करीब तीस वर्ष पुराने एक बहुचर्चित मामले में एनआईए ने अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के छह वरिष्ठ नेताओं के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल कर दिया है। यह मामला 17 जुलाई 1996 को श्रीनगर में एक मारे गए आतंकी के जनाजे के दौरान हुई हिंसा, पुलिस पर हमले, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़ा है। एनआईए का कहना है कि यह कोई अचानक भड़की भीड़ नहीं थी, बल्कि अलगाववादी सोच को हवा देने, केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने और जम्मू-कश्मीर में अपनी पकड़ दिखाने की पहले से रची गई साजिश थी।
हम आपको बता दें कि जम्मू स्थित विशेष न्यायालय में दाखिल आरोप पत्र में शब्बीर अहमद शाह, सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन, मोहम्मद याकूब वकील, जाविद अहमद मीर और शकील अहमद बख्शी के नाम शामिल हैं। हालांकि सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन और मोहम्मद याकूब वकील का मामले की सुनवाई के दौरान निधन हो चुका है, इसलिए उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही समाप्त हो गई है। इसके बावजूद जांच अभिकरण ने आरोप पत्र में उनके कथित दायित्व और साजिश में भूमिका से जुड़े साक्ष्यों का भी विस्तार से उल्लेख किया है।
एनआईए के अनुसार यह पूरा घटनाक्रम उस समय शुरू हुआ जब मारे गए आतंकी हिलाल अहमद बेग के जनाजे का जुलूस श्रीनगर के नाज चौराहे से गुजर रहा था। आरोप है कि इस जुलूस में हथियारबंद आतंकी भी आम लोगों के बीच शामिल हो गए और उन्होंने पुलिस दल पर अंधाधुंध गोलीबारी कर दी। इस हमले में कई पुलिस कर्मी घायल हुए। इसके साथ ही भारी पथराव किया गया, जिससे सरकारी वाहनों को व्यापक नुकसान पहुंचा। जांच में यह भी सामने आया कि हिंसा को सुनियोजित ढंग से भड़काया गया था ताकि कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाए।
आरोप पत्र के अनुसार जुलूस का नेतृत्व कर रहे अलगाववादी नेताओं ने भारत विरोधी, पाकिस्तान समर्थक और देश को बांटने वाली सोच को बढ़ावा देने वाले नारे लगाए। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने भाषणों में हथियार उठाने और हिंसक संघर्ष का समर्थन किया। एनआईए का कहना है कि इन भाषणों और नारों का उद्देश्य लोगों को उकसाना, सुरक्षा बलों के विरुद्ध माहौल तैयार करना और अलगाववादी विचारधारा को जन समर्थन दिलाना था।
जांच में यह भी सामने आया है कि जनाजे जैसे संवेदनशील अवसर का इस्तेमाल केवल शोक व्यक्त करने के लिए नहीं, बल्कि भीड़ को भड़काने और हिंसा फैलाने के लिए किया गया। एनआईए के अनुसार यह पूरी योजना अलगाववादी नेतृत्व की सोची समझी रणनीति का हिस्सा थी। इसका मकसद केंद्र सरकार के खिलाफ जन भावना भड़काना, सार्वजनिक अशांति फैलाना, कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर हमले के लिए लोगों को उकसाना और जम्मू-कश्मीर में हुर्रियत कांफ्रेंस के प्रभाव का प्रदर्शन करना था।
इस मामले में सभी आरोपियों पर आपराधिक साजिश रचने, हत्या के प्रयास, दंगा करने, लोक सेवकों पर हमला करने तथा गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम की संबंधित धारा के तहत आरोप लगाए गए हैं। वैसे मामला मूल रूप से घटना वाले दिन श्रीनगर के शेरगढी थाना में दर्ज किया गया था। मगर इस वर्ष अप्रैल में केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर इसकी जांच जम्मू-कश्मीर पुलिस से लेकर एनआईए को सौंप दी गई। इसके बाद मामले की नए सिरे से गहन जांच की गई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोप पत्र तैयार किया गया। इसी मामले में पिछले सप्ताह जम्मू की अदालत ने शब्बीर अहमद शाह की जमानत याचिका भी खारिज कर दी थी और उसकी न्यायिक हिरासत आगे बढ़ा दी गई।
देखा जाये तो यह घटनाक्रम एक बार फिर इस सच्चाई को सामने लाता है कि आतंकवाद और अलगाववाद केवल हथियारों के बल पर नहीं, बल्कि भीड़ को भड़काने, भावनाओं का दुरुपयोग करने और झूठे प्रचार के सहारे भी फैलाया जाता है। किसी आतंकी के जनाजे को हिंसा, पुलिस पर हमले और भारत विरोधी अभियान का मंच बनाना लोकतांत्रिक व्यवस्था और समाज दोनों के विरुद्ध गंभीर अपराध है। बहरहाल, तीन दशक बाद ही सही मगर ऐसे मामलों में साक्ष्यों के आधार पर कानूनी कार्यवाही आगे बढ़ रही है तो यह स्पष्ट संदेश है कि कानून का हाथ देर से ही सही, लेकिन दोषियों तक अवश्य पहुंचता है। अलगाववादी सोच, हिंसा और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए लोकतांत्रिक भारत में कोई स्थान नहीं है और देश की एकता, अखंडता तथा संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने वालों को अंततः न्याय के दायरे में आना ही पड़ेगा।
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राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने शिकायतकर्ता (रिविजनिस्ट) से उन न्यूज़ वीडियो क्लिप के लिंक जमा करने को कहा, जिनमें अप्रैल 2023 में कर्नाटक में एक चुनावी रैली के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का भाषण है। कोर्ट एक रिविज़न याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें खड़गे के कथित आपत्तिजनक भाषण के खिलाफ शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया गया था और उसे खारिज कर दिया गया था। इस रिविज़न याचिका में तीस हज़ारी कोर्ट द्वारा 11 नवंबर, 2025 को पारित आदेश को रद्द करने की मांग की गई है। स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने शिकायतकर्ता के वकील रविंदर गुप्ता को वीडियो लिंक जमा करने का निर्देश दिया और कहा कि वह खुद वह भाषण देखना चाहते हैं। मामले को स्पष्टीकरण के लिए 6 अगस्त को सूचीबद्ध किया गया है।
रिविज़न याचिकाकर्ता की ओर से वकील गगन गांधी पेश हुए और उन्होंने जवाबी दलीलें दीं। यह मामला अप्रैल 2023 में कर्नाटक के नरेगल में एक चुनावी रैली के दौरान खड़गे द्वारा दिए गए कथित हेट स्पीच (नफ़रत फैलाने वाले भाषण) से जुड़ा है। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पहले FIR दर्ज करने का आदेश देने से इनकार कर दिया था और बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े वकील रविंदर गुप्ता की शिकायत को खारिज कर दिया था। 2 अप्रैल को खड़गे ने रिविज़न कोर्ट के सामने अपना जवाब दाखिल किया, जिसमें उन्होंने सभी आरोपों से इनकार किया और रिविज़न याचिका पर सुनवाई करने के स्पेशल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया। जवाब में कहा गया कि हालांकि स्पेशल कोर्ट के पास MP और MLA से जुड़े मामलों की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र है, लेकिन उनके पास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) द्वारा पारित आदेशों पर रिविज़न का अधिकार क्षेत्र नहीं है।
जवाब में कहा गया, "इसलिए, मौजूदा रिविज़न याचिका BNSS, 2023 की धारा 438 (CrPC की धारा 397) के तहत सुनवाई योग्य नहीं है। खड़गे ने समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने के आरोपों से भी इनकार किया और तर्क दिया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A, 153B, 295A, 499, 120B और 34 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। जवाब में आगे कहा गया कि चुनौती दिया गया आदेश 9 दिसंबर, 2024 के उस आदेश की समीक्षा या वापसी नहीं है, जिसके माध्यम से जेएमएफसी ने एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था। जवाब में कहा गया, "इसके बजाय, यह शिकायत और सीआरपीसी की धारा 200 के तहत दर्ज बयान पर विचार करने के बाद पारित किया गया था।" इसमें यह भी कहा गया कि पुनरीक्षण याचिका में कोई दम नहीं है और इसे खारिज कर दिया जाना चाहिए। 29 जनवरी, 2026 को राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने शिकायत खारिज किए जाने के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका पर खरगे को नोटिस जारी किया। 11 नवंबर, 2025 को तीस हजारी कोर्ट ने आपराधिक शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि घृणास्पद भाषण का कोई अपराध नहीं बनता है क्योंकि भाषण किसी समुदाय या धर्म के बजाय राजनीतिक और वैचारिक सिद्धांतों पर लक्षित था। इससे पहले, 9 दिसंबर, 2024 को भी अदालत ने खरगे के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था।
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