Explainer: बिना पानी कैसे चलेगा डिजिटल इंडिया? AI डेटा सेंटर्स की रफ्तार पर गहराया संकट
Water Shortage: भारत तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल तकनीक की दुनिया में आगे बढ़ रहा है. सरकार देश को ग्लोबल डेटा सेंटर हब बनाने की दिशा में काम कर रही है. विदेशी कंपनियां भी भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं. इससे रोजगार, निवेश और डिजिटल विकास को बढ़ावा मिलेगा.
लेकिन इस डिजिटल क्रांति के साथ एक बड़ी चिंता भी सामने आ रही है. AI और बड़े डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की जरूरत होती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में कई राज्यों में पानी का संकट और गंभीर हो सकता है.
क्या होता है डेटा सेंटर और इसमें पानी क्यों लगता है?
डेटा सेंटर ऐसी जगह होती है, जहां हजारों कंप्यूटर सर्वर 24 घंटे लगातार चलते रहते हैं. यही सर्वर इंटरनेट, क्लाउड स्टोरेज, ऑनलाइन बैंकिंग, सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग और AI जैसी सेवाओं को संचालित करते हैं.
लगातार काम करने की वजह से इन सर्वरों से काफी गर्मी निकलती है. अगर इन्हें समय पर ठंडा नहीं किया जाए, तो मशीनें खराब हो सकती हैं. इसलिए डेटा सेंटर में बड़े-बड़े कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं. इनमें से कई सिस्टम पानी का इस्तेमाल करते हैं. यही वजह है कि एक बड़े डेटा सेंटर में हर दिन लाखों लीटर पानी खर्च हो सकता है.
मुंबई क्यों बन गया डेटा सेंटर का सबसे बड़ा केंद्र?
भारत में इस समय सबसे ज्यादा डेटा सेंटर मुंबई और उसके आसपास मौजूद हैं. देश की कुल डेटा सेंटर क्षमता का लगभग 53 प्रतिशत हिस्सा अकेले मुंबई में है. इसके पीछे कई वजह हैं. मुंबई समुद्र के किनारे स्थित है, जहां कई अंतरराष्ट्रीय सबसी केबल लैंडिंग स्टेशन हैं. इन्हीं के जरिए दुनिया भर का इंटरनेट ट्रैफिक भारत तक पहुंचता है.
इसके अलावा मुंबई देश की आर्थिक राजधानी भी है. यहां पहले से मजबूत आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर, लगातार बिजली की उपलब्धता, बेहतर इंटरनेट नेटवर्क और नवी मुंबई जैसे इलाकों में जमीन उपलब्ध होने से बड़ी टेक कंपनियों ने यहां निवेश किया है. इसी कारण अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी वैश्विक कंपनियों ने अपने क्लाउड और AI प्रोजेक्ट्स के लिए मुंबई को प्रमुख केंद्र बनाया है.
महाराष्ट्र में बढ़ सकता है पानी का दबाव
महाराष्ट्र पहले से ही कई इलाकों में पानी की कमी का सामना कर रहा है. कई जलाशयों में पानी का स्तर काफी नीचे पहुंच चुका है. कई शहरों में समय-समय पर पानी की कटौती भी करनी पड़ती है.
ऐसे में अगर बड़ी संख्या में नए डेटा सेंटर बनते हैं और वे रोजाना लाखों लीटर पानी का इस्तेमाल करते हैं, तो भविष्य में जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
हालांकि, सरकार ने डेटा सेंटर्स को आवश्यक सेवाओं की श्रेणी में रखा है, इसलिए फिलहाल पानी की आपूर्ति पर इनका असर नहीं पड़ा है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पानी का बेहतर प्रबंधन नहीं किया गया, तो आगे चलकर आम लोगों और उद्योगों के बीच पानी को लेकर चुनौती बढ़ सकती है.
AI की बढ़ती मांग से तेजी से बढ़ रहे हैं डेटा सेंटर
दुनिया भर में AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. चैटबॉट, मशीन लर्निंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है. इसी वजह से भारत में भी डेटा सेंटर उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है. सरकार ने इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की टैक्स छूट और प्रोत्साहन योजनाओं की घोषणा की है.
बड़े उद्योग समूह जैसे अडाणी और रिलायंस भी डेटा सेंटर सेक्टर में बड़े निवेश कर रहे हैं. मुंबई के अलावा चेन्नई, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में भी नए डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं. आर्थिक सर्वेक्षण 2026 के अनुसार, भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2025 में लगभग 1.4 गीगावाट थी, जो 2030 तक बढ़कर करीब 8 गीगावाट तक पहुंच सकती है. इससे साफ है कि आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र का विस्तार कई गुना होने वाला है.
पानी की कमी डिजिटल विकास के लिए चुनौती बन सकती है
भारत के कई राज्य पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं. महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कई बार पानी की राशनिंग करनी पड़ती है. देश में उपलब्ध साफ पानी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा खेती में इस्तेमाल होता है. इसके बाद घरेलू जरूरतें और उद्योगों के लिए सीमित पानी बचता है.
अगर भविष्य में डेटा सेंटर्स की संख्या तेजी से बढ़ती है और उनके लिए पानी की मांग भी बढ़ती है, तो कई जगहों पर जल संसाधनों पर दबाव और बढ़ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर लोगों को पीने का पानी कम मिले और उद्योगों को लगातार पानी मिलता रहे, तो सामाजिक असंतोष भी पैदा हो सकता है. इसके अलावा सरकार को नए नियम बनाने पड़ सकते हैं, जिससे डेटा सेंटर परियोजनाओं की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है.
नई तकनीक से कम हो सकती है पानी की खपत
इस चुनौती का समाधान भी तकनीक के पास मौजूद है. आज कई कंपनियां ऐसे कूलिंग सिस्टम विकसित कर रही हैं, जिनमें बहुत कम पानी की जरूरत पड़ती है. क्लोज्ड-लूप लिक्विड कूलिंग ऐसी तकनीक है, जिसमें एक ही पानी को बार-बार इस्तेमाल किया जाता है. इससे पानी की बर्बादी काफी कम हो जाती है.
इसके अलावा इमर्शन कूलिंग तकनीक में सर्वरों को एक विशेष प्रकार के लिक्विड में रखा जाता है. इसमें पानी का इस्तेमाल लगभग नहीं के बराबर होता है और सर्वर भी बेहतर तरीके से ठंडे रहते हैं. AI चिप बनाने वाली कंपनी एनवीडिया ने भी सुझाव दिया है कि जहां मौसम अनुकूल हो, वहां आधुनिक लिक्विड कूलिंग तकनीक अपनाकर पानी की खपत को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
सरकार को क्या करना होगा?
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को नए डेटा सेंटर लगाने से पहले उस क्षेत्र में पानी की उपलब्धता का आकलन करना चाहिए. जहां पहले से पानी की कमी है, वहां बड़े डेटा सेंटर लगाने के बजाय ऐसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा सकती है, जहां जल संसाधन पर्याप्त हों. इसके साथ ही कंपनियों के लिए रीसायकल पानी का उपयोग, वर्षा जल संचयन और कम पानी खर्च करने वाली कूलिंग तकनीक अपनाने जैसे नियम भी बनाए जा सकते हैं.
अब निष्कर्ष की बात करें तो भारत AI और डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है और डेटा सेंटर इस विकास की सबसे अहम कड़ी बन चुके हैं. इससे देश में निवेश बढ़ेगा, रोजगार के नए अवसर बनेंगे और डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी.
हालांकि, इस विकास के साथ पानी की बढ़ती जरूरत एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही है. अगर अभी से जल संसाधनों का सही प्रबंधन किया जाए और आधुनिक कूलिंग तकनीकों को अपनाया जाए, तो भारत डिजिटल विकास और जल संरक्षण दोनों के बीच संतुलन बना सकता है.
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