एक दिन आप सुबह-सुबह सोकर उठे देखा तो हर तरफ हड़कंप मचा था जानने की इच्छा हुई कि आखिर हुआ क्या आंख मलते हुए मोबाइल पर तुरंत न्यूज़ पढ़ी तो होश उड़ गए खबर थी कि दुनिया में कच्चा तेल खत्म यानी पेट्रोल डीजल कुछ भी नहीं बचा बूंद भर भी नहीं सुनकर टेंशन तो होगी घर के दरवाजे पर कार खड़ी है बाइक खड़ी है अब उनका क्या होगा लेकिन कुछ देर की टेंशन थी जो दो बातें सोचकर कम हुई पहली अरे यह दर्द केवल हमारा थोड़ी है यह तो जगत भर की समस्या है। दूसरा कोई नहीं सीएनजी और इलेक्ट्रिक कार्स तो मार्केट में आ गई हैं घर की लाइट और एसी वसी भी चल रहा है तेल रुकने से यह कुछ भी बंद नहीं हुआ लेकिन कुछ रोज महंगाई का सामना करना पड़ेगा क्योंकि कुछ समय के लिए सही देश की अर्थव्यवस्था के चक्के तो जम ही जाएंगे। लेकिन कुल मिलाकर ऐसा कुछ नहीं होगा जिससे आपको यह लगे कि आप 170 साल पहले पहुंच गए 170 साल पहले की बात इसलिए क्योंकि तब पेट्रोल और डीजल कुछ भी इजाद नहीं हुआ था या कहिए खोजा नहीं गया था। बल्ब भी नहीं जला था, पंखा भी नहीं था और एसी भी नहीं था। लेकिन तब लोग जीते कैसे थे। क्या रात को घरों में अंधेरा ही रहता था? अगर नहीं तो रातों को घरों में रोशनी आखिर होती कैसे थी फिर केरोसिन ऑइल यानी मिट्टी के तेल की खोज कैसे हुई और फिर किसका दिमाग घूमा और दुनिया बदलने वाले पेट्रोल डीजल की खोज हुई। तो चलिए, आज ग्लोब को थोड़ा घुमाते हैं और चलते हैं इतिहास के उस दौर में... जहाँ से इंसानियत का यह 'ऑयल एडवेंचर' शुरू हुआ था। लेकिन इस 'ब्लैक गोल्ड' यानी कच्चे तेल की कहानी सिर्फ कुओं से निकलने वाले काले गाढ़े लिक्विड की नहीं है... यह कहानी है इंसानी लालच, महाशक्तियों के दबदबे और दुनिया को मुट्ठी में करने की जंग की!
तेल की खोज कैसे हुई
आधुनिक युग शुरू होने से हजारों साल पहले तेल और गैस का उपयोग कुछ क्षमता में किया गया था। तेल के कुएं 347 ईसवीं में चीन में खोदे गए। लेकिन आधुनिक इतिहास की शुरुआत जब हुई तब तेल और गैस लोगों की जिंदगी से गायब थे। 15वीं और 16वीं शताब्दी में हाल यह था कि अंधेरा होते ही लोग घरों से बाहर निकलना कम कर देते थे। आगे चलके एक नया जमाना आया नया आविष्कार हुआ। साल 1700 से 1850 तक वेल मछली का तेल चलन में आया लैंप जलाने के लिए इसका इस्तेमाल हुआ। बड़ी संख्या में वेल का शिकार होने लगा। इस तेल की कई कंपनीज थी। छोटी-छोटी बॉटल्स में ये तेल बिका करता। दुनिया में अमेरिका इस कारोबार में नंबर वन था। उस समय वेल के तेल की इंडस्ट्री अमेरिका में पांचवी सबसे बड़ी इंडस्ट्री थी। समुद्र में वेल पकड़ने वाले करीब 900 जहाज घूमा करते जिनमें से 700 से ज्यादा केवल यूएस के थे। लेकिन इतना बड़ा पाप आखिर कब तक कोई होने देता कुछ लोगों को वेल का शिकार किया जाना पसंद नहीं आता था और वो लगे थे फ्यूल का दूसरा विकल्प ढूंढने में 1846 में कनाडा के आविष्कारक और भूवैज्ञानिक अब्राहम पाइ नियो गेसनर ने इस काम में कामयाबी हासिल की उन्होंने लैंप जलाने के लिए नया फ्यूल ईजाद किया कय खोजा इब्राहम ने कोयला कोलतार और ऑयल शेल को रिफाइन करके केरोसीन ऑयल यानी मिट्टी का तेल बना लिया इसे बनाना आसान था। साल 1852 दुनिया बदलने का साल यही था अमेरिका के प्रोफेसर जॉर्ज बिसल को कहीं से पता लगा था कि पेंसिलवेनिया के कुछ दूर दराज वाले इलाकों में लोगों को अजीब सा कोई चिकना पदार्थ जमीन से निकलता दिखाए। पेंसिल्वेनिया के अलग-अलग इलाकों में तेल की खोज का कई महीनों काम हुआ लेकिन कुछ मिला नहीं। फिर आया 28 अगस्त 18590 फीट की ड्रिलिंग हो चुकी थी फिर बेटे ने ड्रिलिंग पाइप जमीन में डाला और पाइप में फसी मिट्टी निकालने के लिए उसे ऊपर खींचा। मिट्टी के साथ पाइप के निचले हिस्से में एक बदबूदार तल पदार्थ भी लगा हुआ था।
ओपैक क्या है
ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज। हिंदी में कहें तो तेल निर्यात करने वाले देशों का संगठन या समूह। दुनिया के 11 मेजर ऑयल प्रोड्यूसिंग देश सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, अल्जीरिया, लिबिया, नाइजीरिया, द रिपब्लिक ऑफ कांगो, इक्वेटोरियल, गिनी, गेबोन और वेनेजुएला। यह मिलकर तय करते हैं कि इस महीने हम सब दुनिया में कितना कच्चा तेल देंगे। इन्हें दाम ऊपर करने होते हैं तो सप्लाई को टाइट कर देते हैं। दाम इजी करने होते हैं तो सप्लाई बढ़ा देते हैं। इसकी जो शुरुआत थी वो हुई थी 1960 में बगदाद में जब पांच देशों ने मिलकर इसे बनाया था। ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला इसमें शामिल थे। इन देशों का मकसद एक था तेल की कीमतें कैसे तय हो, कितना तेल निकाला जाए, कितना प्रोड्यूस किया जाए, यह फैसला अमेरिका और यूरोप की बड़ी कंपनियों के हाथ से वापस लेकर खुद करना। यूएई 1967 में इसमें शामिल हुआ। आज ओपेक में 12 देश हैं और दुनिया का करीब 38% तेल यही ग्रुप प्रोड्यूस करता है।
ओपक प्लस क्या है?
इसके अलावा एक और ग्रुप है जिसका नाम है ओपेक प्लस। उसमें थोड़े से और देश हैं वो मिलकर भी कच्चे तेल की सप्लाई को अफेक्ट करते हैं। उसमें है रूस, कजाकिस्तान, अज़रबजान, मेक्सिको, ओमान, बरीन, मलेशिया, ब्रूने, दक्षिण सूडान और सूडान। ओपेक एक कार्टल की तरह काम करता था। इसकी असली ताकत थी इसका डिसिप्लिन। 2016 के आसपास ओपेक ने रूस जैसे कुछ बड़े गैर ओपेक तेल उत्पादक देशों के साथ एक एक्सटेंडेड अलायंस बनाया था। इसी को कहा जाता है ओपेक प्लस। यह ग्रुप मिलकर तय करता है कि दुनिया में कितना तेल बेचा जाएगा ताकि कीमतें ना बहुत ज्यादा गिरे और ना बहुत ज्यादा चढ़े। यूएई ने अब इन देशों से नाता तोड़ने का फैसला कर लिया है।
यूएई और सऊदी अरब में मतभेद
ओपेक पर सऊदी अरब का वर्चस्व है। सऊदी अरब ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए ओपेक देशों से उत्पादन कम करने की नीति को मंजूरी दिला दी। इसके अलावा दोनों देशों में यमन और सूडान में सैन्य टकराव और क्षेत्रीय नेतृत्व को लेकर होड़ है। जनवरी 2026 की शुरुआत में, सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के हद्रा मौत प्रांत में यूएई समर्थित सदन ट्रांजिशनल काउंसिल के ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। तब सऊदी अरब ने यूएई पर यमन में अलगाववादी समूहों को हथियारों की आपूर्ति करने और अपने देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया था।
यूएई के बाहर होने से क्या?
यूएई के ओपेक से बाहर निकलने से पूरा गेम बदल सकता है। वह अपनी मर्जी से प्रोड्यूस कर सकता है। 30 35 लाख बैरल हर दिन के बजाय वह 50 लाख बैरल हर दिन तक जा सकता है। इसका सीधा मतलब है ज्यादा तेल, ज्यादा एक्सपोर्ट और ज्यादा कमाई। तेल की सप्लाई बाजार में बढ़ेगी तो बेसिक मैथ्स है कच्चा तेल दुनिया भर में सस्ता हो जाएगा। लेकिन क्या यह सब इतना आसान है जितना हमें सुनाई दे रहा है? क्या यूएई जितना मन चाहे उतना तेल बना सकता है और बेच सकता है? नहीं। यूएई की पहली प्रॉब्लम है पाइपलाइन की। स्टेट ऑफ हॉर्मोस के अलावा यूनाइटेड अरब एमिरेट्स के पास एक ही बड़ा पाइपलाइन है जो स्टेट ऑफ हॉर्मोस को बाईपास करता है जिसे हब्शन फजेरा पाइपलाइन कहते हैं। ये हब्शन से शुरू हो के फजेरा पोर्ट तक जाती है। इस पाइप लाइन पर ईरान का या किसी और देश का इन्फ्लुएंस नहीं है। जैसा स्टेट ऑफ हॉर्मोस पर ईरान का है। ये पाइपलाइन एक तरीके से आप समझिए कि पानी की पाइपलाइन है। इसकी क्षमता कितनी है कि एक दिन में 15 लाख बैरल तेल पहुंचा सकता है। अभी कितना पहुंचा रहा है? लगभग 10.5 लाख बैरल। कितना और भेज सकता है? 4.5 लाख बैरल हर दिन। और इसकी क्षमता कितनी बढ़ाई जा सकती है? 18 लाख बैरल हर दिन। एक दूसरी पाइपलाइन का प्लान बनाया था लेकिन उसका कंस्ट्रक्शन अभी शुरू भी नहीं हुआ है। मतलब 2026 में तो पॉसिबल नहीं है कि यूएई अचानक से दुनिया के बाजार में इतना तेल डाल दे कि प्राइसेस क्रैश हो जाए।
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जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची की 1 से 3 जुलाई तक भारत यात्रा से निवेश और इनोवेशन के मौकों को बढ़ावा मिलने, आर्थिक संबंध मजबूत होने और सेमीकंडक्टर व अहम खनिजों जैसे क्षेत्रों में मजबूत सप्लाई चेन बनाने की कोशिशों को गति मिलने की उम्मीद है। राजनयिक सूत्रों ने बताया कि इस यात्रा के दौरान समुद्री सुरक्षा, डिफेंस टेक्नोलॉजी में सहयोग और बंगाल की खाड़ी व पूर्वोत्तर भारत को जोड़ने वाली "इंडस्ट्रियल वैल्यू चेन" विकसित करने पर भी ध्यान दिया जाएगा। जापान की प्रधानमंत्री 16वें भारत-जापान सालाना शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगी, जिससे दोनों पक्षों को आपसी सहयोग के सभी पहलुओं की समीक्षा करने और उन्हें मजबूत करने के साथ-साथ आपसी हित के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करने का मौका मिलेगा।
यह प्रधानमंत्री ताकाइची की भारत की पहली आधिकारिक यात्रा होगी। यह यात्रा अगस्त 2025 में 15वें भारत-जापान सालाना शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री मोदी की टोक्यो यात्रा के बाद हो रही है और यह भारत-जापान की खास रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी को और मज़बूत करने के लिए दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को दिखाती है। जापान के प्रधानमंत्री भारत-जापान बिज़नेस फ़ोरम की बैठक में भी शामिल होंगे। सूत्रों ने बताया कि AI सहयोग को लेकर कोई घोषणा हो सकती है और प्रस्तावों में ओडिशा में बड़े पैमाने पर ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट, बायोगैस सहयोग को मज़बूत करना और POWERR Asia के ज़रिए क्षेत्रीय मज़बूती को बढ़ावा देना भी शामिल है।
एक सूत्र ने कहा इस यात्रा का मकसद निवेश और इनोवेशन के ज़रिए आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। आर्थिक सुरक्षा को मज़बूत करने पर ध्यान दिया जाएगा, जिसमें सेमीकंडक्टर और ज़रूरी खनिजों जैसे क्षेत्रों में मज़बूत सप्लाई चेन बनाना शामिल है। उम्मीद किए जा रहे नतीजों से जुड़े दस्तावेज़ों में सालाना शिखर सम्मेलन पर एक संयुक्त बयान, ऊर्जा सुरक्षा और AI, फ़ार्मास्यूटिकल्स, बैटरी और ज़रूरी खनिजों जैसे क्षेत्रों से जुड़े MoU शामिल हैं। भारत और जापान ने 2014 में अपने संबंधों को 'विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी' के स्तर तक बढ़ाया था। सूत्रों ने बताया कि पिछले साल अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा ने अगले दशक के लिए दिशा तय की, जिसमें सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, निवेश, इनोवेशन और लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान को प्राथमिकता दी गई।
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