Nag Panchami 2026 Katha: कैसे पृथ्वी पर आए नाग? जानें इनकी उत्पत्ति से जुड़ी यह रहस्यमयी कहानी
Nag Panchami 2026 Katha: आज नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा अवश्य करनी चाहिए. हर साल सावन महीने की पंचमी तिथि पर नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है. यह पर्व नागों को समर्पित होता है. हिंदू धर्म में नाग-नागिनों की पूजा का खास महत्व होता है. वह देवता कहलाते हैं. यह दिन उनकी उपासना के लिए बेहद खास माना जाता है. यह पर्व उनकी उपासना करने हेतु अत्यंत पावन अवसर कहलाता है. जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष, राहु-केतु की अशुभ स्थिति या फिर सर्पों से डर या भय रहता है, वह आज के दिन नाग देवता की पूजा जरूर करते हैं. हिंदू पौराणिक कथाओं में हमें कुछ शक्तिशाली नागों का वर्णन मिलता है जैसे वासुकी, शेषनाग, तक्षक नाग और कर्काटोक नाग इत्यादि. इन्हें महानाग कहते हैं, जिनके बारे में आज हम जानेंगे. इनके पृथ्वी पर जन्म लेने से लेकर उनके जीवन के बारे में बताएंगे.
धरती पर नागों की उत्पत्ति कैसे हुई थी?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सत्युग में राजा दक्ष की दो सुंदर पुत्रियां थीं- कद्रू और विनता. दोनों बहनें अत्यंत रूपवान और गुणवान थीं. इन दोनों बहनों का विवाह आगे चलकर महर्षि कश्यप से हुआ था. एक दिन महर्षि कश्यप अपनी दोनों पत्नियों से प्रसन्न होकर बोले कि तुम दोनों की जो भी इच्छा है, वह वर मुझसे मांग लों. इस बात को सुनकर कद्रू और विनता प्रसन्न हो गई और अपना वर मांगने लगी. कद्रू ने महर्षि कश्यप से एकसमान तेज और पराक्रम वाले एक हजार नाग पुत्रों की कामना जाहीर की और विनता ने बुद्धिमान, शरीर और पराक्रम में कद्रु के पुत्रों से श्रेष्ठ पुत्रों की कामना की. महर्षि कश्यप ने दोनों पत्नियों को इच्छानुसार वर दे दिए.
महर्षि कश्यप ने दिया वरदान
दोनों ही वरदान पाकर प्रसन्न हो गई थीं. इसके बाद महर्षि कश्यप ने अपनी दोनों पत्नियों से कहा कि वे धैर्यपूर्वक अपने गर्भ की रक्षा करें, इसके बाद वे तपस्या करने चले गए. कुछ समय बिता और फिर कद्रु ने एक हजार अंडे दिए और विनता न दो अंडे दिए. दोनों ने अपने-अपने अंडों को सुरक्षि स्थान पर रख दिया. लंबे समय प्रतीक्षा करने के बाद करीब पांच सौ वर्षों के बाद कद्रू के एक हजार अंडों से पुत्रों का जन्म होने लगा. जबकि विनता के अंडे अब भी नहीं फूट रहे थे.
इससे विचलित विनता ने जल्दबाजी में आकर खुद की एक अंडे को फोड़ दिया. अंडे में विस्फोट हुआ और उसमे से एक बालक प्रकट हुआ. यह बालक अरुण था. अरुण बालक के पैरों से निचला हिस्सा विकसित नहीं हुआ था. अपनी मां की इस जल्दबाजी को देख अरुण क्रोधित हो गया और उसने उन्हें श्राप दे दिया. अरुण ने कहा "मां तुम्हारे अधीर होने की वजह से मेरा शरीर पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाया है, इसलिए मैं आपको श्राप देता हूं कि आप अपनी सौतन यानी बहन कद्रू की 500 वर्षों तक दासी बनकर रहोगी" हालांकि, उसने इससे समाधान का भी उपाय दिया था. उसने बोला कि यदि तुम्हारा दूसरा पुत्र होता है तो वह तुम्हे दासता से मुक्ति दिलाएगा. अगर तुम उसे भी समय से पहले ही फोड़ दोगी तो उसका भी वहीं हाल होगा, जो मेरा हुआ. इसलिए, धैर्य रखना ही तुम्हारी परीक्ष है. इसके बाद अरुण आकाश में उड़ गए और आगे चलकर अरुण सूर्यदेव के रथ के सारथी बने थे.
दूसरे अंडे से गरुड़ का जन्म होता है. गरुड़ अत्यंत शक्तिशाली और तेजस्वी पुत्र था. उसने जन्म लेते ही अपने पराक्रम से सभी देवी-देवताओं को चकित कर दिया था. गरुड़ आगे चलकर भगवान विष्णु के वाहन बने और आज के समय में लगभग हर विष्णु मंदिर में गरुड़ स्तंभ होते हैं.
क्या विनता दासी बनीं?
आगे चलकर इस कथा में प्रसंग आता है जिसमें विनता अपनी ही बहन की दासी बनने को मजबूर हो गई. उस वक्त देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया. समुद्र मंथन से अनेक दिव्य वस्तुओं का प्राक्ट्य हुआ था. उसमें से एक सफेद अश्व की भी उतपत्ति हुई थी. इस अश्व का नाम उच्चै:श्र्वा था. इस अश्व को देखते ही कद्रू ने विनता से कहा बहन बताओं की इसका रंग कैसा है? विनता ने कहा अश्व का रंग पूरा सफेद है. लेकिन कद्रू ने कहा कि उसका शरीर सफेद है लेकिन पूंछ काली है. दोनों बहनों के बीच इस बात का विवाद हो गया. आखिर में दोनों ने शर्त लगाई कि यदि विनता की बात सही निकली को कद्रू उसकी दासी बनेगी और कद्रू की बात सही हुई तो विनता उसकी दासी बनेगी.
कद्रू ने किया छल
अब दोनों बहनें उत्सुक्ता के साथ अगले दिन का इंतजार करने लगी ताकि अश्व को देख सके. कद्रू मन ही मन सोचने लगी कि यदि उसकी बहन की बात सही निकली तो उसे विनता का दासी बनना पड़ेगा. इसलिए, उसने अपने 1000 पुत्रों से कहा कि वे अगले दिन काले बालों का रूप लेकर घोड़े की पूंछ से लिपट जाएं ताकि उसकी पूंछ काली दिखाई दें. मगर कद्रु के कुछ पुत्रों ने अपनी माता की इस बात को नहीं माना और उनका साथ देने से इनकार कर दिया, इससे क्रोधित कद्रू ने नागों को श्राप दे दिया कि वे द्वापर युग में पांडव वंश में जन्में राजा जनमेजय सर्प यज्ञ में प्रज्वलित अग्नि में भस्म हो जाएंगे. मां के इस भयंकर श्राप को सुन नाग पुत्र चिंता में पड़ गए. तभी कर्कोटक नाग ने अपनी मां से कहा कि आप चिंता न करें मैं काले बालों को रूप लेकर अश्व की पूंछ से लिपट जाऊंगा, जिससे अश्व की पूंछ काली दिखाई देगी.
अगले दिन जब सूर्योदय हुआ तो कद्रू और विनता शर्तानुसार, अश्व को देखने गए. वहां पहुंचकर विनता ने देखा कि अश्व की पूंछ काली है. यह देख विनता समझ गई कि वह शर्त हार चुकी हैं और उसने अपनी हार स्वीकार कर ली. विनता ने कहा मैं शर्त हार गई हूं तो अब शर्त के अनुसार मैं आपकी दासी हूं.
विनता को कैसे मिली दासता से मुक्ति
विनता को अपनी बहन की दासी बनकर रहना पड़ा, जब गरुड़ अपनी माता की दासिता के बारे में पता चला तो उसने अपने अद्भुत पराक्रम से मां को मुक्त किया. उसने लंबे समय के बाद देवताओं से अमृत हासिल किया और उन्हें नागों के सामने रख दिया. इससे विनता दासता से मुक्त हो गई. गरुड़ के अद्भुत पराक्रम और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना वाहन बना दिया. आज हिंदू धर्मं गरुड़ देव भी पूजनीय माने जाते हैं.
कद्रू के पुत्रों का क्या हुआ?
कद्रू के पुत्र आगे चलकर शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कालिया जैसे नाग बनें. इन नागों का वर्णन कई कथाओं में मिलता है.
वासुकी नाग- यह नाग महादेव के गले की शोभा बढ़ाता है और नागों का राजा कहलाता है.
शेषनाग- इन्हें आदिशेष या अनंत भी कह जाता है. इन्हें भी नागों के राजा के समान माना जाता है. ये भगवान विष्णु की शैय्या बनते हैं और क्षीर सागर में उनके साथ रहते हैं. मान्यता है कि इनके सिरों और शरीर की कोई सीमा नहीं है. ऐसा माना जाता है कि ये अपने हजार फनों पर पूरी पृथ्वी को संभाले हुए हैं. उन्होंने लक्ष्मण और बलराम के अवतार में जन्म भी लिया है.
तक्षक नाग- इस नाग को पाताल लोक के अष्टनागों में से प्रमुख और शक्तिशाली नागराज माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह अत्यंत विषैले, क्रोधी और चतुर थे. पांडवों द्वारा खांडव प्रस्थ जलाए जाने पर तक्षक कुरुक्षेत्र में थे, जिससे उनकी जान बच गई थी, लेकिन अग्नि से उनकी पत्नी और कई प्रजा नष्ट हो गई थी. माना जाता है कि अब भी तक्षक नाग की मृत्यु नहीं हुई है.
कालिया नाग- आपने कालिया मर्दन के बारे में सुना ही होगा. यह द्वापर युग में वृंदावन की यमुना नदी में रहने वाला एक विषैला और भयंकर नाग था. इसके विष से यमुना का जल उबलता था और जहरीला हो गया था. वह पहले रमणीक द्वीप में रहता था लेकिन गरुड़ के भय से वह यमुना में बस गया. श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को परास्त किया और वे उसके फनों पर चढ़कर नृत्य करने लगे, जिससे कालिया के अहंकार का नाश हुआ. अंत में कालिया की पत्नियों की प्रार्थना पर श्रीकृष्ण ने उसके प्राण नहीं लिए, पर उसे यमुना छोड़कर रमणक द्वीप या समुद्र चले जाने का आदेश दिया.
कर्कोटक नाग- यह नाग आठ प्रमुख नाग कुलों में से एक है. यह अत्यधिक बलशाली और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में पूज जाता है.
हिंदू धर्म की शक्तिशाली नागिन कौन थीं?
सनातन धर्म की शक्तिशाली नागिन मां मनसा देवी को माना जाता है. मनसा देवी को सबसे शक्तिशाली नाग देवी या नागिन माना जाता है. उन्हें भगवान शिव की मानस पुत्री भी कहा जाता है. वह नागों के राजा वासुकी की बहन और महर्षि जरत्कारु की पत्नी थी. भक्त इनसे सर्प दंश से रक्षा, आरोग्य, संतान प्राप्ति और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.
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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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