प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेकर ईरान ने एक बहुत बड़ा बयान दिया है। ईरान ने एक खास मौका देखते हुए पीएम मोदी को एक खास न्योता भेज दिया है। दरअसल ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिशकियान ने पीएम मोदी को अमेरिकी हमले में मारे गए सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामिनई के जनाजे में शामिल होने के लिए बुलाया है। आपको बता दें कि पिछले तीन-चार महीनों से ईरान अमेरिका और खासतौर पर इजराइल के डर से खामेनेई का जनाजा नहीं निकाल पा रहा है। ईरान के करोड़ों लोग चाहते हैं कि खामिनई को जल्द से जल्द पूरे सम्मान के साथ दफनाया जाए। मगर ईरान को जानकारी मिली है कि इजराइल भी इसी जनाज़े के इंतजार में बैठा है ताकि ईरान की बचीखुची लीडरशिप इस जनाज़े में आए और इजराइल उनको भी निपटा दे। जानकारी के लिए बता दें कि खामेनेई की अंतिम यात्रा का कार्यक्रम 4 जुलाई से 9 जुलाई तक चलेगा। 9 जुलाई के दिन खामेनेई को ईरान के मशहद शहर में दफनाया जाएगा। खामेनेई का जन्म मशहद शहर में ही हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेकर ईरान ने बहुत बड़ा बयान दिया है।
ईरान ने एक खास मौका देखते हुए पीएम मोदी को एक खास न्योता भेज दिया है। यह न्योता क्या है और पीएम मोदी को क्यों भेजा गया है? उसकी संभावित वजह आपके होश उड़ा देगी। दरअसल ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिशकियान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिकी हमले में मारे गए सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई के जनाजे में शामिल होने के लिए बुलाया है। यानी ईरान चाहता है कि पीएम मोदी खामेनेई के जनाजे में खुद आए। लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक ईरान ऐसा क्यों चाहता है वह सच आपको हिला कर रख देगा। दरअसल पिछले 4 महीनों से ईरान अमेरिका और खासतौर पर इजराइल के डर से खामेनेई का जनाजा नहीं निकाल पा रहा। ईरान के करोड़ों लोग चाहते हैं कि जल्द से जल्द खामेनेई को सम्मान के साथ दफनाया जाए। लेकिन यहां पर असली खेल यह है कि खामेनेई को दफनाने की जितनी जल्दी ईरान को है उतनी ही जल्दी इजराइल को भी है।
खबरों के मुताबिक इजराइल भी चाहता है कि खामेनेई का जनाजा जल्द से जल्द निकले ताकि ईरान की बचीखुची लीडरशिप इस जनाज़े में आए और इजराइल को उन्हें भी निपटाने का मौका मिल जाए। दरअसल अमेरिका के साथ बातचीत के चलते ईरान को पिछले 4 महीनों में पहली बार 50% उम्मीद जगी है कि खामेनेई के जनाजे में अमेरिका तो फिलहाल कुछ नहीं करेगा। लेकिन 50% टेंशन अभी भी इजराइल की है क्योंकि इजराइल इस जनाजे में बड़ा एक्शन ले सकता है। ईरान की मुश्किल यह है कि इजराइल तो आजकल अमेरिका की भी बातें नहीं सुन रहा है। ऐसे में ईरान को लगता है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस जनाजे में शामिल होते हैं तो इजराइल यहां पर हमला करने की सोचेगा भी नहीं। इजराइल कभी भी उस जगह पर हमला नहीं करेगा जहां पर पीएम मोदी मौजूद हैं।
क्या पीएम मोदी खामने के जनाजे में जाएंगे?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिशकियान जानते हैं कि सबसे सुरक्षित पीएम मोदी को बुलाना है क्योंकि इजराइल भी शांत बैठा रहेगा। पिछले साल मसूद पेजिश्कियान जब राष्ट्रपति बने थे तब उन्होंने दुनिया के कई बड़े-बड़े नेताओं को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया था। भारत की तरफ से नितिन गडकरी पहुंचे थे। लेकिन इतने बड़े इवेंट में भी इजराइल ने ईरान में घुसकर हमास चीफ इस्माइल हानिए को मार दिया था। इस्माइल हानिए भी मसूद पेजिशकियान के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचा था। सोचिए नितिन गडकरी वहां मौजूद थे। इसके बावजूद इजराइल ईरान में घुसा और हमास चीफ को उड़ा दिया। खुद नितिन गडकरी ने भारत वापस लौट कर बताया था कि इजराइल ने किस तरह से ईरान में खेल किया। एक्सपर्ट्स का मानना है कि खामेनेई के जनाजे में पीएम मोदी के जाने की संभावना बहुत कम है।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को NATO महासचिव मार्क रुटे से कहा कि ईरान के साथ टकराव के दौरान यूरोपीय सहयोगियों ने अमेरिका को निराश किया है। उन्होंने इस बात पर निराशा जताई कि टकराव के समय NATO के अहम सहयोगियों से उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिला। मुलाकात के दौरान ट्रंप ने कहा कि उन्हें इटली, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और फ़्रांस से निराशा हुई है और उन्होंने स्पेन की भी आलोचना की। ट्रंप ने कहा कि हमें निराश किया गया। उन्होंने आगे कहा कि सुरक्षा के एक बड़े संकट के समय सहयोगियों से मिली मदद उम्मीद के मुताबिक नहीं थी। ट्रंप ने कहा कि अगर कोई और उस स्थिति में होता, तो हम आज आपसे मिल भी नहीं रहे होते।" उन्होंने संकेत दिया कि आम तौर पर सहयोगियों से मज़बूत समर्थन की उम्मीद की जाती है। उन्होंने आगे कहा कि यह बेहतर होता अगर सहयोगियों ने संघर्ष के दौरान साफ़ तौर पर मदद की पेशकश की होती।
आलोचना के बावजूद, ट्रंप ने कहा कि वे रुटे का सम्मान करते हैं और संकेत दिया कि अमेरिका और NATO नेतृत्व के बीच बातचीत जारी रहेगी। बैठक के दौरान आलोचनाओं का जवाब देते हुए, रुटे ने यूरोपीय सहयोगियों की भूमिका का बचाव किया और संघर्ष के दौरान बेहतर तालमेल की तारीफ़ की। उन्होंने कहा कि ईरान की परमाणु क्षमता काफी कम हो गई है और बताया कि G7 नेताओं ने इस ऑपरेशन के रणनीतिक असर को माना है।
ट्रंप ने 77 वर्ष पुराने इस सैन्य गठबंधन से अमेरिका को अलग करने की अपनी धमकियों को दोहराया है, जिससे अगले महीने तुर्की में होने वाले नाटो नेताओं के शिखर सम्मेलन से पहले परिस्थितियां जटिल हो गई हैं। वहीं, ट्रंप को प्रभावित करने और उनके साथ संवाद स्थापित करने की क्षमता के कारण ‘ट्रंप व्हिस्परर’ के रूप में पहचाने जाने वाले रूट बुधवार को उन्हें संतुष्ट करने और मनाने की कोशिश में दिखाई दिए। ओवल ऑफिस में ट्रंप के साथ बैठक के दौरान रूट ने नरमी से लेकिन स्पष्ट ढंग से असहमति जताते हुए कहा, ‘‘मुझे पता है कि कुछ छिटपुट घटनाएं हुई हैं, जिनसे आप वास्तव में निराश हैं, लेकिन सामान्य तौर पर आपके यूरोपीय सहयोगी आपके साथ खड़े रहे हैं।’’ नाटो प्रमुख ने यह भी उल्लेख किया कि ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम पर सहमति बनने से पहले यूरोप स्थित सैन्य अड्डों से अमेरिका के 4,000 से 5,000 विमान उड़ान भर चुके थे। यह टिप्पणी ट्रंप के उस बयान के बाद आई, जिसमें उन्होंने रूट का परिचय कराते हुए कहा था कि ‘‘हाल की हमारी छोटी-सी सैन्य झड़प के दौरान वे हमारे प्रति बहुत अच्छे नहीं थे।
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