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Partition Horrors Remembrance Day I 1947 में लिए गये Congress के गलत फैसले की कीमत आज भी चुका रहा है भारत

1947 का भारत विभाजन इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है। लाखों लोग अपने घर-परिवार, जमीन-जायदाद छोड़ने पर मजबूर हुए, लाखों लोगों की हत्या हुई और करोड़ों लोग विस्थापन की त्रासदी से जूझे। यह एक ऐसा स्थायी घाव था, जो आज भी भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है। देखा जाये तो कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने अंग्रेजों द्वारा पेश किए गए विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार कर ऐतिहासिक भूल की थी, जिसकी कीमत देश आज भी चुका रहा है।

14 अगस्त को मनाया जाने वाला विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस इसी त्रासदी की मानवीय कीमत को याद करने का अवसर है। भारत सरकार ने 2021 में इस दिवस की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य केवल उन लोगों को श्रद्धांजलि देना नहीं है, जिन्होंने जान गंवाई या अपना घर छोड़ा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह समझाना भी है कि सांप्रदायिक नफरत, हिंसा और राजनीतिक विभाजन किस भयावह परिणाम तक पहुंच सकते हैं।

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हम आपको याद दिला दें कि 1947 में विभाजन के समय पंजाब और बंगाल सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में रहे। परिवार बिछड़े, गांव और संपत्तियां सीमा के दो हिस्सों में बंट गईं और लाखों लोगों को अचानक अनिश्चित भविष्य की ओर पलायन करना पड़ा। विभाजन के कारणों को लेकर इतिहास में अलग-अलग व्याख्याएं देखने को मिलती हैं। मुस्लिम लीग की दो-राष्ट्र सिद्धांत की राजनीति, पाकिस्तान नामक अलग देश की मांग, सांप्रदायिक तनाव और ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति इसके प्रमुख संदर्भ रहे। 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन योजना की घोषणा की और इसके बाद रैडक्लिफ आयोग ने भारत-पाकिस्तान की सीमा निर्धारित की। सीमाएं इतनी तेजी से खींची गईं कि लाखों लोग अपनी जमीन, पहचान और सुरक्षा को लेकर असमंजस में पड़ गए।

यहीं से कांग्रेस नेतृत्व के फैसले पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मांग और ब्रिटिश जल्दबाजी के सामने विभाजन स्वीकार करके उस विचार को अप्रत्यक्ष मान्यता दी कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते। वहीं विभाजन समर्थक इतिहासकारों का कहना है कि उस समय व्यापक हिंसा, राजनीतिक गतिरोध और ब्रिटिश सत्ता की वापसी की जल्दबाजी के बीच एकीकृत भारत को बनाए रखना अत्यंत कठिन हो चुका था। इसलिए यह बहस आज भी जारी है कि क्या विभाजन टाला जा सकता था या वह उस समय की परिस्थितियों का लगभग अपरिहार्य परिणाम बन चुका था।

विभाजन की राजनीतिक कीमत के साथ इसकी भू-राजनीतिक कीमत भी सामने आई। पाकिस्तान के अस्तित्व ने भारत के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में नई सुरक्षा चुनौतियां पैदा कीं। कश्मीर विवाद ने 1947 के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों को स्थायी तनाव में बदल दिया। इसके बाद 1947-48, 1965, 1971 और 1999 के युद्ध हुए तथा सीमा पार आतंकवाद लंबे समय तक राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती बना रहा। पाकिस्तान के साथ स्थायी सुरक्षा तनाव ने भारत के संसाधनों पर भी अतिरिक्त दबाव डाला और रक्षा व्यय का बड़ा हिस्सा इस चुनौती से निपटने में लगा।

महात्मा गांधी का दृष्टिकोण भी इस पूरी कहानी को एक अलग नैतिक आयाम देता है। वह धर्म के आधार पर देश के विभाजन के विरोधी थे और ऐसी स्वतंत्रता चाहते थे, जिसमें शांति, सद्भाव और समानता हो। 15 अगस्त 1947 को उनका दिल्ली के सत्ता-केंद्रित समारोहों में शामिल नहीं होना इसी पीड़ा की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि वह मानते थे कि यह वह ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ नहीं थी जिसके लिए उन्होंने सत्याग्रह और असहयोग आंदोलनों की अगुवाई की थी।

साथ ही, इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने जिन देशों में विभाजन कराया उनमें भारत का विभाजन ही सबसे रक्तरंजित रहा। लाखों जानें गईं, करोड़ों लोग बेघर हुए और पीढ़ियों तक घाव ताजा रहे। यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कांग्रेस का तत्कालीन नेतृत्व अंग्रेजों की चाल और उनकी ‘फूट डालो, राज करो’ नीति को भली-भांति समझता था, तब भी उन्होंने विभाजन का खुलकर विरोध क्यों नहीं किया था? क्या यह राजनीतिक थकान थी, साम्प्रदायिक हिंसा के दबाव में लिया गया समझौता था? या फिर सत्ता तक शीघ्र पहुंचने की अधीरता थी? जो भी कारण रहे हों, उनका परिणाम आज भी भारत भुगत रहा है। देखा जाये तो इतिहास के उस मोड़ पर लिया गया निर्णय न केवल तत्कालीन पीढ़ी के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी स्थायी संकट का कारण बन गया।

बहरहाल, 79 साल बाद भी विभाजन के सवाल खत्म नहीं हुए हैं। कश्मीर, सीमा पार आतंकवाद, रक्षा बोझ, सामाजिक अविश्वास और राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे इस इतिहास की लंबी छाया की याद दिलाते हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा सबक यही है कि राजनीतिक फैसलों के परिणाम केवल तत्कालीन पीढ़ी तक सीमित नहीं रहते। इसलिए 14 अगस्त का विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल शोक का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन भी है। साथ ही उन लाखों लोगों को नमन करने का दिन भी है जिन्होंने अपनी जान, घर और पहचान खोई; और यह संकल्प लेने का दिन भी है कि इतिहास की त्रासदियों को दोहराने की बजाय उनसे सीख लेकर भारत की एकता, सामाजिक सद्भाव और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को और मजबूत किया जाए।

-नीरज कुमार दुबे

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बांग्लादेश में 10-10 घंटे बिजली कट रही:सरकार ने रात 8 बजे बाजार बंद करने का आदेश दिया, भारत से डीजल सप्लाई बढ़ाने की मांग

बांग्लादेश में बिजली संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। देश के कई हिस्सों में रोज 8 से 10 घंटे तक बिजली कट रही है। इसका सबसे ज्यादा असर राजधानी ढाका के बाहर ग्रामीण इलाकों में देखने को मिल रहा है। तेज गर्मी और हीटवेव ने लोगों की परेशानी और बढ़ा दी है। बिजली की कमी से निपटने के लिए सरकार ने बुधवार से देशभर में शॉपिंग मॉल, बाजार और दुकानों को रात 8 बजे तक बंद करने का आदेश दिया है। बिजली संकट से निपटने के लिए बांग्लादेश ने अब भारत से अतिरिक्त डीजल देने की मांग की है। गैस की कमी से 1,500 मेगावाट बिजली कम बनी बांग्लादेश में बिजली संकट की सबसे बड़ी वजह ईंधन की कमी है। खासकर प्राकृतिक गैस की कमी ने बिजली उत्पादन को प्रभावित किया है। बांग्लादेश अपने इस्तेमाल का 90% से ज्यादा तेल और करीब 30% गैस दूसरे देशों से खरीदता है। मौजूदा संकट के पीछे दो बड़ी वजहें… पहली वजह- अमेरिकी कंपनी एक्सेलरेट एनर्जी के LNG टर्मिनल में 21 जुलाई को आग लग गई। इसके बाद टर्मिनल बंद हो गया था। इस हफ्ते की शुरुआत में यहां कुछ काम दोबारा शुरू हुआ, लेकिन तब तक LNG की सप्लाई आधी रह गई थी। दूसरी वजह- समुद्र में खराब मौसम की वजह से कम से कम दो LNG जहाज टर्मिनल तक नहीं पहुंच पाए और अपना माल नहीं उतार सके। दूसरे देशों से आने वाली बिजली की सप्लाई भी कम हुई है। इन वजहों से बांग्लादेश में बिजली उत्पादन करीब 1,500 मेगावाट घट गया है। ग्रामीण इलाकों में ज्यादा कटौती बांग्लादेश में बिजली की सप्लाई छह वितरण कंपनियां करती हैं। राजधानी ढाका को फिलहाल उसकी जरूरत के मुताबिक बिजली मिल रही है। लेकिन ढाका के बाहर ग्रामीण इलाकों में करीब 80 बिजली सहकारी समितियां सप्लाई करती हैं। मयमनसिंह, बरिशाल, रंगपुर, सिलहट, राजशाही और खुलना में बिजली संकट का ज्यादा असर है। ज्यादातर इलाकों में रोज 3 से 5 घंटे बिजली कट रही है। वहीं खुलना में लोगों ने 9 से 10 घंटे तक बिजली गुल रहने की शिकायत की है। नाराज लोगों ने बिजली घरों पर हमला किया लगातार बिजली कटने से लोगों में गुस्सा भी बढ़ रहा है। कुछ इलाकों में नाराज लोगों ने बिजली से जुड़ी फैसिलिटी पर हमला किया है। कई जगहों पर तोड़फोड़ और आगजनी की भी खबरें सामने आई हैं। इसके बाद बिजली विभाग ने सुरक्षा के लिए पुलिस से मदद मांगी है। बिजली कटौती का असर सिर्फ घरों तक सीमित नहीं है। खेती, रेस्टोरेंट और कारखानों का काम भी प्रभावित हो रहा है। किसानों को बिजली की जगह डीजल जनरेटर चलाने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है। झींगा पालने वाले किसानों की परेशानी और ज्यादा है। बिजली जाने पर पानी में ऑक्सीजन पहुंचाने वाली मशीनें बंद हो जाती हैं। इससे पानी में ऑक्सीजन कम होने लगती है और झींगों के मरने का खतरा बढ़ जाता है। बांग्लादेश दुनिया में झींगा निर्यात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। देश के कपड़ा और गारमेंट उद्योग पर भी बिजली संकट का असर पड़ रहा है। यह सेक्टर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है। बिजली बचाने के लिए सरकार ने लगाई पाबंदियां सरकार को फिलहाल बिजली संकट से जल्द राहत मिलने की उम्मीद कम है। इसलिए बिजली की खपत घटाने के लिए कई पाबंदियां लगाई गई हैं। ऐसा कदम बांग्लादेश में पहले भी उठाया जा चुका है। कुछ महीने पहले अप्रैल में ऊर्जा संकट बढ़ने के दौरान सरकार ने दुकानों और शॉपिंग मॉल को शाम 6 बजे तक बंद करने का आदेश दिया था। भारत से और ज्यादा डीजल की मांग बांग्लादेश के ऊर्जा मंत्री इकबाल हसन महमूद ने पिछले हफ्ते भारतीय हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी से मुलाकात के दौरान ज्यादा डीजल की मांग रखी थी। महमूद ने पत्रकारों से कहा कि भारत के साथ एक पाइपलाइन है, जिससे बांग्लादेश को डीजल मिलता है। उन्होंने भारत से इसकी सप्लाई बढ़ाने का अनुरोध किया है। भारत और बांग्लादेश के बीच इंडिया-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन 2017 में शुरू हुई थी। दोनों देशों के बीच 15 साल का समझौता है। इसके तहत भारत को हर साल बांग्लादेश को 1.80 लाख मीट्रिक टन डीजल देना है। पश्चिम एशिया में हालिया संकट के दौरान भारत मार्च और अप्रैल में बांग्लादेश को पहले ही 30 हजार टन से ज्यादा डीजल भेज चुका है। ----------------- यह खबर भी पढ़ें… शेख हसीना बोलीं- दिसंबर में बांग्लादेश लौटूंगी: 2 साल बाद वर्चुअल भाषण दिया, कैमरा ऑफ था; बांग्लादेश सरकार बोली- दिल्ली में बैठकर जहर उगला बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दो साल बाद लोगों को वर्चुअली संबोधित किया। जब हसीना बोल रही थीं, उस दौरान उनका कैमरा बंद था। पूरी खबर पढ़ें…

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संजीव गोयनका के लिए जो ऋषभ पंत नहीं कर पाए वो जोस बटलर ने कर दिखाया, पहली बार किसी टूर्नामेंट में चैंपियन बनी सुपरजायंट्स की टीम

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