03 जुलाई को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत है, सनातन धर्म में संकष्टी चतुर्थी के व्रत का विशेष महत्व है। ये व्रत विघ्नहर्ता और प्रथमपूज्य भगवान गणेश को समर्पित किया गया है, संकष्टी चतुर्थी का व्रत हर माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है तो आइए हम आपको कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत के बारे में
हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली चतुर्थी को ‘कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी’ के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को रखने से गणेश जी की विशेष कृपा जीवन पर बनी रहती है और घर की सुख-शांति बढ़ती है। हिंदू धर्म में गणेश जी बुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा के देवता माने जाते हैं। किसी भी शुभ और मांगलिक कार्य की शुरुआत गणेश जी की उपासना के साथ की जाती है, ऐसा करने से सभी कार्य बिना विघ्न के संपन्न होते हैं। भगवान गणेश का आह्वान कर किसी भी कार्य की शुरुआत करने से सभी बाधाओं का अंत होता है। भगवान गणेश को संकष्टी चतुर्थी व्रत समर्पित है जो हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर रखा जाता है।
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत 03 जुलाई को है, जो भगवान गणेश को समर्पित है। यह व्रत जीवन की बाधाएं दूर कर सुख-समृद्धि लाता है। इस दिन गणेश जी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। चंद्रोदय का विशेष महत्व है। ब्रह्म मुहूर्त और सर्वार्थ सिद्धि योग जैसे शुभ मुहूर्तों में गणेश पूजन अत्यंत फलदायी होता है, जिससे घर में शांति बनी रहती है।
सर्वार्थ सिद्धि योग में करें गणेश जी का पूजन
पंडितों के अनुसार इस साल की कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग बनेगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह में 05 बजकर 28 मिनट से 11 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। इस योग में गणेश जी की पूजा करें।
आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन ऐसे करें पूजा
पंडितों के अनुसार कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन सबसे पहले जल्दी उठकर घर की साफ सफाई करें और स्नान करें। फिर भगवान गणेश की पूजा के लिए संकल्प लें, इसके बाद भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर उनकी पूजा करें। पूजा में दीप, धूप, फल, फूल आदि का उपयोग करें। भगवान गणेश की कथा सुनें और भजन कीर्तन करें। व्रत के आखिर में व्रती को भगवान गणेश को अर्पित किया गया भोजन (प्रसाद) खिलाएं। इस भोजन के बाद व्रत की पूर्णता का संकल्प लें।
आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत रखने से होते हैं ये फायदे
शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत रखने और गणेश जी के ‘कृष्णपिंगल’ स्वरूप की पूजा करने से भक्तों के सभी दुखों का नाश होता है। गणेश जी का ‘कृष्णपिंगल’ स्वरूप काले वर्ण का होता है। इस रूप की पूजा करने से काम में आने वाली सभी बाधाओं और विघ्नों का अंत होता है। जो भक्त इस दिन श्रद्धा और विधि अनुसार व्रत रखें तो भय, भ्रम और मानसिक तनाव से मुक्ति मिल जाती है।
आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर ये करें, होगा लाभ
पंडितों के अनुसार इस दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ या नए वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के पूजा स्थल को साफ करके भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा के दौरान गणेश जी को दूर्वा, लाल पुष्प, सिंदूर, मोदक, लड्डू और फल अर्पित करें।
“ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। गणेश चालीसा का पाठ करने से भी विशेष फल प्राप्त होता है। यदि आपने व्रत रखा है तो पूरे दिन संयम, सात्विकता और ब्रह्मचर्य का पालन करें। संध्या के समय पुनः गणेश जी की पूजा करें और रात में चंद्र दर्शन के बाद उन्हें अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें। इसके साथ ही अपनी क्षमता अनुसार दान करना भी पुण्यकारी माना गया है।
आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर ये न करें, होगा नुकसान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन तामसिक भोजन जैसे मांस, मछली, अंडा, शराब तथा लहसुन-प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। व्रत के दौरान क्रोध, झूठ, अपशब्द और किसी का अपमान करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश पूजा में तुलसी दल अर्पित नहीं किया जाता, इसलिए इसका विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। इस दिन घर में कलह, विवाद और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक
पुराणों में कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत के विषय में यह कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार प्राचीन काल में माहिष्मती पुरी में महीजित नाम के एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। राजा बहुत धर्मात्मा और प्रजापालक थे, लेकिन वे निसंतान थे। संतान सुख न मिलने के कारण वे हमेशा दुखी रहते थे। एक दिन राजा ने अपने राज्य के विद्वानों और ब्राह्मणों से इसका समाधान पूछा। ब्राह्मणों ने राजा की भलाई के लिए उन्हें लोमश ऋषि के आश्रम में जाने की सलाह दी। राजा वन में लोमश ऋषि के पास गए और अपनी व्यथा सुनाई। राजा बोले, "हे मुनिवर! मैंने कोई पाप नहीं किया है। फिर भी मैं संतानहीन हूँ। कृपया मुझे ऐसा उपाय बताएं जिससे मुझे संतान की प्राप्ति हो।" लोमश ऋषि ने राजा को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत के बारे में बताया।
ऋषि ने कहा, "आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत करें। भगवान गणेश के 'कृष्णपिंगल' रूप का ध्यान करें। इस दिन उपवास रखें और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलें। राजा महीजित ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से रानी गर्भवती हुईं और उन्हें एक सुंदर व तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। इस कथा के अनुसार, जो भी भक्त पूरी निष्ठा से कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत करता है, उसके सभी संकट दूर हो जाते हैं।
आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन गणपति बप्पा की कृपा से बाधाएं समाप्त होती हैं और कार्यों में सफलता मिलने लगती है। यह व्रत विशेष रूप से विद्यार्थियों, नौकरीपेशा लोगों और व्यापारियों के लिए लाभकारी माना जाता है।
- प्रज्ञा पाण्डेय
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25 मई को निर्जला एकादशी व्रत है, सनातन धर्म में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर आने वाली निर्जला एकादशी अत्यंत पुण्यदायी और मंगलकारी मानी जाती है। निर्जला एकादशी आत्मशुद्धि, संयम, भक्ति और दान का दिव्य पर्व है, इस व्रत से साधक को भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है तो आइए हम आपको निर्जला एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें निर्जला एकादशी के बारे में
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निर्जला एकादशी व्रत को रखने से व्यक्ति के जीवन के बड़े से बड़े संकट दूर होते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। साल 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून को रखा जाएगी। इस साल निर्जला एकादशी व्रत की खास बात यह है कि इस दिन शुभ रवि योग का संयोग भी बन रहा है। पंडितों के अनुसार यह योग बेहद प्रभावशाली होता है, इसमें पूजा-पाठ करने से साधक को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती हैं और सभी प्रकार के दोषों से राहत मिलती हैं। हालांकि, संपूर्ण सामग्रियों के साथ पूजा करना शुभ माना जाता है।
निर्जला एकादशी पर दान का है विशेष महत्व
शास्त्रों के अनुसार निर्जला एकादशी के अवसर पर दान करने का अधिक महत्व है। दान करने से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी अधिक प्रसन्न होते हैं, जिससे दरिद्रता का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। अगर आप भी अपना जीवन खुशहाल चाहते हैं, तो निर्जला एकादशी के दिन इन विशेष चीजों का दान जरूर करें। इससे जीवन में आर्थिक उन्नति और शुभ फल की प्राप्ति होगी। निर्जला एकादशी के अवसर पर जल दान को महादान माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन जल से भरा घड़ा मंदिर या गरीब लोगों में दान करने से धन के मार्ग खुलते हैं और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। साथ ही साधक को जीवन में किसी भी चीज की कमी का सामना नहीं करना पड़ता है।
अगर आप शुभ फल की प्राप्ति चाहते हैं, तो निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद फल का दान करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन फल का दान करने से अटका हुआ धन वापस मिलता और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। अगर आप दांपत्य जीवन खुशहाल चाहते हैं, तो निर्जला एकादशी के दिन सुहागिन महिलाओं को सुहाग की सामग्री का दान करें। इसके अलावा पीले वस्त्र, चने की दाल, और हल्दी का दान भी करें। ऐसा माना जाता है कि इन चीजों का दान करने से आर्थिक तंगी की समस्या दूर होती है और दांपत्य जीवन खुशहाल होता है। जीवन में आ रहे सभी कष्टों से छुटकारा पाने के लिए एकादशी के दिन जूता या चप्पल का दान करना शुभ माना जाता है। इससे साधक के जीवन में सुख-शांति का आगमन होता है और बिगड़े काम बनते हैं। साथ ही कारोबार में सफलता प्राप्त होती है।
निर्जला एकादशी का शुभ मुहूर्त
पंडितों के अनुसार निर्जला एकादशी पर पूजा के लिए शुभ-उत्तम मुहूर्त सुबह 05:25 ए एम से 07:10 ए एम तक है। इस समय में पूजा कर सकते हैं, नहीं तो लाभ-उन्नति मुहूर्त 12:24 पी एम से 02:09 पी एम भी है। उस दिन ब्रह्म मुहूर्त 04:05 ए एम से 04:45 ए एम और अभिजीत मुहूर्त 11:56 ए एम से 12:52 पी एम तक है। एकादशी पर राहुकाल दोपहर 02:09 पी एम से 03:53 पी एम तक रहेगा।
निर्जला एकादशी का पारण
शास्त्रों के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत का पारण 26 जून शुक्रवार को होगा। पारण सुबह 05:25 ए एम से लेकर सुबह 08:13 ए एम के बीच कर सकते हैं। पारण के दिन द्वादशी का समापन रात 10:22 पी एम पर होगा।
जानें पारण का सही समय
निर्जला एकादशी का व्रत द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक खोला जाता है। स्नान, पूजा और दान के बाद ही जल और अन्न ग्रहण करना चाहिए। हिन्दू पंचांग के अनुसार 26 जून 2026 को द्वादशी तिथि पर पारण का समय प्रातः 6 बजे से 8 बजकर 39 मिनट तक शुभ माना गया है। पारण से पूर्व भगवान लक्ष्मी-नारायण की पूजा करें और तत्पश्चात अन्नदान करके व्रत खोलें।
भक्तों के पूरे साल रहता है निर्जला एकादशी का इंतजार
पंडितों के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत सभी एकादशी व्रतों में उत्तम फलदायी होता है क्योंकि जो व्यक्ति पूरे वर्ष की सभी एकादशी व्रत नहीं कर सकता है, वह केवल निर्जला एकादशी का व्रत करके सभी 24 एकादशी व्रतों का पुण्य लाभ प्राप्त कर सकता है। इसके साथ ही उसे विष्णु कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है। वेद व्यास जी की सलाह पर भीमसेन ने भी निर्जला एकादशी का व्रत रखा था, इसलिए इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। इस एकादशी के पुण्य प्रभाव को देखकर ही पूरे वर्ष निर्जला एकादशी का इंतजार रहता है।
निर्जला एकादशी पर जरूर करें ये काम, होगा लाभ
शास्त्रों के अनुसार निर्जला एकादशी के दिन व्रत रखें या न रखें, उस दिन पूजा के बाद आप जल का दान करें। पितरों को जल अर्पित करें। किसी प्यासे को पानी पिलाएं या घर के बाहर राहगीरों के लिए पानी की व्यवस्था करें। निर्जला एकादशी पर जल का दान करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलेगा और आप सुखी रहेंगे।
निर्जला एकादशी में पूजा के दौरान करें इन सामग्रियों का दान
पंडितों के अनुसार भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर, पीले पुष्प और भगवान को अर्पित करने के लिए पीले वस्त्र। इसके अलावा मौसमी फल, पंचमेवा और मिष्ठान व पीला वस्त्र, जल से भरा कलश और कुछ आम के पत्ते, नारियल, तुलसी दल और पंचामृत, पान, लौंग, सुपारी और कपूर, हल्दी, कुमकुम, अक्षत और पीला चंदन, धूप, दीपक, तिल और पूजा की मौली भी दान के लिए खास मानी जाती है। यही नहीं दान के लिए चने की दाल, गुड़, पंखा, पानी का घड़ा और पीले फल, मिठाई और लड्डू भी निर्जला एकादशी के दिन दान के लिए खास माने जाते हैं।
निर्जला एकादशी का है विशेष धार्मिक महत्व
शास्त्रों में निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाबली भीमसेन भोजन के बिना नहीं रह पाते थे, इसलिए महर्षि वेदव्यास ने उन्हें वर्ष भर की सभी एकादशियों के फल की प्राप्ति हेतु केवल एक निर्जला एकादशी का व्रत रखने का उपदेश दिया था। तभी से यह एकादशी विशेष रूप से भीमसेन एकादशी के नाम से भी विख्यात हुई। निर्जला शब्द का अर्थ है बिना जल के। इस दिन साधक सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी तक अन्न और जल दोनों का त्याग करता है। यह व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है, परंतु इसकी महिमा भी उतनी ही महान है। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि यह व्रत करने से मनुष्य के संचित पाप नष्ट होते हैं और उसे भगवान विष्णु का दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- प्रज्ञा पाण्डेय
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