता दें कि डीएमके के मुखपत्र ने विजय सरकार पर फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने को लेकर भी सवाल उठाए। संपादकीय में विजय की आखिरी फिल्म ‘जननायकन’ के निर्माता वेंकट नारायण, ‘बिगिल’ और ‘कोड’ की निर्माता अर्चना कल्पथी तथा ‘लियो’ के निर्माता जगदीश पलानीसामी जैसे नामों का उल्लेख किया गया।
इसके अलावा सरकार पर मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ शिकायतों से निपटने के तरीके को लेकर भी हमला बोला गया। ‘मुरासोली’ ने एक विजय समर्थक द्वारा विधायक के खिलाफ की गई यौन शिकायत का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि शिकायतकर्ता को ही पार्टी से बाहर कर दिया गया, जबकि संबंधित मंत्री को पुलिस सुरक्षा मिली। अखबार ने सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने वालों के खिलाफ कार्रवाई और अदालतों की ओर से प्रशासन की आलोचना का भी जिक्र किया।
देखा जाये तो दिलचस्प बात यह है कि त्रिशा का नाम तमिलनाडु की राजनीति में पहली बार इस तरह नहीं उछला है। इसी महीने विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन को त्रिशा को लेकर कथित दोहरे अर्थ वाले बयान के मामले में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने उन पर अश्लील शब्दों के इस्तेमाल और महिला की गरिमा का अपमान करने समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया था। डीएमके ने हालांकि उस टिप्पणी को गलत ढंग से पेश किए जाने का दावा किया और कहा कि उसका संदर्भ सरकार के कामकाज से था, किसी व्यक्ति विशेष से नहीं।
हम आपको बता दें कि विजय और त्रिशा की नजदीकियों को लेकर लंबे समय से सार्वजनिक अटकलें लगती रही हैं। मई में विजय के शपथ ग्रहण समारोह में भी त्रिशा मौजूद थीं और उस दौरान उनके भावुक होने की तस्वीरें चर्चा में आई थीं। विजय की पत्नी संगीता ने फरवरी में तलाक की याचिका दायर की थी, जिसमें मानसिक क्रूरता, भावनात्मक उपेक्षा, अलगाव और कथित विवाहेतर संबंध जैसे आरोप लगाए गए थे। हालांकि उन्होंने इस महीने याचिका वापस ले ली। इन घटनाओं के बीच त्रिशा की सार्वजनिक मौजूदगी ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी है। हालांकि इन निजी दावों और सार्वजनिक अटकलों को लेकर कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
फिलहाल विजय की पार्टी टीवीके की ओर से ‘मुरासोली’ के इस तीखे हमले पर कोई जवाब सामने नहीं आया है। लेकिन संदेश साफ है कि डीएमके ने मुख्यमंत्री विजय के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है और स्वतंत्रता दिवस के मंच पर हुई एक सलामी को उसने सरकार की नीयत, लोकप्रियता और राजनीतिक शैली पर सवाल उठाने का हथियार बना दिया है।
बहरहाल, सियासत में प्रतीक कभी-कभी भाषण से ज्यादा बोलते हैं। इस बार एक सलामी ने वही काम किया है। अब देखना यह है कि विजय इसे महज विपक्ष का राजनीतिक प्रहार मानकर आगे बढ़ते हैं या इस विवाद का जवाब भी उसी धार से देते हैं, जिस धार से ‘मुरासोली’ ने हमला किया है।
Continue reading on the app
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के आपदा रिपोर्टिंग और सूचना प्रबंधन प्रणाली (DRIMS) के अनुसार, इस साल अब तक असम में बाढ़ से 105 लोगों की मौत हो चुकी है और पांच जिलों में लगभग 32,000 लोग अभी भी प्रभावित हैं। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, बाढ़ से जुड़ी घटनाओं में मरने वाले 105 लोगों में से 64 पुरुष, 24 महिलाएं और 17 बच्चे हैं। राज्य में बाढ़ से जुड़ी मौतों की सबसे अधिक संख्या शिवसागर में दर्ज की गई है, जहां 53 लोगों की मौत हुई है। चराइदेव में 22 मौतें हुई हैं, जबकि जोरहाट में नौ, गोलाघाट में आठ, कार्बी आंगलोंग में चार और धेमाजी में तीन लोगों की मौत हुई है। ताज़ा आंकड़ों से पता चलता है कि बाढ़ की स्थिति राज्य भर में हज़ारों लोगों को प्रभावित कर रही है। पाँच ज़िलों में लगभग 32,000 लोग अभी भी बाढ़ से प्रभावित हैं।
ASDMA की ताज़ा बाढ़ रिपोर्ट के अनुसार, 3,198.77 हेक्टेयर फसल क्षेत्र अभी भी पानी में डूबा हुआ है। कृषि भूमि के लगातार जलमग्न रहने से फसल के नुकसान और प्रभावित क्षेत्रों में किसान समुदायों की आजीविका पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं। लगभग 3,000 लोग अभी राहत शिविरों और राहत वितरण केंद्रों में रह रहे हैं, जबकि अधिकारी राहत कार्य जारी रखे हुए हैं और बाढ़ प्रभावित निवासियों को सहायता प्रदान कर रहे हैं।
इस साल बाढ़ का दायरा काफी बड़ा रहा है। साल के दौरान अलग-अलग समय पर 25 ज़िलों और 2,734 गाँवों में 12 लाख से ज़्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। असम अपने व्यापक नदी नेटवर्क के कारण मानसून के दौरान हर साल आने वाली बाढ़ के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है; भारी बारिश के बाद ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ अक्सर उफान पर आ जाती हैं। बाढ़ नियमित रूप से राज्य भर के गाँवों, खेतों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढाँचों को प्रभावित करती है। बार-बार आने वाली बाढ़ हज़ारों निवासियों, खासकर निचले और नदी के किनारे रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने और राहत शिविरों व सरकारी सहायता पर निर्भर रहने के लिए मजबूर करती है।
हज़ारों लोगों के प्रभावित होने और 3,000 हेक्टेयर से ज़्यादा कृषि भूमि के पानी में डूबे होने के कारण, अधिकारी प्रभावित ज़िलों में स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं। बाढ़ से विस्थापित या प्रभावित लोगों के लिए राहत और पुनर्वास के उपाय किए जा रहे हैं।
इस साल दर्ज की गई मौतों की अधिक संख्या ने एक बार फिर वार्षिक मानसून सीज़न के दौरान असम के समुदायों की संवेदनशीलता को उजागर किया है। राज्य प्रशासन और आपदा प्रबंधन अधिकारी स्थिति का आकलन कर रहे हैं और नदियों व अन्य जल निकायों में जल स्तर की निगरानी कर रहे हैं।
Continue reading on the app