भारत-चीन व्यापार- नेपाल को मंजूरी, भारतीय इंतजार में:गुंजी में 3 हजार क्विंटल गुड़-मिश्री पर सीलन का खतरा; व्यापारी धारचूला लौटे
नेपाल के व्यापारियों को तिब्बत की पुरंग मंडी में कारोबार की अनुमति मिल गई है, लेकिन भारतीय व्यापारी अब भी चीन की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। लिपुलेख दर्रे से भारत-तिब्बत व्यापार शुरू नहीं होने से गुंजी में रखा करीब 3 हजार क्विंटल गुड़ और मिश्री लगातार बारिश और सीलन के कारण खराब होने की कगार पर पहुंच गया है। कोरोना काल के बाद इस साल भारत-तिब्बत व्यापार दोबारा शुरू होने की उम्मीद जगी थी। तकलाकोट व्यापार के लिए 134 भारतीय व्यापारियों ने आवेदन किया है। प्रशासन अब तक 100 व्यापारियों और उनके सहायकों को ट्रेड पास जारी कर चुका है। व्यापारियों को 8 जुलाई को तकलाकोट (पुरंग) रवाना होना था, लेकिन चीन की अंतिम मंजूरी नहीं मिलने से पूरा कार्यक्रम रुक गया। इस बीच 11 जलाई को 28 से अधिक व्यापारी सामान गुंजी में छोड़कर धारचूला लौट आए। व्यापारियों का कहना है कि गुंजी में खाने-पीने और अन्य जरूरी संसाधनों की कमी है। जब तक चीन की ओर से आगे बढ़ने का आदेश नहीं मिलता, वहां रुकने का कोई मतलब नहीं है। अनुमति मिलते ही वे दोबारा गुंजी पहुंचेंगे। अब जानिए क्या है स्थिति… 1. चीन बोला- अभी सुविधाएं पूरी नहीं चीनी अधिकारियों का कहना है कि पुरंग (तकलाकोट) मंडी में भारतीय व्यापारियों के लिए पर्याप्त दुकानें और अन्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। व्यवस्थाएं पूरी होने के बाद ही व्यापार शुरू किया जाएगा। 2. 3 हजार क्विंटल गुड़-मिश्री पर खतरा गुंजी में रखा करीब 3 हजार क्विंटल गुड़ और मिश्री लगातार बारिश और सीलन से खराब होने की आशंका में है। अनुमति में देरी से व्यापारियों का नुकसान बढ़ने लगा है। 3. नेपाल को अनुमति, भारतीयों का इंतजार भारत-चीन व्यापार समिति के अध्यक्ष जीवन सिंह रौंकली का कहना है कि चीन ने नेपाल के व्यापारियों को पुरंग मंडी में कारोबार की अनुमति दे दी है, जबकि भारतीय व्यापारियों को अब तक प्रवेश नहीं मिला। उन्होंने इसे भारतीय व्यापारियों के साथ भेदभावपूर्ण रवैया बताया। 4. प्रशासन बोला- चीन से संपर्क जारी एसडीएम आशीष जोशी ने बताया कि भारतीय व्यापारियों को बिना सामान के तिब्बत जाकर वहां की व्यवस्थाएं देखने की अनुमति देने का अनुरोध किया गया है। चीन की ओर से जवाब का इंतजार है। 2019 के बाद से बंद है सीमा व्यापार लिपुलेख दर्रे से भारत और तिब्बत के बीच सदियों से पारंपरिक व्यापार होता रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद व्यापार बंद हो गया था। बाद में 1992 में तकलाकोट (पुरंग) मंडी के जरिए व्यापार फिर शुरू हुआ। कोरोना महामारी के दौरान 2019 के बाद यह व्यापार फिर बंद हो गया। छह साल बाद व्यापार शुरू होने की उम्मीद जगी थी, लेकिन चीन की मंजूरी अटकने से अनिश्चितता बढ़ गई है। सामान्य पासपोर्ट से इतना अलग ट्रेड पास… 1. विदेश यात्रा का नहीं, सीमा व्यापार का दस्तावेज सामान्य पासपोर्ट भारत सरकार का आधिकारिक यात्रा दस्तावेज है, जिसके जरिए व्यक्ति वीजा नियमों के तहत दुनिया के विभिन्न देशों की यात्रा कर सकता है। इसके विपरीत भारत-तिब्बत ट्रेड पास केवल सीमा व्यापार से जुड़े अधिकृत लोगों को जारी किया जाता है। यह पर्यटन, नौकरी या अन्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए मान्य नहीं होता। 2. तय मार्ग और सीमित अवधि के लिए मान्य सामान्य पासपोर्ट कई वर्षों तक वैध रहता है और धारक को विभिन्न देशों की यात्रा की अनुमति देता है। वहीं ट्रेड पास केवल निर्धारित ट्रेड सीजन और अधिकृत व्यापारिक मार्ग, जैसे लिपुलेख दर्रा-तकलाकोट क्षेत्र के लिए ही जारी किया जाता है। इसकी वैधता सीमित होती है और अवधि समाप्त होने पर इसका उपयोग नहीं किया जा सकता। 3. विशेष अनुमति-पत्र, जिसमें भूमिका भी तय होती है ट्रेड पास सामान्य पहचान दस्तावेज नहीं, बल्कि सीमा व्यापार के लिए जारी विशेष अनुमति-पत्र है। यह केवल पंजीकृत व्यापारियों, उनके सहायकों, पोर्टर, कुली और म्यूल (खच्चर) चालकों को दिया जाता है। पास में धारक की श्रेणी भी दर्ज होती है। इसे किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता और ट्रेड सीजन समाप्त होने पर संबंधित प्राधिकरण को वापस जमा करना पड़ता है। पात्रता से मंजूरी तक पूरी प्रक्रिया भारत-तिब्बत ट्रेड पास सामान्य पर्यटकों के लिए नहीं, बल्कि सीमा व्यापार से जुड़े पंजीकृत व्यापारियों, उनके सहायकों, पोर्टर, कुली और म्यूल (खच्चर) चालकों को जारी किया जाता है। पास बनवाने के लिए आवेदक का नाम सीमा व्यापार या पंजीकृत व्यापारी सूची में होना जरूरी है। इसके बाद आवेदन ट्रेड कार्यालय या जिला प्रशासन के पास जमा किया जाता है। आवेदन मिलने पर एसआईबी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन ब्रांच) समेत अन्य सुरक्षा और प्रशासनिक जांच होती है। सभी मंजूरियां मिलने के बाद ट्रेड पास जारी किया जाता है। इसके लिए पहचान पत्र, स्थानीय निवासी या व्यापारी प्रमाण, व्यापार पंजीकरण दस्तावेज, फोटो और सुरक्षा क्लीयरेंस से जुड़े रिकॉर्ड की जरूरत पड़ सकती है। अंतिम दस्तावेजों की सूची संबंधित जिला प्रशासन की अधिसूचना के अनुसार तय होती है। अब सड़क के सहारे तकलाकोट तक आसान पहुंच अब तक लिपुलेख दर्रे से होने वाला कारोबार पूरी तरह पारंपरिक ढुलाई व्यवस्था पर निर्भर था। व्यापारी धारचूला से गुंजी, कालापानी और नाभीढांग होते हुए कई दिन की कठिन यात्रा कर दर्रे तक पहुंचते थे। सामान घोड़े-खच्चरों, याक और पोर्टरों के जरिए ढोया जाता था। खराब मौसम और भूस्खलन कई बार व्यापार रोक देते थे। कुमाऊं यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता सुमन जोशी के मुताबिक पहले सीमांत समुदाय नेपाल से चावल, जौ और गेहूं लेकर तिब्बत की ग्यानिमा और गरहाटोक मंडियों तक पहुंचते थे, जहां बदले में नमक और बोरेक्स लिया जाता था। कई जगह एक नाली चावल के बदले पांच नाली नमक तक का विनिमय होता था। अब सड़क बनने के बाद करीब 100 किलोमीटर तक वाहन सीधे सीमा के करीब पहुंच सकेंगे। सिर्फ अंतिम करीब 200 मीटर तक ही सामान पारंपरिक तरीके से ले जाया जाएगा। इसके बाद चीन क्षेत्र में सड़क मार्ग उपलब्ध रहेगा, जहां से व्यापारी करीब 18 किलोमीटर दूर तकलाकोट मंडी पहुंचेंगे। तकलाकोट की नई मंडी में मिलेंगी दुकानें व्यापार बंद रहने के दौरान तकलाकोट की पुरानी मंडी की कई दुकानें नेपाली और अन्य व्यापारियों को आवंटित कर दी गई थीं। अब नई ट्रेड मंडी विकसित की जा रही है। इसी नई मंडी में भारतीय व्यापारियों को दुकानें दी जाएंगी। व्यापार समिति का कहना है कि नई मंडी पहले के मुकाबले ज्यादा व्यवस्थित है और वहां सामान रखने के लिए अधिक जगह उपलब्ध होगी। भारतीय व्यापारियों के लिए रियायती किराए और बेहतर लॉजिस्टिक सुविधा की भी मांग की गई है। व्यापार से जुड़े लोगों का मानना है कि सड़क और आधुनिक सुविधाओं के कारण आने वाले वर्षों में कारोबार का दायरा और बढ़ सकता है। 2019 में करोड़ों का कारोबार 2019 में इस मार्ग से करीब तीन करोड़ रुपए का व्यापार हुआ था, जिसमें लगभग 1.25 करोड़ रुपए का निर्यात और 1.90 करोड़ रुपये का आयात शामिल था। अब सड़क और आधुनिक सुविधाओं के साथ व्यापार फिर शुरू होने जा रहा है, ऐसे में इस आंकड़े के काफी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। व्यापार बंद होने के कारण कई भारतीय व्यापारी अपना सामान तिब्बत की तकलाकोट मंडी में ही छोड़ आए थे। पिछले छह साल से करीब 45 व्यापारियों का एक करोड़ रुपए से ज्यादा का सामान वहां फंसा हुआ है। अब व्यापार शुरू होने से इन व्यापारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि वे अपना सामान वापस ला सकेंगे या उसे बेच सकेंगे। सदियों से व्यापार, संस्कृति और भरोसे का रास्ता रहा लिपुलेख लिपुलेख दर्रा सिर्फ सीमा कारोबार का रास्ता नहीं, बल्कि सदियों से भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच संपर्क का प्रमुख मार्ग रहा है। सीमांत क्षेत्रों में लंबे समय तक वस्तु विनिमय प्रणाली पर आधारित व्यापार चलता था। ब्रिटिश अधिकारी और लेखक सर फ्रांसिस एडवर्ड यंगहसबैंड ने अपनी किताब 'इंडिया एंड तिब्बत' में हिमालयी व्यापारिक रास्तों को भारत और तिब्बत के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्क का माध्यम बताया था। इन रास्तों से सिर्फ सामान नहीं, बल्कि परंपराएं, भाषाएं और सीमांत समाजों के रिश्ते भी एक इलाके से दूसरे इलाके तक पहुंचते थे। तिब्बत के साथ यह संपर्क सिर्फ मंडियों तक सीमित नहीं था। सीमांत इलाकों के मेले, धार्मिक यात्राएं और कारोबारी काफिले भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच सामाजिक संबंधों का भी आधार बने हुए थे। जौलजीबी जैसे मेले लंबे समय तक त्रिपक्षीय व्यापारिक केंद्र के रूप में पहचाने जाते रहे। कौन हैं रं समुदाय, जिन्होंने जिंदा रखा हिमालयी व्यापार लिपुलेख दर्रे से होने वाले पारंपरिक व्यापार में रं समुदाय की सबसे अहम भूमिका रही है। यह समुदाय मुख्य रूप से पिथौरागढ़ की ब्यास, दारमा और चौंदास घाटियों में निवास करता है। रं समाज को भोटिया या शौका समुदाय का हिस्सा भी माना जाता है। सदियों तक यही समुदाय दुर्गम हिमालयी रास्तों में भारत-तिब्बत व्यापार को जिंदा रखे हुए था। इनके रहन-सहन, खानपान और पहनावे में तिब्बती संस्कृति की झलक दिखाई देती है। यह समुदाय अपनी ऊनी बुनाई, लोक संस्कृति और सीमांत जीवनशैली के लिए जाना जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड में भोटिया जनजाति की आबादी 39 हजार से ज्यादा थी। व्यापार से पहले पी जाती थी शराब सुमन जोशी की एक सोध के अनुसार ऊंचे इलाकों में बर्फबारी होने पर कई भोटिया परिवार सर्दियों में नेपाल के निचले इलाकों में अस्थायी घर बनाकर रहते थे, जबकि गर्मियों में व्यापारिक काफिलों के साथ तिब्बत की मंडियों तक पहुंचते थे। नेपाल और तिब्बत के बीच यही सीमांत समुदाय कारोबारी पुल की तरह काम करता था। व्यापार शुरू करने से पहले भारतीय व्यापारियों और तिब्बती कारोबारियों के बीच ‘Share Chu-Dul Chyu’ नाम की मित्रता रस्म निभाई जाती थी। दोनों पक्ष चांदी के पात्र में शराब पीते, घी, सत्तू, ऊन और सोने को छूकर भरोसे का प्रतीक मानते थे। दोस्ती के प्रमाण के तौर पर पत्थर के टुकड़े तक संभालकर रखे जाते थे। नेपाल की आपत्ति से फिर चर्चा में आया सीमा विवाद लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर नेपाल पहले भी आपत्ति जता चुका है। 2019 में भारत सरकार के नए नक्शे के बाद नेपाल ने भी नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था, जिसमें उसने इस पूरे क्षेत्र पर दावा किया था। बाद में नेपाल संसद ने भी इसे मंजूरी दे दी थी। नेपाल का दावा है कि यह इलाका उसका हिस्सा है, जबकि भारत सिगौली संधि के आधार पर इसे अपना क्षेत्र मानता है। यही वजह है कि भारत-चीन व्यापार और कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़ा यह पूरा इलाका रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है। --------------- ये खबर भी पढ़ें : भारत से कैलाश पर्वत दर्शन के लिए करना होगा इंतजार: 2 माह बाद जारी होंगे परमिट; व्यू पॉइंट पर हर दिन बदलता रहता है मौसम तिब्बत स्थित पवित्र कैलाश पर्वत के भारत से दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं को अभी करीब दो महीने और इंतजार करना होगा। फिलहाल इनर लाइन परमिट (ILP) जारी नहीं किए जा रहे हैं। जिला प्रशासन का कहना है कि सितंबर के आसपास परमिट शुरू होने पर आदि कैलाश और ओम पर्वत आने वाले श्रद्धालु 17 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित ओल्ड लिपुलेख (ओल्ड लिपुपास) जाकर भारत की सीमा से कैलाश पर्वत के दर्शन कर सकेंगे। पढ़ें पूरी खबर…
ऋषिकेश हाईवे पर 9 दिन से पेड़ों से चिपके प्रदर्शनकारी:4,369 वृक्षों की कटाई के विरोध में मना रहे 'ब्लैक हरेला'; दो साल की बच्ची के साथ मां का प्रोटेस्ट
पिछले नौ दिनों से हम यहीं बैठे हैं। हर साल हरेला पर पेड़ लगाते थे, लेकिन इस बार उन्हीं पेड़ों को बचाने के लिए धरना देना पड़ रहा है। विकास के नाम पर सदियों पुराने साल के जंगल काटे जा रहे हैं। आखिर यह कैसा हरेला है? यह कहते हुए प्रदर्शनकारी मनीष रावत सामने खड़े एक विशाल साल के पेड़ की ओर इशारा करते हैं। चेहरे पर नाराजगी है, लेकिन आवाज में बेबसी भी साफ झलकती है। देहरादून-ऋषिकेश मार्ग पर सात मोड़ के जंगल में हरेला के दिन दो तस्वीरें साथ-साथ दिखती हैं। पूरे उत्तराखंड में पौधारोपण का उत्सव मनाया जा रहा है, जबकि यहां करीब 300 लोग पेड़ों से चिपककर 'ब्लैक हरेला' मना रहे हैं। किसी के हाथ में काला पोस्टर है, तो किसी की तख्ती पर लिखा है - पेड़ बचाओ, भविष्य बचाओ' और 'जंगल नहीं बचेंगे तो जीवन नहीं बचेगा। दैनिक भास्कर ने हरेला के अवसर पर सात मोड़ पहुंचकर ग्राउंड जीरो पर आंदोलन, पेड़ कटान और दोनों पक्षों की दलीलों को समझा। लड़ाई केवल पेड़ों की नहीं, भविष्य की प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब एक ओर हजारों पेड़ों पर आरी चल रही हो और दूसरी ओर पौधारोपण का संदेश दिया जा रहा हो, तो यह विरोधाभास है। उनका कहना है कि यह आंदोलन सिर्फ पेड़ों को बचाने का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगल और पर्यावरण बचाने की लड़ाई है। ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना से शुरू हुआ यह विरोध अब स्थानीय आंदोलन से आगे बढ़कर उत्तराखंड में विकास बनाम पर्यावरण की बड़ी बहस का केंद्र बन गया है। एक पक्ष बेहतर सड़क और तेज कनेक्टिविटी की बात कर रहा है, तो दूसरा सवाल उठा रहा है कि क्या विकास की कीमत सदियों पुराने जंगलों से चुकाई जानी चाहिए। जहां जंगल था, वहां अब मशीनों की आवाज सात मोड़ पहुंचते ही जंगल की खामोशी की जगह मशीनों और आरी की आवाज सुनाई देती है। सड़क किनारे कई साल के पेड़ों पर लाल और पीले निशान बने हैं। कुछ पेड़ जमीन पर गिर चुके हैं, जबकि कई अब भी कटने का इंतजार कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि शुरुआत में करीब 173 पेड़ काटे गए थे। विरोध और लगातार बारिश के चलते कुछ दिनों तक कटान धीमा पड़ा, लेकिन उनका कहना है कि अब तक 350 से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की गई है। पूरी परियोजना में 4,369 पेड़ प्रभावित होने हैं। धरने पर बैठे प्रदर्शनकारी मनीष रावत का आरोप है कि अधिकारियों से कटान के आदेश मांगे गए तो सामान्य स्वीकृति संबंधी दस्तावेज दिखाए गए, लेकिन ऐसा कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिखाया गया जिसमें तत्काल कटान का निर्देश हो। उनका सवाल है कि यदि सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं तो फिर इतनी जल्दबाजी किस बात की है? कब शुरू हुई पेड़ों की कटाई? वन एवं पर्यावरण संबंधी मंजूरियां मिलने के बाद भानियावाला-जौलीग्रांट-ऋषिकेश फोरलेन परियोजना के तहत पेड़ काटने का काम शुरू हुआ। शुरुआती दिनों में बड़ी संख्या में साल के पेड़ों की कटाई होने लगी, जिसके बाद स्थानीय लोगों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने मौके पर पहुंचकर विरोध शुरू कर दिया। लगातार प्रदर्शन और बारिश के कारण कुछ दिनों तक कटान की रफ्तार धीमी रही, लेकिन अब काम फिर तेज हो गया है। इसके साथ ही धरना भी नौवें दिन में पहुंच चुका है। जब पौधारोपण के दिन पोस्टर उठे उत्तराखंड में हरेला प्रकृति और हरियाली का पर्व माना जाता है। हर साल इस दिन बड़े पैमाने पर पौधारोपण होता है, लेकिन इस बार सात मोड़ पर तस्वीर अलग थी। पौधों की जगह लोगों के हाथों में काले पोस्टर और बैनर थे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि एक ओर हजारों पेड़ों की कटाई हो रही है और दूसरी ओर पौधारोपण का उत्सव मनाया जा रहा है। इसी विरोधाभास को दिखाने के लिए उन्होंने हरेला के दिन 'ब्लैक हरेला' मनाने का फैसला किया। 'मैं अपनी बेटी के भविष्य के लिए यहां खड़ी हूं' धरना स्थल पर दो साल की बेटी को गोद में लेकर पहुंचीं रिसर्च स्कॉलर बबीता की आवाज भर्रा जाती है। वह कहती हैं, देहरादून से ऋषिकेश आते समय इन जंगलों को देखकर हमेशा सुकून मिलता था। अब इन्हीं पेड़ों को गिरते देख मन दुखी हो जाता है। बबीता का कहना है कि एक साल का पौधा विशाल वृक्ष बनने में दशकों लगा देता है, इनमें से कई साल के पेड़ दो-तीन सौ साल पुराने हैं। लेकिन उसे काटने में कुछ मिनट भी नहीं लगते। मैं यहां अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी बेटी के भविष्य के लिए खड़ी हूं। जहां जाम नहीं, वहां फोरलेन क्यों? सामाजिक कार्यकर्ता शक्ति सिंह बर्त्वाल परियोजना की जरूरत पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि देहरादून के आढ़त बाजार, प्रिंस चौक और तहसील चौक जैसे इलाकों में रोज लंबा जाम लगता है, लेकिन सात मोड़ पर उन्होंने कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी। उनका कहना है कि जहां ट्रैफिक की वास्तविक समस्या है, वहां वर्षों से समाधान नहीं हुआ, जबकि जंगल वाले हिस्से में हजारों पेड़ प्रभावित हो रहे हैं। उनका आरोप है कि पर्यावरण के मुद्दे पर आवाज उठाने वाले कई बड़े चेहरे भी अब खामोश हैं। विरोध को मिला राजनीतिक समर्थन पेड़ कटान के विरोध में अब स्थानीय लोगों के साथ राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी खुलकर सामने आ गए हैं। हरेला के दिन आंदोलन स्थल पर आम आदमी पार्टी की देहरादून महानगर अध्यक्ष दीप्ति रावत भी पहुंचीं। उनका आरोप है कि हरेला पर पौधे लगाने की बात हो रही है, लेकिन उसी दिन हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। सरकार असली मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। आंदोलन में विभिन्न पर्यावरण संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र समूहों और स्थानीय नागरिकों ने भी भागीदारी की। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ है। वहीं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि सात मोड़ की पहचान उसके घने जंगल हैं। उनका कहना है कि - सात मोड़ की प्राकृतिक पहचान खत्म नहीं होनी चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी है, सिर्फ ट्रांसलोकेशन का दावा समाधान नहीं है। परियोजना और दोनों पक्षों के दावे भानियावाला-जौलीग्रांट-ऋषिकेश फोरलेन परियोजना का उद्देश्य देहरादून, जौलीग्रांट एयरपोर्ट, ऋषिकेश और चारधाम यात्रा मार्ग पर यातायात को तेज और सुरक्षित बनाना है। एनएचएआई का कहना है कि इसके लिए वन क्षेत्र में सामान्य 60 मीटर की जगह 23 मीटर राइट ऑफ वे (ROW) रखा गया है, ताकि कम जंगल प्रभावित हो। प्राधिकरण के मुताबिक, प्रभावित 4,369 पेड़ों में से 754 का वैज्ञानिक ट्रांसलोकेशन किया जाएगा। साथ ही 40 हेक्टेयर भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण की योजना है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सैकड़ों साल पुराने साल के जंगलों की भरपाई नए पौधे लगाकर नहीं की जा सकती। उनका मानना है कि विकास जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत परिपक्व जंगलों को खोकर नहीं चुकाई जानी चाहिए। पर्यावरण बनाम विकास : असली बहस यही है यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। एक पक्ष का तर्क है कि बेहतर सड़कें और मजबूत कनेक्टिविटी राज्य के विकास के लिए जरूरी हैं, जबकि दूसरा पूछता है कि क्या विकास की कीमत हजारों पेड़ों और जंगलों को खोकर चुकाई जानी चाहिए। पर्यावरणविद् आशीष गर्ग का कहना है कि दुनिया के कई देशों में अब सड़क परियोजनाएं इस तरह डिजाइन की जाती हैं कि पेड़ों की कटाई और जैव विविधता पर असर न्यूनतम हो। उनका मानना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में किसी परियोजना का आकलन सिर्फ पेड़ों की संख्या से नहीं, बल्कि पूरे वन तंत्र और स्थानीय पारिस्थितिकी पर उसके प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। वन्यजीवों पर कितना पड़ेगा असर? सात मोड़ का इलाका हाथियों समेत कई वन्यजीवों का प्राकृतिक कॉरिडोर माना जाता है। एनएचएआई का कहना है कि इनके सुरक्षित आवागमन के लिए एलीफेंट अंडरपास, बॉक्स कल्वर्ट, पाइप कल्वर्ट, साउंड बैरियर और नो-हॉर्न जोन जैसी व्यवस्थाएं बनाई जा रही हैं, ताकि सड़क का असर कम से कम हो। वहीं, वन और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में किसी भी सड़क परियोजना का आकलन केवल यातायात के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, प्रत्यारोपण, प्रतिपूरक वनीकरण और वन्यजीव कॉरिडोर की दीर्घकालिक निगरानी ही इसकी असली परीक्षा होगी। एनएचएआई का कहना है कि परियोजना सभी वन एवं पर्यावरणीय मंजूरियां मिलने के बाद शुरू की गई है और निर्माण कार्य तय कानूनी व पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप हो रहा है। प्राधिकरण का दावा है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की पूरी कोशिश की गई है। अब जानिए क्या है हरेला पर्व? उत्तराखंड में हरेला पर्व हर साल श्रावण संक्रांति (इस वर्ष 16 जुलाई) को मनाया जाता है। हालांकि राज्य सरकार, वन विभाग, स्कूलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से हरेला सप्ताह के तहत पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यक्रम कई दिन पहले ही शुरू हो जाते हैं। इसी दौरान पूरे प्रदेश में लाखों पौधे लगाए जाते हैं और लोगों को हरियाली बचाने का संदेश दिया जाता है। ---------------- ये खबर भी पढ़ें : उत्तराखंड में जंगल बचाने का नया हथियार बना 'बीज बम': 8 साल पहले शुरू हुई मुहिम अब 18 राज्यों तक पहुंची; प्रदेश सरकार भी जुड़ी मिट्टी का एक छोटा-सा गोला... लेकिन इसके भीतर छिपे हैं जंगलों को फिर से हरा-भरा बनाने वाले बीज। बारिश की कुछ बूंदें पड़ते ही यही गोला अंकुर बनकर पेड़-पौधों में बदल सकता है। उत्तराखंड में अब यही 'बीज बम' पर्यावरण संरक्षण का नया हथियार बनता जा रहा है। पढ़ें पूरी खबर…
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