असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस बात की जांच की मांग की है कि क्या पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने अपने कार्यकाल के दौरान नक्सलवाद के खिलाफ जानबूझकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यह टिप्पणी 17 अगस्त को चिदंबरम के उस सोशल मीडिया पोस्ट के बाद की गई, जिसमें उन्होंने खुद को दिमागी नक्सल बताया था। गुवाहाटी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सरमा ने चिदंबरम के खुद को दिए गए इस नाम की आलोचना करते हुए कहा कि पी चिदंबरम 'दिमागी नक्सल' नहीं, बल्कि पूरी तरह से नक्सल हैं। अब जब देश के गृह मंत्री रहे पी. चिदंबरम ने खुद को 'दिमागी नक्सल' कहा है, तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि क्या उन्होंने देश के गृह मंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान नक्सलवाद को खत्म करने के लिए जानबूझकर कोई कार्रवाई नहीं की थी।
यह विवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले से दिए गए स्वतंत्रता दिवस के भाषण के बाद शुरू हुआ। उन्होंने कहा कि हालांकि ग्रामीण इलाकों के जंगलों में हथियारबंद नक्सलवाद को काफी हद तक खत्म कर दिया गया है, लेकिन वैचारिक नक्सलवाद—जिसे दिमागी नक्सल कहा जाता है—ने संस्थानों, नीति बनाने वाली संस्थाओं और सार्वजनिक व्यवस्था में अपनी जगह बना ली है और देश की तरक्की में बाधा डाल रहा है। पीएम मोदी ने नागरिकों से अपील की कि वे ऐसी व्यवस्था-विरोधी सोच रखने वाले लोगों की पहचान करें और उन्हें अलग-थलग करें।
पीएम मोदी ने कहा कि सालों से सार्वजनिक जीवन में माओवादी सोच वाले लोग मौजूद रहे हैं; सरकारी समितियों में भी इस सोच ने कई संस्थानों और पहलों को प्रभावित किया है। मेरे प्यारे देशवासियों, हम 'हथियारबंद नक्सल' (armed naxal) पर काबू पाने और देश को उनसे मुक्त करने में सफल रहे हैं। भले ही ये नक्सल खत्म हो गए हों, लेकिन 'दिमागी नक्सल' (नक्सली सोच वाले लोग) मौके की तलाश में हैं, हिंसा के तरीके ढूंढ रहे हैं और देश को गलत रास्ते पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। हमें इन दिमागी नक्सलियों की पहचान करने, उन्हें अलग-थलग करने और एक विकसित देश के लिए युवाओं को एकजुट करने की ज़रूरत है।
इसके जवाब में पी. चिदंबरम ने X पर पोस्ट किया, मुझे 'दिमागी नक्सल' होने पर गर्व है! इसके अलावा, सरमा ने कांग्रेस नेताओं सोनिया गांधी और राहुल गांधी की आलोचना करते हुए उन पर देश का विरोध करने और देश का माहौल खराब करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम के गायन के दौरान सोनिया गांधी का व्यवहार यह साफ कर देता है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो देश का क्या होगा। ये लोग खुलेआम देश-विरोधी गतिविधियां कर रहे हैं, जैसे लोगों को विरोध-प्रदर्शन के लिए उकसाना और देश में अराजकता का माहौल बनाने के लिए कहना।
देशभर की राजनीति, ताज़ा घटनाओं और बड़ी खबरों से जुड़े रहने के लिए पढ़ें
National News in Hindi केवल प्रभासाक्षी पर।
Continue reading on the app
हिमालय में चीन की बढ़ती चालों के बीच भारत ने नेपाल में अपनी मौजूदगी का सबसे प्रबल संकेत देकर बीजिंग के होश उड़ा दिये हैं। काठमांडू में आज भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ की जोरदार दस्तक से पूरे दक्षिण एशिया में खलबली मचने की खबर दर्शा रही है कि नई दिल्ली और काठमांडू के संबंध दुनिया के लिए क्या मायने रखते हैं। साथ ही भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ की पहली नेपाल यात्रा ने बीजिंग को यह संदेश दे दिया है कि नेपाल में भारत के हित महज कूटनीतिक नहीं हैं, बल्कि दशकों पुराने सैन्य और संस्थागत रिश्तों पर टिके हैं। नेपाली सेना मुख्यालय में गार्ड ऑफ ऑनर और टुंडीखेल में पुष्पांजलि से लेकर शीर्ष सैन्य नेतृत्व के साथ बातचीत तक, जनरल सेठ का दौरा भारत-नेपाल की उस गहरी सैन्य साझेदारी को सामने लाता है, जिसे चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच नजरअंदाज करना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा।
हम आपको बता दें कि इस दौरे के दौरान जनरल सेठ नेपाली सेना प्रमुख से सीधी बातचीत करेंगे और सैन्य संचालन से जुड़े शीर्ष अधिकारी से साझा रणनीतिक हितों पर विस्तृत जानकारी लेंगे। इसके बाद नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल उन्हें नेपाली सेना के मानद जनरल की उपाधि देंगे। उल्लेखनीय है कि 1950 से चली आ रही यह अनोखी परंपरा भारत-नेपाल सैन्य रिश्ते की गहराई का प्रतीक है। इसका संदेश सीधा है कि दिल्ली और काठमांडू के बीच सैन्य भरोसा दशकों पुराना रिश्ता है। और हिमालय में चीन के बढ़ते दखल के बीच इस रिश्ते का मजबूत होना बीजिंग के लिए निश्चित तौर पर अच्छी खबर नहीं है।
हम आपको बता दें कि 18 अगस्त को जनरल धीरज सेठ शिवपुरी स्थित आर्मी कमांड एंड स्टाफ कोर्स के प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करेंगे और प्रशिक्षकों तथा विदेशी अधिकारी-प्रशिक्षुओं से संवाद करेंगे। वह नेपाली वरिष्ठ नेताओं के साथ भी द्विपक्षीय विषयों पर चर्चा करेंगे। 19 अगस्त को पोखरा में पूर्व सैनिक रैली में शामिल होकर वह वीर नारियों और वीरता पुरस्कार विजेताओं को सम्मानित करेंगे तथा भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों से मुलाकात करेंगे। यानी यह दौरा सिर्फ शीर्ष सैन्य नेतृत्व तक सीमित नहीं, बल्कि सैन्य शिक्षा, पूर्व सैनिक संबंधों और संस्थागत संपर्कों तक फैला हुआ है।
चीन के लिए क्यों अहम है यह रिश्ता?
भारत-नेपाल सैन्य संबंधों की मजबूती चीन के लिए इसलिए रणनीतिक चुनौती है क्योंकि नेपाल भारत और चीन के बीच स्थित हिमालयी देश है। नेपाल की विदेश नीति का घोषित आधार ‘सबसे मित्रता, किसी से शत्रुता नहीं’ रहा है। इसलिए काठमांडू किसी एक शक्ति के खेमे में जाने से बचते हुए संतुलन साधता है। लेकिन भारत और नेपाल की भौगोलिक निकटता, खुली सीमा, सामाजिक रिश्ते और सैन्य संस्थानों के बीच गहरे संपर्क इस संबंध को किसी सामान्य द्विपक्षीय साझेदारी से अलग बनाते हैं।
भारत के लिए नेपाल के साथ मजबूत सैन्य संबंध हिमालयी सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, आपदा प्रतिक्रिया, आतंकवाद-रोधी सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। चीन के दृष्टिकोण से देखें तो यही नेटवर्क भारत की उत्तरी सुरक्षा संरचना को अधिक लचीला और व्यापक बनाता है। इसलिए काठमांडू और नई दिल्ली के बीच सैन्य भरोसे की मजबूती बीजिंग के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत की सामरिक स्थिति को मजबूत करने वाला कारक है। इसे सीधे किसी सैन्य गठबंधन के रूप में देखना उचित नहीं होगा, लेकिन चीन के लिए यह निश्चित रूप से ऐसा रणनीतिक समीकरण है जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
रिश्ते की जड़ें गोरखा सैनिकों तक
भारत-नेपाल सैन्य संबंध किसी हालिया कूटनीतिक पहल की देन नहीं हैं। इनकी ऐतिहासिक नींव 18वीं सदी से चली आ रही गोरखा सैनिकों की परंपरा में मिलती है। नेपाल-निवासी गोरखा सैनिकों ने ब्रिटिश शासन के दौरान सेवा की और 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय सेना में अपनी भूमिका जारी रखी। समय के साथ इन सैनिकों ने पारंपरिक युद्ध से लेकर बदलते सुरक्षा वातावरण तक विभिन्न अभियानों में योगदान दिया। इस विरासत ने दोनों सेनाओं के बीच पेशेवर, संस्थागत और पारिवारिक संबंधों का एक अनोखा ताना-बाना बनाया।
वहीं भारतीय सेना ने नेपाली सेना के आधुनिकीकरण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। प्रशिक्षण, हथियार और उपकरणों की आपूर्ति तथा सैन्य संस्थानों के बीच पेशेवर संपर्कों ने नेपाली सेना की क्षमता और संगठनात्मक ढांचे को विकसित करने में भूमिका निभाई। नेपाली सेना की प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक प्रणालियों में भारतीय सैन्य अनुभव की छाप भी दिखाई देती है।
‘सूर्य किरण’ से शांति अभियानों तक
भारत-नेपाल सैन्य सहयोग का सबसे दिखाई देने वाला चेहरा संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘सूर्य किरण’ है। दिसंबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच इसका 18वां संस्करण आयोजित किया गया। इन अभ्यासों का उद्देश्य दोनों सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाना है, विशेषकर आपदा प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी अभियानों और हिंसक उग्रवाद जैसी चुनौतियों से निपटने में। साथ ही दोनों देश संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भी बड़े सैन्य योगदानकर्ता हैं। दोनों देशों के बीच का सहयोग द्विपक्षीय संबंधों को संयुक्त राष्ट्र और व्यापक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था तक विस्तार देने की क्षमता रखता है।
इसके अलावा, नियमित उच्चस्तरीय सैन्य दौरे दोनों देशों के बीच संस्थागत संवाद को जीवित रखते हैं। मानद जनरल की परंपरा इस भरोसे का प्रतीक है, जबकि संयुक्त अभ्यास और प्रशिक्षण उस भरोसे को व्यावहारिक सैन्य क्षमता में बदलते हैं। यही वजह है कि जनरल धीरज सेठ का नेपाल दौरा केवल तीन दिन की औपचारिक यात्रा नहीं है। यह भारत-नेपाल सैन्य रिश्ते की ऐतिहासिक निरंतरता, वर्तमान सामरिक जरूरतों और भविष्य की सुरक्षा साझेदारी का संकेत है। हिमालय में बदलते शक्ति-संतुलन के बीच भारत और नेपाल का यह सैन्य संवाद जितना गहरा होगा, दोनों देशों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए उसका महत्व उतना ही बढ़ेगा और चीन के लिए दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक गणित को साधना उतना ही कठिन होगा।
Continue reading on the app