बरसात के समय डेंगू का जोखिम अधिक बढ़ जाता है। डेंगू का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छे परेशान हो जाते हैं। इसको लेकर प्लेटलेट्स कम होने की चिंता सताने लगती है। इस बीमारी में प्लेटलेट्स का घटना आम बात है, लेकिन हर मरीज में इसकी स्थिति एक जैसी नहीं होती है। अक्सर प्लेटलेट्स कम होने के बाद मरीज की हालत सामान्य रहती है, बल्कि कुछ मामलों में दूसरे लक्षण ज्यादा गंभीर करते हैं।
इस मौसम में शरीर में होने वाले बदलावों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। खासकर बुखार के दिनों में मरीज की स्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। प्लेटलेट्स के लेकर अक्सर लोगों के मन में कई सवाल आते हैं, जैसे कि डेंगू में प्लेटलेट्स कब गिरती है, कितनी प्लेटलेट्स खतरनाक मानी जाती हैं और प्लेटलेट्स कम होने पर क्या करें? आइए आपको बताते हैं किन लक्षणों को देखकर तुरंत सावधान रहने की जरुरत है।
डेंगू में प्लेटलेट्स कब गिरती है?
असल में डेंगू की शुरुआत में तेज बुखार 2 से 7 दिनों तक रहता है। बीमारी के तीसरे से सातवें दिन के आसपास, खासकर जब बुखार कम होने लगता है, क्रिटिकल फेज शुरु हो सकता है। इसी दौरान प्लेटलेट काउंट तेजी से गिर जाती है। WHO के मुताबिक, वाइट रक्त कोशिकाओं में कभी के बाद प्लेटलेट्स में तेजी से गिरावट देखी जाती है।
अगर आप डेंगू को सिर्फ एक प्लेटलेट रिपोर्ट देखकर खतरे का अनुमान लगाना सही नहीं है। डॉक्टर प्लेटलेट्स के साथ हीमेटोक्रिट (HCT), ब्लड प्रेशर, नाड़ी, पेशाब की मात्रा, शरीर में पानी की स्थिति और मरीज के लक्षणों को भी देखते हैं। प्लेटलेट्स तेजी से गिरने के साथ ही हीमेटोक्रिट बढ़ना प्लाज्मा लीकेज की ओर इशारा करता है।
कितनी प्लेटलेट्स कम होना चिंता की बात
यदि प्लेटलेट्स लगातार तेजी से गिर रही हैं या साथ में ब्लीडिंग , लो ब्लड प्रेशर, सांस लेने में परेशानी या अधिक कमजोरी जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं, ऐसे में तुरंत डॉक्टर को दिखाना जरुरी है।
इन लक्षणों के बाद तुरंत डॉक्टर को दिखाएं
- तेज या काफी से लगातार पेट दर्द होना
- बार-बार या लगातार उल्टी होना
- मसूड़ों या नाक से खून आना
- उल्टी या मल में खून
- अक्सर सांस तेजी से चलना या सांस लेने में परेशानी
- बहुत ज्यादा कमजोरी, सुस्ती या बैचेनी
- अत्यधिक प्यास लगना
- त्वचा का पीला, ठंडा या चिपचिपा पड़ना
- शरीर में पानी जमा होने के संकेत
प्लेटलेट्स बढ़ाने के लिए क्या करें?
अगर डेंगू में प्लेटलेट्स अधिक बढ़ गई हैं, तो मरीज को डॉक्टर की सलाह के अनुसार पर्याप्त तरल पदार्थ और आराम देना महत्वपूर्ण है। डिहाड्रेशन से बचने के लिए पानी, ORS और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए तरल पदार्थ का सेवन करना उचित माना जाता है।
वहीं, पपीते के पत्ते या दूसरे घरेलू नुस्खों को प्लेटलेट्स बढ़ाने का प्रमाणित इलाज मानकर डॉक्टर की निगरानी को नजरअंदाज नहीं करें। प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन भी हर ऐसे मरीज को सिर्फ कम प्लेटलेट काउंट के आधार पर नहीं दिया जाता है, इसका निर्णय डॉक्टर मरीज की पूरी स्थिति और ब्लीडिंग के जोखिम को देखकर किया जाता है।
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अक्सर महिलाएं तब गुस्सा होती हैं, या चिढ़ती हैं या इमोशनल होती हैं, तो उनके पार्टनर या आसपास के लोग सवाल करते हैं कि पीरियड्स की वजह से चिढ़ रही हो। या तुमको पीरियड्स आए हैं क्या। हालांकि पीरियड्स के दौरान महिलाओं को मूड स्विंग्स होते हैं। कई बार उनका छोटी-छोटी बातों पर रोना आता है या तेज गुस्सा आता है। लेकिन महिलाओं के इमोशंस को पीरियड्स से जोड़ देना सही नहीं है।
इसका महिलाओं की मेंटल हेल्थ पर भी असर होता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा हैं कि इस तरह के कमेंट्स किस तरह से महिलाओं की मेंटल हेल्थ को प्रभावित करते हैं।
महिलाएं व्यक्त नहीं कर पातीं अपनी फीलिंग्स
पीरियड्स होने से पहले भावनात्मक बदलावों को यह कहकर टाल देना कि 'तुमको तो पीरियड हो रहा है' या फिर उनके इमोशनल होने को पीरियड से जोड़ देना गलत होता है। भले ही पीरियडस में होने वाले हार्मोनल बदलाव का असर मूड पर पड़ता है। लेकिन सभी भावनात्मक प्रतिक्रियाएं बायोलॉजिकल नहीं होती हैं। वहीं सभी महिलाओं में एक तरह के लक्षण भी नहीं दिखते हैं।
जब महिलाओं द्वारा अपनी फीलिंग्स शेयर करने पर उसको पीरियड्स से जोड़ दिया जाए, तो कई बार महिलाएं मदद लेने से हिचकिचा जाती हैं। इस तरह से वह अपने इमोशंस को अपने मन में रखती हैं। जिसका उनकी मेंटल हेल्थ पर भी असर होता है।
हर बात को हार्मोन से जोड़ना
महिलाओं की हर बात, नाराजगी या गुस्से को सिर्फ हार्मोन्स से जोड़ देना बात की गंभीरता को खत्म करता है। इससे वह खुद में बुरा महसूस करने लगती हैं।
कम होने लगता है आत्मविश्वास
जब कई बार आप महिलाओं की असल परेशानी को इस तरह से नकार देते हैं, तो महिलाओं का सेल्फ कॉन्फिडेंस भी कम होने लगता है। उनको ऐसा महसूस होता है कि शायद उनका गुस्सा या इमोशंस सही नहीं है। जिस कारण वह खुद को कम आंकने लगती हैं।
इन बातों का रखें ध्यान
साथ ही एक बात का और भी ध्यान रखना चाहिए कि पीरियड्स के दिनों में ज्यादा मूड स्विंग्स होना सही नहीं है। भले ही पीएमएस नॉर्मल है। लेकिन प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर या मूड डिसऑर्डर जैसी स्थितियां नॉर्मल नहीं हैं अगर इमोशंस पर काबू करना मुश्किल हो जाता है और रोजाना के कामों में भी मुश्किल होने लगे, तो इस चीज को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर की सलाह लेना चाहिए।
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