भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने बताया है कि एक देश भारत से अंग्रेजी सीखना चाहता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह देश सिर्फ और सिर्फ दो देशों के साथ बॉर्डर शेयर करता है और वह दोनों देश महाशक्तियां हैं। जो देश भारत से अंग्रेजी सीखना चाहता है, वह रूस और चीन के बीचोंबीच स्थित है। इस देश का नाम मंगोलिया है। मंगोलिया के पास एक ऐसा खजाना है जो भारत की तकदीर बदल सकता है। अब इसी मंगोलिया ने भारत से कहा है कि हमें अंग्रेजी सिखा दो। मजे की बात देखिए कि दो महाशक्तियो के बीच बैठा मंगोलिया भारत से बॉर्डर शेयर नहीं करता है, लेकिन इसके बावजूद भारत को अपना तीसरा पड़ोसी बोल रहा है। बौद्ध धर्म के चलते मंगोलिया भारत को अपना आध्यात्मिक पड़ोसी भी बोल रहा है। दरअसल, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर मंगोलिया के दौरे पर हैं। मंगोलिया की 85% अर्थव्यवस्था रूस और चीन पर निर्भर है। लेकिन पिछले 4 सालों से रूस यूक्रेन के साथ उलझा है। तो वहीं चीन लगातार मंगोलिया पर राजनीतिक दबाव बनाता रहता है। ऐसे में मंगोलिया भारत के साथ अपने स्ट्रेटेजिक रिलेशन तेजी से बढ़ा रहा है।
भारत के लिए भी मंगोलिया बेहद जरूरी है। मंगोलिया अपनी लोकेशन के चलते तो भारत के लिए जरूरी है ही लेकिन इसके अलावा मंगोलिया के पास 90 हजार टन यूरेनियम और रेयर अर्थ मिनरल्स हैं जो भारत की न्यूक्लियर एनर्जी डिफेंस सेक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री के लिए बेहद जरूरी है। कुछ समय पहले ही भारत मंगोलिया में एक ऑयल रिफाइनरी भी खोल चुका है। मंगोलिया की लोकेशन और उसके नेचुरल रिसोर्सेज की कीमत क्या है? वो 2015 में पता चला जब नरेंद्र मोदी इस देश की यात्रा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। इसके बाद 2022 में राजनाथ सिंह भारत के वो पहले रक्षा मंत्री बने, जिन्होंने मंगोलिया का दौरा किया। राजनाथ सिंह चीन के पड़ोसी देश के साथ रक्षा समझौते कर आए। भारत चाहता है कि चीन का हर पड़ोसी उसका दोस्त बने। बहरहाल मोटे-मोटे तौर पर आप समझ चुके हैं कि मंगोलिया को भारत की और भारत को मंगोलिया की जरूरत क्यों है। लेकिन अब सवाल आता है कि मंगोलिया भारत से अंग्रेजी क्यों सीखना चाहता है? दरअसल इसके पीछे भी चीन है। ऐतिहासिक रूप से देखें तो वैसे तो मंगोलिया पर रूसी भाषा का प्रभाव दिखता है। लेकिन पिछले कई सालों से चीन इस देश में अपनी मेंडरीन भाषा फैलाना चाहता है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान चीन मंगोलिया का एक बड़ा हिस्सा कब्जा चुका है जिसे चीन ने इनर मंगोलिया का नाम दिया। चीन पड़ोसी देशों की जमीन पर कब्जा करने के लिए सलामी स्लाइसिंग रणनीति पर काम करता है।
सलामी स्लाइसिंग का मतलब होता है किसी चीज को धीरे-धीरे काटकर अपने कब्जे में लेना। चीन बिना किसी बड़े युद्ध या विवाद के धीरे-धीरे टुकड़ों-टुकड़ों में पड़ोसी देशों की जमीन या समुद्री क्षेत्रों पर कब्जा करता है। चीन एक बार में पूरी जमीन हड़पने के बजाय धीरे-धीरे मामूली कदम उठाता है। इसी को सलामी स्लाइसिंग कहा जाता है। इस रणनीति के तहत चीन अपनी भाषा और अपनी जनता का भी इस्तेमाल करता है। चीन अपने पड़ोसी देशों में धीरे-धीरे अपने नागरिकों को बसाता है। वहां पर अपनी मेंडरीन भाषा का प्रचार शुरू कर देता है। चीन ने यही काम तिब्बत में किया है। सबसे पहले तो चीन ने तिब्बत में अपने लोगों को बसाया। वहां के स्कूलों में भाषा को अनिवार्य कर दिया। आज पूरा तिब्बत चीन के कब्जे में है। चीन यही काम मंगोलिया में धीरे-धीरे कर रहा है। मंगोलिया से छीने गए इनर मंगोलिया इलाके में चीन पहले ही अपनी जनसंख्या को बढ़ा चुका है। अब इस इलाके से भी 10-10 चीनी लोग मेन मंगोलिया में घुस रहे हैं। मंगोलिया के लोगों को मेंडरीन भाषा सिखा रहे हैं। मंगोलिया की जनता भी चीनी लोगों के झांसे में आ जाती है। मेंडरीन बोलना शुरू कर देती है। क्योंकि चीन की ताकत देखकर आम मंगोलियाई भी मेंडरीन बोलना शुरू कर देते हैं। लेकिन यह मंगोलिया के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
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भारत ने मंगलवार को बताया कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने के लिए हुए समझौते (MoU) के बाद, भारत आने वाले 11 जहाज़ होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुज़रे हैं, जबकि भारतीय झंडे वाले 10 जहाज़ अभी भी फ़ारस की खाड़ी (Persian Gulf) इलाके में हैं। विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक नियमित प्रेस ब्रीफिंग में यह जानकारी दी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारतीय झंडे वाले दस जहाज़ अभी भी फ़ारस की खाड़ी इलाके में हैं। इसके अलावा, हमारे दो भारतीय जहाज़ इस तरफ़ से फ़ारस की खाड़ी में गए हैं। MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद से, भारत आने वाले ग्यारह जहाज़ होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रे हैं। विदेश मंत्रालय की ओर से यह जानकारी ऐसे समय में आई है जब समुद्री रास्ते के इस बेहद अहम और संकरे हिस्से (chokepoint) के आसपास लंबे समय से अस्थिरता बनी हुई है; यह हिस्सा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाइड्रोकार्बन और लिक्विफाइड गैस की ढुलाई के लिए मुख्य रास्ता है।
हालांकि पिछले हफ़्ते वॉशिंगटन और तेहरान के बीच शुरुआती समझौते (MoU) के तहत होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को ट्रैफ़िक के लिए खोल दिया गया था, लेकिन शनिवार को लेबनान के अंदर इज़राइल के सैन्य हमलों के बाद ईरानी अधिकारियों ने इस जलमार्ग को फिर से बंद करने की घोषणा कर दी। इसी दौरान, हाल की घटनाओं के बाद इस अहम रास्ते से कमर्शियल शिपिंग ट्रैफ़िक में तेज़ी आई है। स्वतंत्र समुद्री ट्रैकिंग एजेंसियों ने पिछले कुछ दिनों में कमर्शियल शिपिंग ट्रैफ़िक में बढ़ोतरी दर्ज की है। यह ट्रांसपोर्ट वॉल्यूम में साफ़ सुधार का संकेत है, जो 28 फ़रवरी को ईरान पर अमेरिका-इज़राइल हमले के बाद होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने से आई भारी रुकावटों के बाद हुआ है।
कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म Kpler के आंकड़ों के अनुसार, सोमवार को कम से कम 36 रिसोर्स कैरियर (संसाधन ढोने वाले जहाज़) होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रे। यह फ़रवरी में संघर्ष शुरू होने के बाद से देखे गए सबसे व्यस्त ऑपरेशनल समय में से एक था।
पिछले हफ़्ते हुए ईरान-अमेरिका समझौते (MoU) ने लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक मुद्दों को सुलझाने के लिए 60 दिनों का डिप्लोमैटिक समय शुरू किया। यह समझौता महीनों की सीधी सैन्य झड़पों के बाद हुआ, जिसने पश्चिम एशियाई एनर्जी कॉरिडोर को बुरी तरह अस्थिर कर दिया था और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाज़ारों को उलट-पुलट कर दिया था।
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