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Sawan 2026: सावन में जन्मे लोगों का जिद्दी स्वभाव है Lord Shiva का प्रभाव, जानिए क्या कहता है Skanda Purana

हिंदू धर्म में सावन का महीना बेहद पावन और पवित्र माना जाता है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित होता है। ऐसे में इस महीने जन्मे लोगों में भगवान शिव के स्वभाव का प्रभाव होता है। स्कंद पुराण के 'माहेश्वर खंड' और इसके तहत आने वाले 'केदार खंड' और 'श्रावण माहात्म्य' के अध्यायों में भगवान शिव और मां पार्वती की कृपा और भक्तों में पाए जाने वाले लक्षणों का उल्लेख मिलता है।

पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जिन लोगों का सावन महीने में जन्म होता है, वह स्वभाव से जिद्दी होते हैं। जिद्दी से ज्यादा यह लोग दृढ़ संकल्प वाले होते हैं। यह एक बार जो ठान लेते हैं, वह पूरा करके ही दम लेते हैं। इसलिए कई बार इनके स्वभाव में जिद्दीपन भी झलकता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको सावन में जन्मे लोगों के स्वभाव और विशेषता के बारे में बताने जा रहे हैं।

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भगवान शिव का प्रभाव

सावन में जन्मे लोगों में भगवान शिव की ऊर्जा जुड़ी होती है। यह लोग शांत लेकिन गंभीर स्वभाव के होते हैं। इन लोगों का गुण होता है कि यह लोग जो बोलते हैं वहीं करते भी हैं।

आत्‍मविश्‍वास से भरपूर

सावन के महीने में जन्मे लोग आत्मविश्वास से भरे होते हैं। इन लोगों को अपने लक्ष्यों को पूरा करना बहुत अच्छे से आता है। वहीं अच्छी बात यह है कि यह लोग कभी भ्रमित नहीं होते हैं। कई बार लोग इनके काम करने के तरीके को देखकर इनको अहंकारी भी कहते हैं। लेकिन यह सच नहीं होता है।

इमोशनल होते हैं ऐसे लोग

सावन के महीने में जन्मे लोग स्वभाव से काफी ज्यादा इमोशनल होते हैं। इनके लिए रिश्ते बेहद जरूरी होते हैं और किसी भी भौतिक सुख से ज्यादा यह जातक अपने रिश्तों को महत्व देते हैं। संवेदनशील होने की वजह से कई बार लोग इनका गलत फायदा भी उठा लेते हैं।

सावन में जन्मे लोग जिद्दी नहीं बल्कि अपनी जुबान के पक्के होते हैं। यह लोग एक बार जो सोच लेते हैं, उसको पूरा करने की जिद पकड़ लेते हैं।

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Shravan Special: महादेव पूजा में वर्जित हैं ये चीजें, Shiv Puja में न करें ये Mistakes

श्रावण मास भगवान शिव को अति प्रिय है। इस महीनें चारों-तरफ भक्ति, हरियाली और सुकून देने वाला वातावरण होता है। सावन के महीने में कई व्रत-त्योहार आते हैं। साधक अपनी मानोकामना पूर्ण करने के लिए सोमवार के व्रत रखते हैं और महादेव को प्रसन्न करने के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करना बेहद आसान है, क्योंकि उनके नाम में ही उनका स्वभाव काफी भोला है। महादेव को प्रसन्न करना बेहद सरल है। भगवान शिव को  दिखावटी या खर्चीले अनुष्ठान के बजाय एक लोटा जल में ही खुश हो जाते हैं। लेकिन शिव की पूजा में कुछ खास बातों का जरुर ध्यान रखा जाता है। आइए आपको बताते हैं 10 गलतियां, जिन्हें आप अक्सर करते होंगे

शिव पूजा में भूलकर भी न करें 9 गलतियां

तुलसी या तुलसी दल का प्रयोग
सनातन धर्म में तुलसी को अत्यंत पवित्र मानी जाती है। भगवान विष्णु की पूजा में मुख्य रुप से तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, भगवान शिव की पूजा में तुलसी अर्पित करना वर्जित माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव की पूजा में भूलकर भी तुलसी या उसके पत्तों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

हल्दी और कुमकुम के प्रयोग से बचें
भूलकर भी भगवान शिव की पूजा में हल्दी या कुमकुम का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। क्योंकि भगवान शिव वैरागी और संहारक का देवता माने जाते है। बल्कि कुमकुम या हल्दी सुहाग, गृहस्थ प्रसाधन, सौंदर्य और सौभाग्य की वस्तुएं हैं।

केतकी और केवड़े के फूल
शिव पुराण के अनुसार, महादेव की पूजा में हमेशा फूलों का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए। इसलिए भूलकर भी केतकी या केवड़े के सुंगधित फूलों को अर्पित नहीं करना चाहिए। माना जाता है कि इसके पीछे भगवान शिव से जुड़ा एक श्राप है जिस कारण केतकी के फूलों को शिवलिंग पर अर्पित करना वर्जित है।

नारियल का पानी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को साबुत नारियल चढ़ाया जा सकता है, लेकिन नारियल का पानी चढ़ाना अशुभ माना जाता है। शिवलिंग पर चढ़ाई गई वस्तुएं निवेद्य या निर्माल्य बन जाती है, जिन्हें ग्रहण करना मना है। इसलिए नारियल पानी का इस्तेमाल अभिषेक करने के बाद ग्रहण करने लायक नहीं होता है। इसी कारण से नारियल पानी के अभिषेक से बचें।

शंख का पानी
वैसे कई पूजा-पाठ में सभी देवी-देवताओं का अभिषेक शंख में पानी भरकर किया जाता है, लेकिन शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाना अशुभ माना जाता है। कहा जाता है कि, पूर्व काल में भगवान शिव ने शंखचूड़ नाम का दैत्य का वध किया था। जिस कारण शंख को उसी दैत्य के अंश का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार, शंख को माता लक्ष्मी का भाई माना जाता है। असल में समुद्र मंथन के दौरान निकलने वाले चौदह रत्नों में माता लक्ष्मी और शंख दोनों की उत्पत्ति एक साथ हुई थी। इसलिए भी शंख से जलाभिषेक नहीं किया जाता।

टूटे हुए अक्षत
हिंदू धर्म में पूजा-पाठ में अक्षत जरुर अर्पित किए जाते हैं। वहीं, शिवलिंग पर टूटे हुए या खंडित अक्षय अर्पित करना अशुभ माना जाता है।

लौह के पात्र में जल
जब आप शिवलिंग पर जल अर्पित करें, तो कांसे या तांबे के पात्र से ही जल अर्पित करें। लौह पात्र से जल अर्पित करना अशुभ माना जाता है। क्योंकि महादेव ने त्रिपुर जो सोना, चांदी और लोहा से बने था, उसका संहार किया था और त्रिपुरारि कहलाए। 

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