36 साल बाद कुलगाम वाले घर लौटीं कश्मीरी पंडित, अखरोट के पेड़ से जो कहा जानकर छलक आएंगे आंसू
कश्मीर घाटी में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं. 36 साल पहले घाटी छोड़ने को मजबूर हुई एक बुजुर्ग कश्मीरी पंडित महिला जब कुलगाम जिले के दानेव-बोगुंड गांव में स्थित अपने पुश्तैनी घर पहुंचीं, तो उनकी यादों का सैलाब उमड़ पड़ा. घर के आंगन में कदम रखते ही उन्होंने झुककर अपनी मिट्टी को छुआ, उसे माथे से लगाया और फिर बरसों पुराने अखरोट के पेड़ को गले लगा लिया. यह वही पेड़ था, जो उनके परिवार की अनगिनत यादों का गवाह रहा था. पेड़ के सामने खड़ी महिला की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे. भावनाओं से भरी आवाज में उन्होंने कश्मीरी भाषा में कहा, 'चे छसिया बे याद?' यानी, 'क्या तुम्हें मेरी याद है?' यह सवाल किसी इंसान से नहीं, बल्कि उस अखरोट के पेड़ से था, जिसे उन्होंने अपने जीवन का एक हिस्सा माना था. पेड़ को चूमते हुए वह फूट-फूटकर रो पड़ीं. कुछ देर बाद उन्होंने वहीं घुटनों के बल बैठकर प्रार्थना की और अपने पुराने दिनों को याद करती रहीं.
बरेली की 185 साल पुरानी ऐतिहासिक जिला जेल 173 करोड़ से बनी हाईटेक, 2579 कैदियों की क्षमता के साथ फिर सक्रिय, जाने सुविधा
ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1841 में स्थापित यह जेल भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं की साक्षी रही है. अंग्रेजों ने इसे रणनीतिक रूप से पुलिस लाइन्स और कचहरी के निकट बनाया था. ताकि किसी भी विद्रोह या आंदोलन की स्थिति में तत्काल कार्रवाई की जा सके. इस जेल में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, सीमांत गांधी के नाम से प्रसिद्ध खान अब्दुल गफ्फार खान, गोविंद बल्लभ पंत, एमएन रॉय, महावीर त्यागी और प्रसिद्ध साहित्यकार यशपाल जैसे कई स्वतंत्रता सेनानी कैद रह चुके हैं.
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