Responsive Scrollable Menu

साइबर लिटरेसी- मोबाइल टावर लगाने के नाम पर फ्रॉड:मोटी कमाई के लालच में न आएं, एक्सपर्ट से समझें कि इस स्कैम से कैसे बचें

फर्ज करिए, आपके पास खेत, खाली प्लॉट या मकान की बड़ी छत है। एक दिन अचानक कॉल या मैसेज आता है कि आप वहां मोबाइल टावर लगवाकर हर महीने 30-50 हजार रुपए किराया कमा सकते हैं। कई लोग बिना कोई जांच-पड़ताल किए इस आकर्षक ऑफर पर भरोसा कर लेते हैं। इसी भरोसे का फायदा उठाकर जालसाज ठगी को अंजाम दे रहे हैं। वे खुद को किसी टेलीकॉम कंपनी या सरकारी विभाग का अधिकारी बताकर मोटे किराये, एडवांस पेमेंट और नौकरी का लालच देते हैं। इसके बाद रजिस्ट्रेशन, प्रोसेसिंग फीस, एनओसी या सिक्योरिटी डिपॉजिट के नाम पर पैसे ऐंठते हैं। कई मामलों में आधार, पैन और जमीन के डॉक्यूमेंट्स लेकर पहचान और आइडेंटिटी से जुड़ी धोखाधड़ी भी करते हैं। हाल ही में प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने भी इसे लेकर अलर्ट जारी किया है। इसलिए ‘साइबर लिटरेसी’ कॉलम में आज हम टावर लगाने के नाम पर होने वाले इस स्कैम के बारे में बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट: राहुल मिश्रा, साइबर सिक्योरिटी एडवाइजर, उत्तर प्रदेश पुलिस सवाल- मोबाइल टावर लगाने के नाम पर फ्रॉड कैसे हो रहा है? जवाब- ठग पहले लोगों का भरोसा जीतते हैं। फिर फर्जी दस्तावेज और बड़े किराये का लालच देकर लोगों को फंसाते हैं। इसके बाद अलग-अलग बहानों से पैसे और जरूरी दस्तावेज मांगते हैं। पूरा स्कैम ग्राफिक में देखिए- सवाल- ठग लोगों को किस तरह अपने जाल में फंसाते हैं? जवाब- पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- जालसाज किन लोगों को ज्यादा निशाना बनाते हैं? जवाब- ठग आमतौर पर ऐसे लोगों को निशाना बनाते हैं, जिनके पास खेत, खाली प्लॉट या बड़ी छत होती है। वे ऐसे लोगों को भी टारगेट करते हैं, जिन्हें इस तरह के स्कैम की जानकारी कम होती है। इनमें शामिल हैं- सवाल- ठग टावर लगवाने के लिए कौन-से डॉक्यूमेंट्स मांगते हैं और इन्हें शेयर करने के क्या रिस्क हैं? जवाब- ठग टावर लगवाने के नाम पर प्रॉपर्टी और आइडेंटिटी से जुड़े डॉक्यूमेंट्स मांगते हैं। बाद में ठगी और ब्लैकमेलिंग के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं। ग्राफिक में पूरे डॉक्यूमेंट्स की लिस्ट देखिए- सवाल- ठग किन बहानाें से पैसे मांगते हैं? जवाब- ठग पैसे ऐंठने के लिए अलग-अलग फीस और चार्ज का बहाना बनाते हैं, जैसेकि- याद रखें, कोई भी वैध टेलीकॉम कंपनी टावर लगाने के लिए मकान मालिक से इस तरह की फीस नहीं मांगती है। सवाल- अगर कोई मोबाइल टावर लगाने का ऑफर दे तो क्या करें? जवाब- बिना आवेदन के मोबाइल टावर लगाने का ऑफर आमतौर पर फर्जी होता है। अगर ऐसा ऑफर आए तो- सवाल- मोबाइल टावर के नाम पर होने वाले स्कैम से कैसे बचें? जवाब- मोबाइल टावर लगाने का कोई भी ऑफर मिलने पर पहले उसकी पूरी जांच-पड़ताल करें। थोड़ी सावधानी आपको बड़े नुकसान से बचा सकती है। इसलिए ग्राफिक में दी गई कुछ बातों का खास ध्यान रखें- सवाल- क्या टेलीकॉम कंपनियां टावर लगाने के लिए सीधे लोगों से संपर्क करती हैं? जवाब- बड़ी टेलीकॉम कंपनियां या उनके अधिकृत इंफ्रास्ट्रक्चर पार्टनर तय प्रक्रिया के तहत काम करते हैं। वे व्यक्तिगत रूप से लोगों से संपर्क नहीं करते हैं। अगर कोई कॉल, मैसेज या फर्जी कागजात के जरिए आकर्षक ऑफर का लालच देता है, तो वह फ्रॉड है। सवाल- क्या असली मोबाइल कंपनियां टावर लगाने के लिए पैसे मांगती हैं? जवाब- नहीं, वैध कंपनियां जमीन या छत उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति से रजिस्ट्रेशन, प्रोसेसिंग, एनओसी, सिक्योरिटी डिपॉजिट या इंस्टॉलेशन फीस नहीं मांगतीं। अगर कोई पहले पैसे जमा करने की बात कहे तो वह फ्रॉड है। सवाल- क्या सरकारी विभाग या DoT मोबाइल टावर लगाने के लिए कोई NOC जारी करता है? जवाब- मोबाइल टावर लगाने की प्रक्रिया में अलग-अलग स्थानीय निकायों और संबंधित नियमों के अनुसार अनुमति ली जाती है। लेकिन कोई सरकारी विभाग या DoT (डिपार्टमेंट ऑफ टेलिकम्युनिकेशन) फोन, वॉट्सएप या ईमेल के जरिए मोबाइल टावर लगाने के लिए NOC जारी करने के नाम पर पैसे नहीं मांगता। अगर कोई NOC या सरकारी मंजूरी के बदले फीस जमा करने को कहे, तो वह फ्रॉड है। सवाल- फर्जी एग्रीमेंट, लेटर या सरकारी डॉक्यूमेंट की पहचान कैसे करें? जवाब- ठग अक्सर ऐसे डॉक्यूमेंट तैयार करते हैं, जो पहली नजर में असली लगते हैं। इसलिए केवल लेटरहेड या मुहर देखकर भरोसा न करें। ग्राफिक में फर्जी दस्तावेज पहचानने के टिप्स देखिए- सवाल- अगर गलती से पैसे दे दिए हैं तो क्या करें? जवाब- सबसे पहले घबराएं नहीं। जितनी जल्दी कार्रवाई करेंगे, पैसे वापस मिलने की संभावना उतनी ज्यादा होगी। ऐसी स्थिति में- सवाल- मोबाइल टावर फ्रॉड की शिकायत कहां और कैसे करें? जवाब- पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- मोबाइल टावर लगवाने की सही प्रक्रिया क्या है? जवाब- पॉइंटर्स से पूरी प्रक्रिया समझिए- सवाल- मोबाइल टावर लगवाने पर लगभग कितना किराया मिलता है? जवाब- मोबाइल टावर का किराया किसी तय दर पर नहीं होता। यह शहर, इलाके, जमीन या छत के आकार, नेटवर्क की जरूरत और कंपनी की शर्तों पर निर्भर करता है। अलग-अलग क्षेत्रों में यह राशि अलग हो सकती है। ………………………… ये खबर भी पढ़ें… साइबर लिटरेसी- वॉट्सएप पर 'बॉस बनकर' कर रहे ठगी:स्कैमर ZIP फाइल भेजकर प्रोफेशनल्स को बनाते निशाना, जानें इस स्कैम से कैसे बचें फर्ज करिए, आप जॉब करते हैं। अचानक आपके बॉस के नाम से वॉट्सएप पर ZIP फाइल के साथ एक मैसेज आता है- "इसे तुरंत चेक करें।" ऐसे में संभव है कि आप इसे जरूरी ऑफिस फाइल समझकर बिना ज्यादा सोचे-समझे डाउनलोड कर लें। ये खबर भी पढ़ें…

Continue reading on the app

Partition Horrors Remembrance Day I 1947 में लिए गये Congress के गलत फैसले की कीमत आज भी चुका रहा है भारत

1947 का भारत विभाजन इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है। लाखों लोग अपने घर-परिवार, जमीन-जायदाद छोड़ने पर मजबूर हुए, लाखों लोगों की हत्या हुई और करोड़ों लोग विस्थापन की त्रासदी से जूझे। यह एक ऐसा स्थायी घाव था, जो आज भी भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है। देखा जाये तो कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने अंग्रेजों द्वारा पेश किए गए विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार कर ऐतिहासिक भूल की थी, जिसकी कीमत देश आज भी चुका रहा है।

14 अगस्त को मनाया जाने वाला विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस इसी त्रासदी की मानवीय कीमत को याद करने का अवसर है। भारत सरकार ने 2021 में इस दिवस की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य केवल उन लोगों को श्रद्धांजलि देना नहीं है, जिन्होंने जान गंवाई या अपना घर छोड़ा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह समझाना भी है कि सांप्रदायिक नफरत, हिंसा और राजनीतिक विभाजन किस भयावह परिणाम तक पहुंच सकते हैं।

इसे भी पढ़ें: World Organ Donation Day 2026: अंगदान की संस्कृति ही मानवता को नई दिशा दे सकती है

हम आपको याद दिला दें कि 1947 में विभाजन के समय पंजाब और बंगाल सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में रहे। परिवार बिछड़े, गांव और संपत्तियां सीमा के दो हिस्सों में बंट गईं और लाखों लोगों को अचानक अनिश्चित भविष्य की ओर पलायन करना पड़ा। विभाजन के कारणों को लेकर इतिहास में अलग-अलग व्याख्याएं देखने को मिलती हैं। मुस्लिम लीग की दो-राष्ट्र सिद्धांत की राजनीति, पाकिस्तान नामक अलग देश की मांग, सांप्रदायिक तनाव और ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति इसके प्रमुख संदर्भ रहे। 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन योजना की घोषणा की और इसके बाद रैडक्लिफ आयोग ने भारत-पाकिस्तान की सीमा निर्धारित की। सीमाएं इतनी तेजी से खींची गईं कि लाखों लोग अपनी जमीन, पहचान और सुरक्षा को लेकर असमंजस में पड़ गए।

यहीं से कांग्रेस नेतृत्व के फैसले पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मांग और ब्रिटिश जल्दबाजी के सामने विभाजन स्वीकार करके उस विचार को अप्रत्यक्ष मान्यता दी कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते। वहीं विभाजन समर्थक इतिहासकारों का कहना है कि उस समय व्यापक हिंसा, राजनीतिक गतिरोध और ब्रिटिश सत्ता की वापसी की जल्दबाजी के बीच एकीकृत भारत को बनाए रखना अत्यंत कठिन हो चुका था। इसलिए यह बहस आज भी जारी है कि क्या विभाजन टाला जा सकता था या वह उस समय की परिस्थितियों का लगभग अपरिहार्य परिणाम बन चुका था।

विभाजन की राजनीतिक कीमत के साथ इसकी भू-राजनीतिक कीमत भी सामने आई। पाकिस्तान के अस्तित्व ने भारत के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में नई सुरक्षा चुनौतियां पैदा कीं। कश्मीर विवाद ने 1947 के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों को स्थायी तनाव में बदल दिया। इसके बाद 1947-48, 1965, 1971 और 1999 के युद्ध हुए तथा सीमा पार आतंकवाद लंबे समय तक राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती बना रहा। पाकिस्तान के साथ स्थायी सुरक्षा तनाव ने भारत के संसाधनों पर भी अतिरिक्त दबाव डाला और रक्षा व्यय का बड़ा हिस्सा इस चुनौती से निपटने में लगा।

महात्मा गांधी का दृष्टिकोण भी इस पूरी कहानी को एक अलग नैतिक आयाम देता है। वह धर्म के आधार पर देश के विभाजन के विरोधी थे और ऐसी स्वतंत्रता चाहते थे, जिसमें शांति, सद्भाव और समानता हो। 15 अगस्त 1947 को उनका दिल्ली के सत्ता-केंद्रित समारोहों में शामिल नहीं होना इसी पीड़ा की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि वह मानते थे कि यह वह ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ नहीं थी जिसके लिए उन्होंने सत्याग्रह और असहयोग आंदोलनों की अगुवाई की थी।

साथ ही, इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने जिन देशों में विभाजन कराया उनमें भारत का विभाजन ही सबसे रक्तरंजित रहा। लाखों जानें गईं, करोड़ों लोग बेघर हुए और पीढ़ियों तक घाव ताजा रहे। यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कांग्रेस का तत्कालीन नेतृत्व अंग्रेजों की चाल और उनकी ‘फूट डालो, राज करो’ नीति को भली-भांति समझता था, तब भी उन्होंने विभाजन का खुलकर विरोध क्यों नहीं किया था? क्या यह राजनीतिक थकान थी, साम्प्रदायिक हिंसा के दबाव में लिया गया समझौता था? या फिर सत्ता तक शीघ्र पहुंचने की अधीरता थी? जो भी कारण रहे हों, उनका परिणाम आज भी भारत भुगत रहा है। देखा जाये तो इतिहास के उस मोड़ पर लिया गया निर्णय न केवल तत्कालीन पीढ़ी के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी स्थायी संकट का कारण बन गया।

बहरहाल, 79 साल बाद भी विभाजन के सवाल खत्म नहीं हुए हैं। कश्मीर, सीमा पार आतंकवाद, रक्षा बोझ, सामाजिक अविश्वास और राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे इस इतिहास की लंबी छाया की याद दिलाते हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा सबक यही है कि राजनीतिक फैसलों के परिणाम केवल तत्कालीन पीढ़ी तक सीमित नहीं रहते। इसलिए 14 अगस्त का विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल शोक का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन भी है। साथ ही उन लाखों लोगों को नमन करने का दिन भी है जिन्होंने अपनी जान, घर और पहचान खोई; और यह संकल्प लेने का दिन भी है कि इतिहास की त्रासदियों को दोहराने की बजाय उनसे सीख लेकर भारत की एकता, सामाजिक सद्भाव और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को और मजबूत किया जाए।

-नीरज कुमार दुबे

Continue reading on the app

  Sports

बांग्लादेश ने खत्म किया इन 2 खिलाड़ियों का करियर? ऑस्ट्रेलिया की हार के बाद लटकी तलवार

बांग्लादेश ने 23 साल बाद ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया और पहले ही टेस्ट मैच में ऑस्ट्रेलिया को करारी शिकस्त दे दी. इस एक शिकस्त ने ऑस्ट्रेलियाई टीम में बदलाव की मांग को तेज कर दिया है. Mon, 17 Aug 2026 00:39:34 +0530

  Videos
See all

Weather Update: मूसलाधार बारिश का आया अलर्ट? | Heavy Rain Alert | IMD | Monsoon 2026 #tmktech #vivo #v29pro
2026-08-16T23:00:11+00:00

Jharkhand Protest | Ranchi में बेहद गुस्से में प्रदर्शनकारी छात्र.. Rahul-Soren का पुतला जलाया ! #tmktech #vivo #v29pro
2026-08-16T22:54:14+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers