सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की फांसी के तरीके को बदलने की मांग वाली याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था को खत्म करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है. अदालत ने कहा कि फिलहाल फांसी के जरिए मौत की सजा देने की व्यवस्था को असंवैधानिक नहीं माना जा सकता. हालांकि, केंद्र सरकार चाहे तो मौत की सजा लागू करने के दूसरे तरीकों पर विचार कर सकती है.
यह मामला अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दाखिल जनहित याचिका से जुड़ा था. याचिका में सवाल उठाया गया था कि जब किसी व्यक्ति को मौत की सजा दी जाती है, तो उसे फांसी के जरिए ही क्यों मारा जाए. याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि ऐसा तरीका अपनाया जाए जिसमें कम से कम दर्द हो और दोषी की गरिमा भी बनी रहे.
मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने की. याचिका में मौत की सजा लागू करने से जुड़े कानूनी प्रावधान को भी चुनौती दी गई थी. इसमें खास तौर पर उस प्रावधान पर सवाल उठाया गया, जिसके तहत मौत की सजा पाए व्यक्ति को फांसी पर लटकाकर उसकी मौत होने तक रखा जाता है.
याचिकाकर्ता की तरफ से फांसी के बजाय दूसरे विकल्पों पर विचार करने की बात कही गई. इनमें लेथल इंजेक्शन जैसे तरीके भी शामिल थे. दलील यह थी कि अगर कानून किसी व्यक्ति को मौत की सजा देता है, तो उसे लागू करने का तरीका अनावश्यक दर्द या तकलीफ वाला नहीं होना चाहिए.
Supreme Court has dismissed a plea seeking an alternative way for the execution of death row convicts on the grounds that hanging till death is a painful way to execute the death penalty.
— ANI (@ANI) August 18, 2026
A bench of Justices Vikram Nath and Sandeep Mehta however, noted that this judgement should…
सुनवाई के दौरान प्रोजेक्ट 39ए की ओर से भी वैकल्पिक तरीकों को लेकर अदालत के सामने दलीलें रखी गईं. दूसरे देशों में इस्तेमाल होने वाले तरीकों और उनके अनुभवों का भी जिक्र हुआ. हालांकि, अदालत के सामने यह पहलू भी आया कि दूसरे विकल्पों में भी अपनी समस्याएं और जोखिम हो सकते हैं.
केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी पेश हुए. सरकार ने अदालत के सामने बताया कि मौत की सजा लागू करने के दूसरे तरीकों को लेकर विशेषज्ञ स्तर पर विचार किया जा सकता है. यानी सरकार के पास भविष्य में फांसी के विकल्प तलाशने का रास्ता खुला हुआ है.
सुनवाई के दौरान अदालत ने फांसी देने वाले जल्लाद पर पड़ने वाले मानसिक असर का मुद्दा भी उठाया. इससे साफ हुआ कि अदालत केवल दोषी पर पड़ने वाले असर को ही नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया से जुड़े दूसरे लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी देख रही थी.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सीधा मतलब है कि भारत में मौत की सजा खत्म नहीं हुई है और फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था भी फिलहाल जारी रहेगी. हां, केंद्र सरकार भविष्य में वैज्ञानिक और मेडिकल आधार पर मौत की सजा देने के दूसरे तरीकों पर विचार कर सकती है.
इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में अब मंजूरी से आगे बढ़कर समय पर क्रियान्वयन और उत्पादन शुरू करने पर हो फोकस: सरकार
नई दिल्ली, 18 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्र सरकार ने औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के विकास में अब केवल परियोजनाओं की मंजूरी तक सीमित रहने के बजाय उनके समयबद्ध क्रियान्वयन, निवेश आकर्षित करने और उत्पादन शुरू कराने पर जोर दिया है। सरकार का मानना है कि औद्योगिक विकास की वास्तविक सफलता परियोजनाओं के धरातल पर उतरने और आर्थिक गतिविधियों में बदलने से तय होगी।
राष्ट्रीय औद्योगिक कॉरिडोर विकास एवं कार्यान्वयन न्यास (एनआईसीडीआईटी) की शीर्ष निगरानी प्राधिकरण की तीसरी बैठक में केंद्रीय मंत्रियों ने औद्योगिक कॉरिडोर परियोजनाओं के तेज और परिणामोन्मुखी कार्यान्वयन की आवश्यकता पर बल दिया। बैठक के दौरान राज्यों से भूमि उपलब्धता, कनेक्टिविटी, उपयोगिताओं, वैधानिक मंजूरियों और परियोजना विशेष प्रयोजन इकाइयों (एसपीवी) से संबंधित बाधाओं को जल्द दूर करने का आग्रह किया गया।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि राज्यों को औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जमीन आवंटन, सड़क एवं परिवहन संपर्क, बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं और नियामकीय मंजूरियों से जुड़ी अड़चनों को प्राथमिकता के आधार पर हल करना चाहिए। उन्होंने पीएम गतिशक्ति के माध्यम से समेकित योजना निर्माण और निवेशक-अनुकूल भूमि आवंटन प्रणालियों के निरंतर उपयोग पर भी जोर दिया।
वित्त मंत्री ने कहा कि औद्योगिक विकास केवल फैक्टरी निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए। श्रमिक आवास, स्वास्थ्य सुविधाएं, कौशल विकास, सार्वजनिक परिवहन और अन्य सामाजिक सुविधाओं को भी औद्योगिक परियोजनाओं का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार सार्वजनिक पूंजीगत व्यय, राज्यों को सहायता, विनिर्माण क्षेत्र के एमएसएमई के लिए बेहतर ऋण सहायता और कर एवं सीमा शुल्क संबंधी उपायों के जरिए घरेलू विनिर्माण और सप्लाई चेन को मजबूत कर रही है।
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भव्य और भविष्य की औद्योगिक परियोजनाओं को पीएम गतिशक्ति के साथ जोड़कर समेकित क्षेत्रीय विकास मॉडल के तहत विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने निवेशकों तक पहुंच बढ़ाने और औद्योगिक नोड्स की प्रभावी मार्केटिंग करने की आवश्यकता पर बल दिया।
गोयल ने कहा कि भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) से मिलने वाले अवसरों का लाभ उठाते हुए देश-विशिष्ट और क्षेत्र-विशिष्ट औद्योगिक एन्क्लेव विकसित किए जाने चाहिए। उन्होंने निवेशकों की आवश्यकताओं के अनुरूप उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराने और प्लग-एंड-प्ले इंफ्रास्ट्रक्चर, फ्लैटेड फैक्ट्री, श्रमिक आवास तथा आर्थिक और सामाजिक सुविधाओं से युक्त तैयार औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित करने की जरूरत बताई।
केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने औद्योगिक कॉरिडोरों को राष्ट्रीय जलमार्गों से जोड़ने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि जलमार्गों को औद्योगिक विकास की रीढ़ के रूप में विकसित करने की संभावनाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए। उनके अनुसार इससे लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी और औद्योगिक गतिविधियों को गति मिलेगी।
सोनोवाल ने पूर्वोत्तर राज्यों में औद्योगिक बुनियादी ढांचे के विकास पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि बेहतर कनेक्टिविटी, भूमि उपलब्धता, स्थानीय संसाधनों और बाजार क्षमता वाले क्षेत्रों में उद्योगों को बढ़ावा देकर देश के औद्योगिक आधार का विस्तार किया जा सकता है।
बैठक में नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने भी राज्यों से परियोजना एसपीवी को अधिक अधिकार देने की अपील की। उन्होंने कहा कि इन्हें योजना निर्माण, विकास और नगर प्रशासन से जुड़े पर्याप्त अधिकार दिए जाने चाहिए, ताकि औद्योगिक कॉरिडोर परियोजनाओं का कार्यान्वयन अधिक प्रभावी और तेजी से हो सके।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation









