उमरिया में भारी बारिश का असर, नदी के तेज बहाव में बहा पुल का हिस्सा, ग्रामीणों की बढ़ी परेशानी, प्रशासन अलर्ट
उमरिया: इन दिनों मध्यप्रदेश में लगातार हो रही भारी बारिश का असर कई जिलों में देखने को मिल रहा है। कई स्थानों पर बाढ़ जैसे हालात बन गए हैं जबकि नदी-नाले उफान पर हैं। जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हालात को देखते हुए प्रशासन ने लोगों से घरों में रहने और सावधानी बरतने की अपील की है। इसी बीच, तेज बारिश का असर मध्यप्रदेश के उमरिया जिले में भी देखने को मिल रहा है जहां लगातार बारिश के चलते जनजीवन प्रभावित हुआ है।
बता दें कि उमरिया जिले में लगातार हो रही भारी बारिश के चलते जिले के नदी-नाले उफान पर हैं। बारिश और तेज जलभराव के कारण कई गांवों का जिला मुख्यालय से संपर्क टूट गया है। वहीं, कुछ स्थानों पर पुल-पुलिया क्षतिग्रस्त होकर पानी के तेज बहाव में बह गई हैं। इसके चलते ग्रामीणों को आवागमन में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
मिली जानकारी के अनुसार, मानपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम बरतराई में झिरझिरी नदी के ऊपर प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत हाल ही में बनी पुलिया के कई हिस्से तेज बहाव में बह गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि नदी में अचानक बढ़े जलस्तर के कारण स्थिति गंभीर हो गई है और ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर नदी-नालों को पार करना पड़ रहा है।
भारी बारिश के बीच प्रशासन अलर्ट
लगातार बारिश को देखते हुए जिला प्रशासन भी पूरी तरह अलर्ट है। प्रशासन ने आपदा प्रबंधन समिति की बैठक कर अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए हैं। साथ ही लोगों से नदी, नाले और तेज बहाव वाले स्थानों को पार नहीं करने की अपील की गई है। नदी-नालों के आसपास रहने वाले लोगों को सतर्क रहने और आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षित स्थानों पर जाने के निर्देश दिए जा रहे हैं।
इसके साथ ही प्रशासन ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे बारिश के दौरान सावधानी बरतें और नदी-नालों के बढ़े जलस्तर से दूर रहें, ताकि किसी भी तरह की जनहानि को रोका जा सके। फिलहाल जिले में अभी भी बारिश का दौर जारी है।
Middle East conflict: पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत का बड़ा कदम, रिफायनरी कंपनियों के लिए LPG उत्पादन कोटा तय
Middle East conflict: पश्चिम एशिया में उपजे तनाव और संघर्ष के कारण आयातित रसोई गैस (LPG) की आपूर्ति में आई बाधाओं से सबक लेते हुए केंद्र सरकार ने पहली बार सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की रिफाइनरियों के साथ-साथ upstream कंपनियों के लिए भी अधिकतम एलपीजी उत्पादन के लक्ष्य निर्धारित किए हैं। सरकार का मुख्य उद्देश्य देश के भीतर एक मजबूत घरेलू आपूर्ति बफर तैयार करना है ताकि भविष्य में किसी भी संकट से निपटा जा सके।
21 रिफाइनरियों और कंपनियों के लिए तय हुआ कोटा
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा 13 अगस्त को जारी एक आदेश के अनुसार, कुल 21 रिफाइनरियों और कंपनियों के लिए अधिकतम एलपीजी उत्पादन सीमा तय की गई है। इनकी कुल निर्धारित उत्पादन क्षमता 63,810 टन प्रतिदिन आंकी गई है, जो 31 मार्च, 2026 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष के दौरान भारत के कुल घरेलू एलपीजी उत्पादन से दोगुने से भी अधिक है और देश की दैनिक खपत का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा है। ये उत्पादन सीमाएं केवल तभी लागू होंगी जब आपूर्ति को लेकर किसी प्रकार का संकट उत्पन्न होगा।
रिलायंस को मिला सबसे बड़ा कोटा
सरकारी क्षेत्र की 18 रिफाइनरियों के लिए संयुक्त रूप से 31,470 टन प्रतिदिन का एलपीजी उत्पादन लक्ष्य तय किया गया है। निजी क्षेत्र की बात करें तो गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज की घरेलू बाजार में उत्पाद बेचने वाली 33 मिलियन टन वार्षिक क्षमता वाली डीटीए रिफाइनरी को 18,000 टन प्रतिदिन का सबसे बड़ा लक्ष्य सौंपा गया है। इसके बाद बीपीसीएल की कोच्चि रिफाइनरी का लक्ष्य 4,800 टन और रूस के रोसनेफ समर्थित नायरा एनर्जी की वाडिनार रिफाइनरी का लक्ष्य 4,480 टन प्रतिदिन तय किया गया है। इसके अलावा ओएनजीसी और गेल जैसी अपस्ट्रीम गैस कंपनियों को सामूहिक रूप से 6,460 टन प्रतिदिन का लक्ष्य दिया गया है।
बुनियादी ढांचे और तकनीकी अपग्रेड पर जोर
मंत्रालय के आदेश में साफ कहा गया है कि सभी सार्वजनिक, संयुक्त उद्यम और निजी रिफाइनरिंग कंपनियों के साथ-साथ अपस्ट्रीम कंपनियों को भी एलपीजी के भंडारण, निकासी और परिवहन के लिए खुद या अन्य माध्यमों (जैसे रेलवे या रोड टैंकरों) के जरिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा विकसित करना और उसे बनाए रखना होगा। इसके अलावा कंपनियों को नेफ्था-से-एलपीजी रूपांतरण और पेट्रो-फ्लुइड कैटालिटिक क्रैकिंग जैसी तकनीकों का उपयोग करके एलपीजी उत्पादन को अधिकतम करने का निर्देश दिया गया है।
आयात पर निर्भरता और ईरान युद्ध का असर
वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान भारत ने कुल 33.2 मिलियन टन एलपीजी की खपत की थी, जो औसतन 91,000 टन प्रतिदिन बैठती है। इसमें से 13.1 मिलियन टन सालाना स्थानीय स्तर पर उत्पादित हुआ था जबकि 21.3 मिलियन टन का आयात किया गया था। देश की 64 प्रतिशत से अधिक की इस भारी आयात निर्भरता के कारण, ईरान युद्ध की शुरुआत से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने पर गंभीर संकट खड़ा हो गया था, क्योंकि इसी रास्ते से भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत आयात सऊदी अरब जैसे देशों से मंगाता था। उस दौरान सरकार को पेट्रोकेमिकल धाराओं को मोड़ने और औद्योगिक आपूर्ति सीमित करने जैसे आपातकालीन कदम उठाने पड़े थे।
हर छह महीने में होगी उत्पादन लक्ष्यों की समीक्षा
भविष्य में इस तरह के किसी भी संकट से बचने के लिए सरकार ने इन उत्पादन लक्ष्यों की हर छह महीने पर समीक्षा करने का निर्णय लिया है। नई रिफाइनरियों, नए तेल-गैस क्षेत्रों और तकनीकी उन्नयन से पैदा होने वाली अतिरिक्त क्षमता को इसमें शामिल किया जाएगा। इस प्रकार सरकार ने पश्चिम एशिया संकट के दौरान उठाए गए अस्थायी कदमों को एक स्थायी सुरक्षा तंत्र में बदलने का प्रयास किया है ताकि घरेलू उपभोक्ताओं को भविष्य में कभी भी गैस की कमी या रेशनिंग का सामना न करना पड़े।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
Mp Breaking News
Haribhoomi










