कभी माता-पिता के साथ बैठकर देखने लायक फिल्में बनाना चाहते थे यश, बोले- 'इंसान बदलता है, मैं भी बदल गया हूं'
Toxic Actor Yash Interview: साउथ सिनेमा के रॉकिंग स्टार यश इन दिनों अपनी मच अवेटेड फिल्म 'टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स' को लेकर लगातार सुर्खियों में हैं. 'केजीएफ' फ्रेंचाइजी की जबरदस्त सफलता के बाद यश की अगली फिल्म को लेकर फैंस के बीच काफी एक्साइटमेंट है. इसी बीच एक्टर ने अपने करियर, सिनेमा और बदलती सोच को लेकर खुलकर बात की है.
हाल ही में 'आप की अदालत' में रजत शर्मा के साथ बातचीत के दौरान यश ने बताया कि समय के साथ उनकी सोच में कितना बदलाव आया है. एक वक्त था जब वो ऐसी फिल्में बनाना चाहते थे जिन्हें दर्शक अपने माता-पिता के साथ आराम से बैठकर देख सकें. हालांकि, अब सिनेमा और कहानी कहने को लेकर उनका नजरिया काफी बदल चुका है.
'मैं 100 प्रतिशत बदला हूं'
जब यश से उनकी बदली हुई सोच को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने बिना किसी झिझक के माना कि वो पूरी तरह बदल चुके हैं. एक्टर ने कहा, “मैं 100 प्रतिशत बदला हूं. इंसान बदलता है. अगर कोई कहता है कि मैं 20 साल में नहीं बदला, तो वो झूठ बोल रहा है.” यश के मुताबिक, किसी भी इंसान के लिए हमेशा एक जैसी सोच रखना पॉसिबल नहीं है. जैसे-जैसे व्यक्ति की जिंदगी में नए अनुभव जुड़ते हैं, वैसे-वैसे उसकी सोच भी बदलती रहती है. यही बदलाव एक इंसान के व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ उसके प्रोफेशनल फैसलों में भी दिखाई देता है.
'इवॉल्यूशन इंसानी नेचर का हिस्सा है'
यश ने अपने नजरिए में आए बदलाव को इंसान के स्वभाव से जोड़ते हुए कहा कि बदलाव और विकास मानव जीवन का हिस्सा हैं. उन्होंने समझाया कि जिन चीजों पर कोई व्यक्ति कई साल पहले विश्वास करता था, जरूरी नहीं कि आज भी वो उन्हीं विचारों के साथ खड़ा हो. एक्टर ने कहा, “इवॉल्यूशन इंसानी नेचर का हिस्सा है. हर कोई बदलता है. जिस चीज पर आप 10 साल पहले विश्वास करते थे आज वो चीज अलग हो सकती है.” यश का मानना है कि जिंदगी में आने वाले अनुभव इंसान को लगातार कुछ नया सिखाते हैं. यही अनुभव उसके नजरिए को भी प्रभावित करते हैं. इसलिए किसी व्यक्ति को उसके पुराने विचारों के आधार पर हमेशा के लिए परिभाषित नहीं किया जा सकता.
'एक हफ्ते पहले वाली सोच भी बदल सकती है'
यश ने बातचीत के दौरान एक दिलचस्प उदाहरण देकर समझाया कि इंसान की सोच बदलने में हमेशा सालों का समय नहीं लगता. कई बार कुछ दिनों, घंटों या यहां तक कि कुछ मिनटों में भी हमारा नजरिया बदल सकता है. उन्होंने कहा कि जिस चीज के बारे में कोई व्यक्ति एक हफ्ते पहले कुछ सोच रहा था, जरूरी नहीं कि आज भी वो उसी तरह सोचे. अपनी बात को समझाने के लिए यश ने इंटरव्यू का ही उदाहरण दिया. उन्होंने कहा, “10 मिनट पहले मैं सोच रहा था कि मैं हिंदी कैसे बोलूं? और अब मैं हिंदी बोल रहा हूं. ऐसा होता है. यही जिंदगी है. ये बदलती रहती है.”
माता-पिता के साथ बैठकर देखें उनकी फिल्में
यश ने ये भी बताया कि उनके करियर के एक दौर में सिनेमा को लेकर उनकी सोच काफी अलग थी. वो ऐसी फिल्में बनाना चाहते थे जिन्हें दर्शक अपने माता-पिता के साथ बैठकर आराम से देख सकें. उनकी कोशिश होती थी कि उनकी फिल्मों का कंटेंट ऐसा हो जिसे परिवार के अलग-अलग उम्र के लोग एक साथ देख सकें. उस समय उनके लिए सिनेमा का मतलब सिर्फ मनोरंजन नहीं था, बल्कि ऐसी कहानियां पेश करना भी था जिन्हें लेकर दर्शक अपने परिवार के साथ सहज महसूस करें. हालांकि, वक्त के साथ यश की सोच में बदलाव आया. अब वो कहानी को किसी एक तय दायरे में रखने के बजाय अलग-अलग तरह के विषयों और किरदारों को एक्सप्लोर करने के लिए तैयार नजर आते हैं.
सिनेमा को लेकर भी बदला नजरिया
यश की बदलती सोच का असर उनके फिल्मों के चुनाव पर भी नजर आता है. 'केजीएफ' में उन्होंने रॉकी भाई जैसा बेहद दमदार और आक्रामक किरदार निभाया, जिसने उन्हें देशभर में एक अलग पहचान दिलाई. 'केजीएफ' की सफलता के बाद यश ने अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए भी एक अलग तरह की कहानी चुनी. 'टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स' के टाइटल से ही फिल्म को लेकर दर्शकों की एक्साइटमेंट बढ़ गई है. फिल्म का निर्देशन गीटू मोहनदास कर रही हैं. ये प्रोजेक्ट यश के अब तक के करियर से अलग तरह की कहानी और दुनिया पेश करने का वादा करता है. ऐसे में यश के इंटरव्यू में कही गई 'बदलाव' वाली बात उनके मौजूदा फिल्मी सफर से भी जुड़ती नजर आती है.
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