ऋषिकेश हाईवे पर 9 दिन से पेड़ों से चिपके प्रदर्शनकारी:4,369 वृक्षों की कटाई के विरोध में मना रहे 'ब्लैक हरेला'; दो साल की बच्ची के साथ मां का प्रोटेस्ट
पिछले नौ दिनों से हम यहीं बैठे हैं। हर साल हरेला पर पेड़ लगाते थे, लेकिन इस बार उन्हीं पेड़ों को बचाने के लिए धरना देना पड़ रहा है। विकास के नाम पर सदियों पुराने साल के जंगल काटे जा रहे हैं। आखिर यह कैसा हरेला है? यह कहते हुए प्रदर्शनकारी मनीष रावत सामने खड़े एक विशाल साल के पेड़ की ओर इशारा करते हैं। चेहरे पर नाराजगी है, लेकिन आवाज में बेबसी भी साफ झलकती है। देहरादून-ऋषिकेश मार्ग पर सात मोड़ के जंगल में हरेला के दिन दो तस्वीरें साथ-साथ दिखती हैं। पूरे उत्तराखंड में पौधारोपण का उत्सव मनाया जा रहा है, जबकि यहां करीब 300 लोग पेड़ों से चिपककर 'ब्लैक हरेला' मना रहे हैं। किसी के हाथ में काला पोस्टर है, तो किसी की तख्ती पर लिखा है - पेड़ बचाओ, भविष्य बचाओ' और 'जंगल नहीं बचेंगे तो जीवन नहीं बचेगा। दैनिक भास्कर ने हरेला के अवसर पर सात मोड़ पहुंचकर ग्राउंड जीरो पर आंदोलन, पेड़ कटान और दोनों पक्षों की दलीलों को समझा। लड़ाई केवल पेड़ों की नहीं, भविष्य की प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब एक ओर हजारों पेड़ों पर आरी चल रही हो और दूसरी ओर पौधारोपण का संदेश दिया जा रहा हो, तो यह विरोधाभास है। उनका कहना है कि यह आंदोलन सिर्फ पेड़ों को बचाने का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगल और पर्यावरण बचाने की लड़ाई है। ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना से शुरू हुआ यह विरोध अब स्थानीय आंदोलन से आगे बढ़कर उत्तराखंड में विकास बनाम पर्यावरण की बड़ी बहस का केंद्र बन गया है। एक पक्ष बेहतर सड़क और तेज कनेक्टिविटी की बात कर रहा है, तो दूसरा सवाल उठा रहा है कि क्या विकास की कीमत सदियों पुराने जंगलों से चुकाई जानी चाहिए। जहां जंगल था, वहां अब मशीनों की आवाज सात मोड़ पहुंचते ही जंगल की खामोशी की जगह मशीनों और आरी की आवाज सुनाई देती है। सड़क किनारे कई साल के पेड़ों पर लाल और पीले निशान बने हैं। कुछ पेड़ जमीन पर गिर चुके हैं, जबकि कई अब भी कटने का इंतजार कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि शुरुआत में करीब 173 पेड़ काटे गए थे। विरोध और लगातार बारिश के चलते कुछ दिनों तक कटान धीमा पड़ा, लेकिन उनका कहना है कि अब तक 350 से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की गई है। पूरी परियोजना में 4,369 पेड़ प्रभावित होने हैं। धरने पर बैठे प्रदर्शनकारी मनीष रावत का आरोप है कि अधिकारियों से कटान के आदेश मांगे गए तो सामान्य स्वीकृति संबंधी दस्तावेज दिखाए गए, लेकिन ऐसा कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिखाया गया जिसमें तत्काल कटान का निर्देश हो। उनका सवाल है कि यदि सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं तो फिर इतनी जल्दबाजी किस बात की है? कब शुरू हुई पेड़ों की कटाई? वन एवं पर्यावरण संबंधी मंजूरियां मिलने के बाद भानियावाला-जौलीग्रांट-ऋषिकेश फोरलेन परियोजना के तहत पेड़ काटने का काम शुरू हुआ। शुरुआती दिनों में बड़ी संख्या में साल के पेड़ों की कटाई होने लगी, जिसके बाद स्थानीय लोगों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने मौके पर पहुंचकर विरोध शुरू कर दिया। लगातार प्रदर्शन और बारिश के कारण कुछ दिनों तक कटान की रफ्तार धीमी रही, लेकिन अब काम फिर तेज हो गया है। इसके साथ ही धरना भी नौवें दिन में पहुंच चुका है। जब पौधारोपण के दिन पोस्टर उठे उत्तराखंड में हरेला प्रकृति और हरियाली का पर्व माना जाता है। हर साल इस दिन बड़े पैमाने पर पौधारोपण होता है, लेकिन इस बार सात मोड़ पर तस्वीर अलग थी। पौधों की जगह लोगों के हाथों में काले पोस्टर और बैनर थे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि एक ओर हजारों पेड़ों की कटाई हो रही है और दूसरी ओर पौधारोपण का उत्सव मनाया जा रहा है। इसी विरोधाभास को दिखाने के लिए उन्होंने हरेला के दिन 'ब्लैक हरेला' मनाने का फैसला किया। 'मैं अपनी बेटी के भविष्य के लिए यहां खड़ी हूं' धरना स्थल पर दो साल की बेटी को गोद में लेकर पहुंचीं रिसर्च स्कॉलर बबीता की आवाज भर्रा जाती है। वह कहती हैं, देहरादून से ऋषिकेश आते समय इन जंगलों को देखकर हमेशा सुकून मिलता था। अब इन्हीं पेड़ों को गिरते देख मन दुखी हो जाता है। बबीता का कहना है कि एक साल का पौधा विशाल वृक्ष बनने में दशकों लगा देता है, इनमें से कई साल के पेड़ दो-तीन सौ साल पुराने हैं। लेकिन उसे काटने में कुछ मिनट भी नहीं लगते। मैं यहां अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी बेटी के भविष्य के लिए खड़ी हूं। जहां जाम नहीं, वहां फोरलेन क्यों? सामाजिक कार्यकर्ता शक्ति सिंह बर्त्वाल परियोजना की जरूरत पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि देहरादून के आढ़त बाजार, प्रिंस चौक और तहसील चौक जैसे इलाकों में रोज लंबा जाम लगता है, लेकिन सात मोड़ पर उन्होंने कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी। उनका कहना है कि जहां ट्रैफिक की वास्तविक समस्या है, वहां वर्षों से समाधान नहीं हुआ, जबकि जंगल वाले हिस्से में हजारों पेड़ प्रभावित हो रहे हैं। उनका आरोप है कि पर्यावरण के मुद्दे पर आवाज उठाने वाले कई बड़े चेहरे भी अब खामोश हैं। विरोध को मिला राजनीतिक समर्थन पेड़ कटान के विरोध में अब स्थानीय लोगों के साथ राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी खुलकर सामने आ गए हैं। हरेला के दिन आंदोलन स्थल पर आम आदमी पार्टी की देहरादून महानगर अध्यक्ष दीप्ति रावत भी पहुंचीं। उनका आरोप है कि हरेला पर पौधे लगाने की बात हो रही है, लेकिन उसी दिन हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। सरकार असली मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। आंदोलन में विभिन्न पर्यावरण संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र समूहों और स्थानीय नागरिकों ने भी भागीदारी की। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ है। वहीं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि सात मोड़ की पहचान उसके घने जंगल हैं। उनका कहना है कि - सात मोड़ की प्राकृतिक पहचान खत्म नहीं होनी चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी है, सिर्फ ट्रांसलोकेशन का दावा समाधान नहीं है। परियोजना और दोनों पक्षों के दावे भानियावाला-जौलीग्रांट-ऋषिकेश फोरलेन परियोजना का उद्देश्य देहरादून, जौलीग्रांट एयरपोर्ट, ऋषिकेश और चारधाम यात्रा मार्ग पर यातायात को तेज और सुरक्षित बनाना है। एनएचएआई का कहना है कि इसके लिए वन क्षेत्र में सामान्य 60 मीटर की जगह 23 मीटर राइट ऑफ वे (ROW) रखा गया है, ताकि कम जंगल प्रभावित हो। प्राधिकरण के मुताबिक, प्रभावित 4,369 पेड़ों में से 754 का वैज्ञानिक ट्रांसलोकेशन किया जाएगा। साथ ही 40 हेक्टेयर भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण की योजना है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सैकड़ों साल पुराने साल के जंगलों की भरपाई नए पौधे लगाकर नहीं की जा सकती। उनका मानना है कि विकास जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत परिपक्व जंगलों को खोकर नहीं चुकाई जानी चाहिए। पर्यावरण बनाम विकास : असली बहस यही है यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। एक पक्ष का तर्क है कि बेहतर सड़कें और मजबूत कनेक्टिविटी राज्य के विकास के लिए जरूरी हैं, जबकि दूसरा पूछता है कि क्या विकास की कीमत हजारों पेड़ों और जंगलों को खोकर चुकाई जानी चाहिए। पर्यावरणविद् आशीष गर्ग का कहना है कि दुनिया के कई देशों में अब सड़क परियोजनाएं इस तरह डिजाइन की जाती हैं कि पेड़ों की कटाई और जैव विविधता पर असर न्यूनतम हो। उनका मानना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में किसी परियोजना का आकलन सिर्फ पेड़ों की संख्या से नहीं, बल्कि पूरे वन तंत्र और स्थानीय पारिस्थितिकी पर उसके प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। वन्यजीवों पर कितना पड़ेगा असर? सात मोड़ का इलाका हाथियों समेत कई वन्यजीवों का प्राकृतिक कॉरिडोर माना जाता है। एनएचएआई का कहना है कि इनके सुरक्षित आवागमन के लिए एलीफेंट अंडरपास, बॉक्स कल्वर्ट, पाइप कल्वर्ट, साउंड बैरियर और नो-हॉर्न जोन जैसी व्यवस्थाएं बनाई जा रही हैं, ताकि सड़क का असर कम से कम हो। वहीं, वन और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में किसी भी सड़क परियोजना का आकलन केवल यातायात के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, प्रत्यारोपण, प्रतिपूरक वनीकरण और वन्यजीव कॉरिडोर की दीर्घकालिक निगरानी ही इसकी असली परीक्षा होगी। एनएचएआई का कहना है कि परियोजना सभी वन एवं पर्यावरणीय मंजूरियां मिलने के बाद शुरू की गई है और निर्माण कार्य तय कानूनी व पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप हो रहा है। प्राधिकरण का दावा है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की पूरी कोशिश की गई है। अब जानिए क्या है हरेला पर्व? उत्तराखंड में हरेला पर्व हर साल श्रावण संक्रांति (इस वर्ष 16 जुलाई) को मनाया जाता है। हालांकि राज्य सरकार, वन विभाग, स्कूलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से हरेला सप्ताह के तहत पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यक्रम कई दिन पहले ही शुरू हो जाते हैं। इसी दौरान पूरे प्रदेश में लाखों पौधे लगाए जाते हैं और लोगों को हरियाली बचाने का संदेश दिया जाता है। ---------------- ये खबर भी पढ़ें : उत्तराखंड में जंगल बचाने का नया हथियार बना 'बीज बम': 8 साल पहले शुरू हुई मुहिम अब 18 राज्यों तक पहुंची; प्रदेश सरकार भी जुड़ी मिट्टी का एक छोटा-सा गोला... लेकिन इसके भीतर छिपे हैं जंगलों को फिर से हरा-भरा बनाने वाले बीज। बारिश की कुछ बूंदें पड़ते ही यही गोला अंकुर बनकर पेड़-पौधों में बदल सकता है। उत्तराखंड में अब यही 'बीज बम' पर्यावरण संरक्षण का नया हथियार बनता जा रहा है। पढ़ें पूरी खबर…
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