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What is Fast Track Court: भारत में अदालतों में लाखों मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं. कई बार किसी केस का फैसला आने में कई साल या दशकों का समय लग जाता है. ऐसे में गंभीर और संवेदनशील मामलों में पीड़ितों को जल्दी न्याय दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court) की व्यवस्था की गई है. इन अदालतों का उद्देश्य उन मामलों की तेजी से सुनवाई करना है, जिनमें जल्द फैसला जरूरी होता है. खासकर महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराधों में फास्ट ट्रैक कोर्ट की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है.
क्या होता है फास्ट ट्रैक कोर्ट?
फास्ट ट्रैक कोर्ट एक विशेष अदालत होती है, जिसे सामान्य अदालतों की तुलना में मामलों का जल्दी निपटारा करने के लिए बनाया जाता है. इन अदालतों में ऐसे मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर की जाती है, जिनमें देरी होने से पीड़ितों को नुकसान हो सकता है.
फास्ट ट्रैक कोर्ट का मुख्य उद्देश्य न्याय प्रक्रिया को तेज करना और लोगों को समय पर न्याय दिलाना है. हालांकि यह अदालत भी कानून के सभी नियमों का पालन करती है, लेकिन इसकी कार्यप्रणाली इस तरह बनाई जाती है कि मामलों का जल्द निपटारा हो सके.
फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की शुरुआत क्यों हुई?
देश में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों को देखते हुए सरकार ने फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) की व्यवस्था शुरू की. खासतौर पर दुष्कर्म (रेप) और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में जल्द सुनवाई के लिए यह कदम उठाया गया.
सरकार ने आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 के जरिए रेप जैसे गंभीर अपराधों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया. इसके बाद अक्टूबर 2019 से केंद्र सरकार ने एक विशेष योजना के तहत पूरे देश में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) और विशिष्ट पॉक्सो (POCSO) अदालतों की स्थापना शुरू की.
इन अदालतों का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में तेजी से सुनवाई कर पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाना है.
किन मामलों की होती है सुनवाई?
फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुख्य रूप से गंभीर और संवेदनशील मामलों की सुनवाई की जाती है. इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध
- दुष्कर्म (रेप) के मामले
- बच्चों के खिलाफ यौन अपराध (POCSO Act के तहत)
- ऐसे गंभीर मामले जिनमें राज्य सरकार या अदालत जल्द सुनवाई जरूरी समझे
- विशेष परिस्थितियों वाले संवेदनशील आपराधिक मामले
जरूरत पड़ने पर राज्य सरकार या अन्य संबंधित एजेंसियां भी किसी विशेष मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने की सिफारिश कर सकती हैं.
फास्ट ट्रैक कोर्ट कैसे काम करता है?
किसी भी राज्य में फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने का फैसला राज्य सरकार और संबंधित हाईकोर्ट की सहमति से लिया जाता है. इसके बाद हाईकोर्ट यह तय करता है कि किसी मामले की सुनवाई कितनी अवधि में पूरी की जानी चाहिए.
फास्ट ट्रैक कोर्ट मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई का कार्यक्रम तय करता है. कई मामलों में रोजाना सुनवाई होती है, जबकि कुछ मामलों में लगातार तय अंतराल पर सुनवाई की जाती है. सभी पक्षों की दलीलें, सबूत और गवाहों को सुनने के बाद अदालत निर्धारित समय के भीतर फैसला सुनाने का प्रयास करती है.
हर अदालत में होती है पूरी टीम
फास्ट ट्रैक कोर्ट में केवल न्यायाधीश ही नहीं होते, बल्कि पूरी न्यायिक टीम काम करती है. सामान्य तौर पर हर फास्ट ट्रैक कोर्ट में एक न्यायिक अधिकारी (जज) और सात सदस्यीय स्टाफ की व्यवस्था होती है. यह टीम मामलों की सुनवाई, दस्तावेजों के प्रबंधन और अदालत की कार्यवाही को सुचारु रूप से संचालित करती है.
देश में कितने फास्ट ट्रैक कोर्ट हैं?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार मई 2024 तक देश के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह योजना लागू की जा चुकी थी. इन राज्यों में 410 विशिष्ट पॉक्सो (POCSO) अदालतें और 755 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) काम कर रही थीं.
इन अदालतों ने मिलकर 2.53 लाख से अधिक मामलों का निपटारा किया है. यह आंकड़ा बताता है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट न्याय प्रक्रिया को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
मामलों की निगरानी कैसे होती है?
फास्ट ट्रैक कोर्ट के कामकाज की नियमित निगरानी भी की जाती है. न्याय विभाग हर महीने इन अदालतों के कामकाज का डेटा एकत्र करता है. इसके लिए एक ऑनलाइन मॉनिटरिंग पोर्टल बनाया गया है, जहां सभी अदालतों की प्रगति दर्ज होती है. इसके अलावा संबंधित राज्यों के अधिकारियों और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के साथ समय-समय पर समीक्षा बैठकें भी आयोजित की जाती हैं, ताकि मामलों के निपटारे की गति बनी रहे.
सामान्य अदालत और फास्ट ट्रैक कोर्ट में क्या अंतर है?
सामान्य अदालतों में मामलों की संख्या अधिक होने के कारण सुनवाई और फैसला आने में काफी समय लग सकता है. कई बार एक केस वर्षों तक चलता रहता है. वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट में केवल प्राथमिकता वाले मामलों की सुनवाई होती है. यहां कोशिश की जाती है कि सुनवाई लगातार हो और तय समय के भीतर फैसला सुनाया जाए. कई मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर भी दोषियों को सजा सुनाई है.
यह भी पढ़ें: Bihar News: बिहार में न्याय प्रक्रिया में नहीं होगी देरी, खुलेंगे 100 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट; CM सम्राट का ऐलान
क्यों जरूरी हैं फास्ट ट्रैक कोर्ट?
फास्ट ट्रैक कोर्ट का सबसे बड़ा उद्देश्य पीड़ितों को जल्दी न्याय दिलाना और न्याय व्यवस्था में लोगों का भरोसा मजबूत करना है. खासकर महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में समय पर फैसला मिलना बेहद जरूरी माना जाता है. हालांकि, फास्ट ट्रैक कोर्ट भी कानून की सभी प्रक्रियाओं का पालन करते हैं, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली अधिक तेज और व्यवस्थित होती है. यही कारण है कि गंभीर मामलों में इन अदालतों की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है और इन्हें भारतीय न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
FAQs
Q. फास्ट ट्रैक कोर्ट की अवधारणा क्या है?
फास्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत जिला अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करने के लिए की गई थी. इन अदालतों का उद्देश्य आसान प्रक्रिया अपनाकर और बार-बार तारीखें टालने से बचते हुए मामलों की तेज सुनवाई करना है. कोशिश रहती है कि अधिकतर मामलों का फैसला करीब 6 महीने के भीतर हो जाए.
Q. भारत में कितने फास्टट्रैक कोर्ट हैं?
उच्च न्यायालयों की जानकारी के अनुसार, 31 जनवरी 2026 तक देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 862 फास्ट ट्रैक कोर्ट काम कर रहे हैं. इनमें सबसे अधिक 73 फास्ट ट्रैक कोर्ट तमिलनाडु में हैं. इन अदालतों का राज्यवार विवरण अलग सूची में दिया गया है.
Q. फास्ट ट्रैक ट्रायल का अर्थ क्या है?
फास्ट ट्रैक कोर्ट ऐसी विशेष अदालतें हैं, जो जरूरी और गंभीर मामलों की जल्दी सुनवाई के लिए बनाई गई हैं. इनका उद्देश्य लंबित मामलों की संख्या कम करना और लोगों को समय पर न्याय दिलाना है, ताकि महत्वपूर्ण मामलों का फैसला बिना अनावश्यक देरी के हो सके.
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