बढा भरोसा: भारत के एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज बाजार में रिकॉर्ड उछाल, विदेशी बैंकों ने दिखाई दिलचस्पी
नई दिल्ली। भारत की एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज (एबीएस) बाजार ने नया रिकॉर्ड बनाया है। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत में निवेश का अवसर देखते हुए वैश्विक बैंक इस बाजार में तेजी से निवेश बढ़ा रहे हैं। इसी कारण एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज की बिक्री अब अपने अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी बैंकों ने भारतीय वित्तीय परिसंपत्तियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है ताकि उन्हें भारत की आर्थिक वृद्धि का लाभ मिल सके। इससे भारतीय ऋण बाजार में विदेशी निवेशकों की मौजूदगी पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुई है।
क्या होती हैं एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज?
एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज ऐसे वित्तीय साधन होते हैं जिन्हें किसी वास्तविक आय उत्पन्न करने वाली परिसंपत्ति के आधार पर जारी किया जाता है। इनमें वाहन ऋण, गृह ऋण, उपभोक्ता ऋण या अन्य प्रकार के कर्ज शामिल हो सकते हैं। जब वित्तीय संस्थान इन ऋणों को एक समूह में जोड़कर निवेशकों को बेचते हैं, तो उसे एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज कहा जाता है। निवेशकों को इन परिसंपत्तियों से आने वाली नकदी के आधार पर रिटर्न प्राप्त होता है। इससे ऋण देने वाली संस्थाओं को नई पूंजी जुटाने में मदद मिलती है।
विदेशी बैंकों की हिस्सेदारी में वृद्धि
क्रिसिल रेटिंग्स के मुख्य रेटिंग अधिकारी कृष्णन सीतारमन के अनुसार, मार्च में समाप्त वित्तीय वर्ष के दौरान कुल जारी एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज में विदेशी बैंकों की हिस्सेदारी लगभग 35 प्रतिशत तक पहुंच गई। इससे पहले के दो वित्तीय वर्षों में यह हिस्सा करीब 28 से 30 प्रतिशत के बीच था। यह वृद्धि दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय बैंक भारत के वित्तीय क्षेत्र को लेकर अधिक भरोसा जता रहे हैं। वे भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक विकास संभावनाओं को देखते हुए अपने निवेश का दायरा बढ़ा रहे हैं।
1.53 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड बाजार
रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च में समाप्त वित्तीय वर्ष के दौरान भारत में कुल 1.53 ट्रिलियन रुपए (लगभग 1.53 लाख करोड़ रुपए) मूल्य की एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज जारी की गईं। यह भारतीय बाजार के लिए एक रिकॉर्ड स्तर है। यदि विदेशी बैंकों की 35 प्रतिशत हिस्सेदारी को देखा जाए, तो इसका अर्थ है कि विदेशी ऋणदाताओं ने लगभग 5.6 अरब डॉलर मूल्य की भारतीय एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज खरीदीं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि वैश्विक वित्तीय संस्थान भारतीय बाजार में निवेश के लिए लगातार अधिक पूंजी लगा रहे हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेश में वृद्धि से भारतीय वित्तीय संस्थानों को अधिक पूंजी उपलब्ध होगी, जिससे वे व्यवसायों और उपभोक्ताओं को अधिक ऋण दे सकेंगे। इससे आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की संभावना है। साथ ही, वैश्विक बैंकों की बढ़ती भागीदारी यह संकेत देती है कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक भारत को एक स्थिर और तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था के रूप में देख रहे हैं। यदि यह रुझान जारी रहता है, तो आने वाले वर्षों में भारत का ऋण और पूंजी बाजार और अधिक गहरा तथा मजबूत हो सकता है।
मौसम की प्रतिकूलताओं का असर: गर्मी, प्रदूषण और बाढ़ बढ़ाएंगे आपकी जेब पर बोझ, महंगा हो सकता है हेल्थ इंश्योरेंस
नई दिल्ली। भारत में जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी, वायु प्रदूषण और चरम मौसम की घटनाएं केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं रह गई हैं, बल्कि अब इनका सीधा असर लोगों की सेहत और स्वास्थ्य बीमा उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, बीमा कंपनियां बदलते मौसम और प्रदूषण से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को अपनी नीतियों में शामिल करने लगी हैं, क्योंकि इन कारणों से बीमारियों और चिकित्सा खर्चों में लगातार वृद्धि हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक गर्मी, खराब वायु गुणवत्ता और अनियमित मौसम आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम को और महंगा बना सकते हैं। इसका असर करोड़ों भारतीयों पर पड़ सकता है, जो पहले से ही बढ़ती चिकित्सा लागत का सामना कर रहे हैं।
बढ़ता प्रदूषण बना स्वास्थ्य जोखिम
भारत के कई बड़े शहर लंबे समय से गंभीर वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। प्रदूषित हवा के कारण अस्थमा, फेफड़ों की बीमारियां, हृदय रोग और अन्य श्वसन संबंधी समस्याओं के मामले बढ़ रहे हैं। अस्पतालों में ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ने से बीमा कंपनियों के क्लेम भुगतान का बोझ भी बढ़ रहा है। इसी कारण कई स्वास्थ्य बीमा कंपनियां अब पर्यावरणीय जोखिमों का अलग से अध्ययन कर रही हैं। वे यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि किसी क्षेत्र की वायु गुणवत्ता और मौसम संबंधी परिस्थितियां भविष्य में स्वास्थ्य खर्च को किस प्रकार प्रभावित कर सकती हैं।
भीषण गर्मी और चरम मौसम का असर
भारत में हर साल गर्मी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। हीटवेव, बाढ़, अत्यधिक वर्षा और अन्य चरम मौसम घटनाएं लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रही हैं। अत्यधिक तापमान से हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थितियां बढ़ रही हैं, जिससे अस्पतालों में भर्ती होने के मामलों में वृद्धि हो सकती है। इसका सीधा प्रभाव स्वास्थ्य बीमा कंपनियों की लागत पर पड़ता है, क्योंकि उन्हें अधिक दावे चुकाने पड़ते हैं।
बीमा कंपनियां बदल रही हैं रणनीति
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ बीमा कंपनियां अब प्रदूषण और मौसम से जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखते हुए नए उत्पाद और सेवाएं विकसित कर रही हैं। इनमें स्वास्थ्य निगरानी, निवारक देखभाल और जोखिम मूल्यांकन जैसी सुविधाओं पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। बीमा क्षेत्र का मानना है कि भविष्य में केवल इलाज का खर्च उठाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि बीमारियों की रोकथाम और लोगों को स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियां देना भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
आम लोगों पर क्या होगा प्रभाव?
यदि जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य संबंधी दावे लगातार बढ़ते हैं, तो स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम में वृद्धि की संभावना भी बढ़ सकती है। इसका मतलब है कि लोगों को भविष्य में बीमा कवरेज बनाए रखने के लिए अधिक भुगतान करना पड़ सकता है। स्वास्थ्य बीमा उद्योग अब जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक आर्थिक और स्वास्थ्य जोखिम के रूप में देख रहा है। आने वाले वर्षों में मौसम, प्रदूषण और स्वास्थ्य बीमा के बीच संबंध और अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जिससे भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र और आम नागरिकों दोनों पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
Haribhoomi













/newsnation/media/agency_attachments/logo-webp.webp)






