हाथियों की सेहत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- धार्मिक आयोजनों में भी हाथियों की देखभाल-सुरक्षा जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में पाले जा रहे हाथियों की सेहत, देखभाल और उनके कल्याण को लेकर अहम निर्देश दिए हैं. अदालत ने साफ किया कि हाथी धार्मिक या सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके स्वास्थ्य और आराम की अनदेखी की जाए. कोर्ट ने कहा कि अगर किसी धार्मिक परंपरा में हाथी का इस्तेमाल होता है तो उसकी देखभाल और सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्रीय हाथी स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति को कैद में रखे गए हाथियों से जुड़े फैसलों को लागू करने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा है. केंद्र सरकार और समिति से हाथियों की पहचान, डीएनए प्रोफाइलिंग, इलाज और रखरखाव को लेकर विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी गई है. यह मामला हाथियों को छोड़ने, उनका पुनर्वास करने और उनकी बेहतर देखभाल से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया.
हाथियों के स्वास्थ्य और उनके रखरखाव पर अदालत का ध्यान
सुनवाई में बताया गया कि 2018 की गणना के अनुसार देश में 2,675 कैद हाथी थे. याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि कुछ हाथियों के पास उनकी कैद में आने से जुड़ा पूरा रिकॉर्ड नहीं है. हाथियों के धार्मिक और व्यावसायिक इस्तेमाल का मुद्दा भी उठाया गया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि इस समय उसका मुख्य ध्यान मालिकाना हक पर नहीं, बल्कि हाथियों के स्वास्थ्य और उनके रखरखाव पर है.
कोर्ट ने हाथियों की नियमित स्वास्थ्य जांच के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बनाने पर जोर दिया. सुझाव दिया गया कि हर हाथी का मेडिकल रिकॉर्ड रखा जाए और समय-समय पर उसकी जांच हो. एक समिति इलाज और देखभाल की निगरानी करे और हाथियों को रखने की जगह, भोजन और दूसरी जरूरी सुविधाओं के लिए न्यूनतम मानक तय किए जाएं.
मालिकाना हक या हाथी के हस्तांतरण को लेकर भी कोर्ट ने नियमों का पालन जरूरी बताया. हाथी को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को देने की स्थिति में दोनों पक्षों की जानकारी और हस्तांतरण का कारण दर्ज किया जाना चाहिए. इसके अलावा मालिकाना प्रमाणपत्र के नवीनीकरण के समय हाथी की उम्र, पहचान और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी दोबारा जांचने की व्यवस्था बनाने की बात कही गई है.
सुप्रीम कोर्ट ने निजी लोगों के पास रखे हाथियों को लेकर भी सवाल उठाए. कोर्ट ने जानना चाहा कि क्या ऐसे मालिक हाथी के भोजन, इलाज और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च ठीक से उठा सकते हैं और आखिर हाथी को निजी तौर पर रखने की जरूरत क्या है. अदालत ने यह भी पूछा कि क्या हाथियों की उम्र, पहचान और स्वास्थ्य से जुड़ा पूरा डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध है.
धार्मिक गतिविधियां भी पशु कल्याण से जुड़े कानूनों के मुताबिक हों- सर्वोच्च अदालत
धार्मिक आयोजनों में हाथियों के इस्तेमाल पर भी कोर्ट ने संतुलित रुख अपनाया. अदालत ने कहा कि उसका उद्देश्य किसी धार्मिक या व्यक्तिगत अधिकार में दखल देना नहीं है. लेकिन धार्मिक गतिविधियां भी पशु कल्याण से जुड़े कानूनों के मुताबिक होनी चाहिए. मंदिरों में जुलूस के दौरान हाथियों के इस्तेमाल के समय और उनकी सेहत का भी ध्यान रखना होगा. कोर्ट ने इसी संदर्भ में कहा कि दिव्यता के प्रति सम्मान हाथियों तक भी पहुंचना चाहिए.
अदालत ने यह भी जानना चाहा कि मंदिरों, सर्कस और दूसरे संस्थानों में रखे हाथियों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा मिल रही है या नहीं. साथ ही यह भी देखा जाएगा कि उनके साथ ऐसा कोई व्यवहार तो नहीं हो रहा जो पशुओं के प्रति क्रूरता रोकने वाले कानून के खिलाफ हो.
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को पहले दिए गए आदेशों के पालन की जानकारी देने को कहा है. केंद्रीय हाथी स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति को भी अपने स्तर पर जरूरी कदम उठाकर अदालत को स्थिति से अवगत कराने का निर्देश दिया गया है. साफ है कि अदालत का जोर हाथियों के मालिकाना विवाद से ज्यादा उनके स्वास्थ्य, सुरक्षित जीवन और सम्मानजनक देखभाल पर है.
उत्तराखंड में स्टार्टअप को नई उड़ान, युवाओं के नवाचार को सरकार का सहारा, बना 200 करोड़ का वेंचर फंड
Uttarakhand Startups: उत्तराखंड में युवाओं के नए आइडिया और कारोबार को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि सरकार प्रदेश के युवाओं के नवाचार, प्रतिभा और उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करते हुए उत्तराखंड के स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत करने पर काम कर रही है. सरकार का जोर ऐसे युवाओं को आगे लाने पर है, जो अपने नए विचारों को कारोबार में बदलकर खुद रोजगार पाने के साथ दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा कर सकें.
मुख्यमंत्री के मुताबिक, उत्तराखंड में स्टार्टअप के क्षेत्र में लगातार विस्तार हो रहा है. वर्तमान में प्रदेश में भारत सरकार से मान्यता प्राप्त 1,300 से अधिक स्टार्टअप संचालित हो रहे हैं. इसके अलावा राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त 200 से अधिक स्टार्टअप भी प्रदेश में काम कर रहे हैं. बड़ी संख्या में स्टार्टअप का संचालन इस बात का संकेत है कि उत्तराखंड के युवा अब पारंपरिक रोजगार के साथ-साथ नए कारोबार और इनोवेशन की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं.
हमारी सरकार प्रदेश के युवाओं के नवाचार, प्रतिभा और उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करते हुए उत्तराखंड के स्टार्टअप इकोसिस्टम को निरंतर मजबूत कर रही है।
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) August 18, 2026
वर्तमान में प्रदेश में भारत सरकार से मान्यता प्राप्त 1,300 से अधिक तथा राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त 200 से अधिक स्टार्टअप संचालित… pic.twitter.com/WeReM075L6
युवाओं के आइडिया को आर्थिक मदद
स्टार्टअप शुरू करने वाले युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक शुरुआती दौर में पूंजी की कमी होती है. कई बार अच्छा आइडिया होने के बावजूद पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं मिलने से युवा अपने कारोबार को आगे नहीं बढ़ा पाते. इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने 200 करोड़ रुपये के वेंचर फंड की स्थापना की है.
इस फंड का उद्देश्य युवाओं के नवाचार और नए उद्यमों को जरूरी वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराना है. इससे ऐसे युवाओं को अपने आइडिया को विकसित करने, कारोबार शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है, जिनके पास बेहतर योजना तो है, लेकिन शुरुआती निवेश की कमी है.
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रोजगार के नए अवसर पैदा करने पर जोर
सरकार का मानना है कि स्टार्टअप सिर्फ कारोबार शुरू करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनके जरिए प्रदेश में रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं. एक सफल स्टार्टअप आगे चलकर कई लोगों को रोजगार दे सकता है. इससे युवाओं को अपने ही राज्य में काम करने और दूसरों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने का अवसर मिल सकता है.
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में स्टार्टअप को बढ़ावा देना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे युवाओं को स्थानीय स्तर पर नए व्यवसाय शुरू करने के विकल्प मिल सकते हैं. पर्यटन, कृषि, तकनीक, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और स्थानीय उत्पादों जैसे क्षेत्रों में नए विचारों को कारोबार का रूप देने की संभावनाएं हैं.
स्थानीय प्रतिभा को मिल रहा मंच
उत्तराखंड में प्रतिभा की कमी नहीं है. जरूरत इस बात की है कि युवाओं को अपने आइडिया पर काम करने के लिए सही मंच, मार्गदर्शन और आर्थिक सहयोग मिले. सरकार की ओर से स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत करने की कोशिश इसी दिशा में एक कदम के तौर पर देखी जा रही है.
भारत सरकार से मान्यता प्राप्त 1,300 से अधिक और राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त 200 से अधिक स्टार्टअप का आंकड़ा बताता है कि प्रदेश में उद्यमिता को लेकर युवाओं की रुचि बढ़ रही है. आने वाले समय में इन स्टार्टअप को बेहतर सुविधाएं और वित्तीय सहायता मिलने से नए क्षेत्रों में भी कारोबार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं.
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‘नौकरी मांगने’ से ‘नौकरी देने’ की ओर बढ़ते युवा
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अनुसार, सरकार की कोशिश है कि प्रदेश के युवा सिर्फ नौकरी की तलाश करने वाले न रहें, बल्कि नौकरी देने वाले उद्यमी भी बनें. युवाओं के नए विचारों और उनकी प्रतिभा को सही दिशा देकर उत्तराखंड को स्टार्टअप के क्षेत्र में मजबूत बनाया जा सकता है.
200 करोड़ रुपये के वेंचर फंड और बड़ी संख्या में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप के साथ उत्तराखंड में स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में आधार तैयार हो रहा है. सरकार का फोकस युवाओं को अवसर देने, उनके नए विचारों को प्रोत्साहित करने और प्रदेश में उद्यमिता के लिए बेहतर माहौल बनाने पर है. इससे आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के युवाओं के लिए नए कारोबार, रोजगार और आत्मनिर्भरता के अवसर और बढ़ने की उम्मीद है.
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