SEBI बोर्ड का बड़ा फैसला: बायबैक नियमों में बदलाव, म्यूचुअल फंड बॉरोइंग नॉर्म्स में मिलेगी राहत
SEBI Open Market Buybacks: मार्केट रेगुलेटर Securities and Exchange Board of India (SEBI) के बोर्ड ने शुक्रवार 19 जून को कई बड़े प्रस्तावों को मंजूरी दी. इनमें स्टॉक एक्सचेंजों के जरिए ओपन मार्केट शेयर बायबैक की दोबारा शुरुआत, म्यूचुअल फंड्स के लिए इंट्राडे बॉरोइंग नॉर्म्स में राहत और निवेशक की मृत्यु के बाद सिक्योरिटीज ट्रांसफर प्रोसेस को आसान बनाना शामिल है.
ओपन मार्केट बायबैक की वापसी
SEBI के मुताबिक, ऐसे बायबैक खुलने की तारीख से 66 वर्किंग डेज के भीतर पूरे करने होंगे, जिसमें निर्धारित फंड का कम से कम 40% हिस्सा बायबैक पीरियड के पहले हाफ में इस्तेमाल करना होगा. इसके अलावा यह कंपनियों को बिना किसी डेडिकेटेड बायबैक विंडो के सीधे रेगुलर ट्रेडिंग मैकेनिज्म के जरिए रीपरचेज करने की अनुमति देता है.
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस बायबैक मेथड की वापसी कंपनियों को बायबैक करने का एक अतिरिक्त माध्यम देगी, साथ ही पब्लिक शेयरहोल्डर्स के लिए समान अवसर और टैक्स ट्रीटमेंट भी सुनिश्चित करेगी. SEBI चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने बोर्ड मीटिंग के बाद पत्रकारों से कहा कि बायबैक पर लागू संशोधित टैक्सेशन फ्रेमवर्क को ध्यान में रखते हुए, स्टॉक एक्सचेंज के जरिए ओपन मार्केट बायबैक 1 अगस्त 2026 से दोबारा शुरू किया जा रहा है ताकि कंपनी के पास बायबैक करने का एक अतिरिक्त रास्ता हो.
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म्यूचुअल फंड्स के लिए बॉरोइंग नॉर्म्स में राहत
इस फैसले का मकसद एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) को आउटफ्लो और रिसीवेबल्स के बीच टाइमिंग मिसमैच की वजह से होने वाली ऑपरेशनल चुनौतियों को दूर करना है. फिलहाल इंट्राडे बॉरोइंग म्यूचुअल फंड स्कीम्स के लिए एक अहम कैश-फ्लो मैनेजमेंट टूल का काम करती है, जो फंड मैनेजर्स को पेआउट ऑब्लिगेशन और सेटलमेंट रिक्वायरमेंट को कुशलता से पूरा करने में मदद करती है.
SEBI चेयरमैन के मुताबिक, बोर्ड ने म्यूचुअल फंड्स को रोजाना की लिक्विडिटी मिसमैच मैनेज करने के लिए इंट्राडे बॉरोइंग की सुविधा देने हेतु म्युचुअल फंड्स रेगुलेशन, 2026 में संशोधन को मंजूरी दी है. इस संशोधन से म्यूचुअल फंड्स कुछ सेफगार्ड्स के साथ एसेट क्लासेज के भीतर पे-इन/पेआउट सेटलमेंट टाइमिंग, फॉरेक्स सेटलमेंट और डेरिवेटिव पोजीशंस के मार्क-टू-मार्केट पेमेंट्स जैसी अड़चनों को पाटने के लिए इंट्राडे बॉरोइंग का इस्तेमाल कर पाएंगे. इसके अलावा रेगुलेटर के बोर्ड ने एग्रीकल्चरल कमोडिटी डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग को फिर से जिंदा करने के उद्देश्य से कुछ उपायों को भी मंजूरी दी है.
AIFs के लिए GARUDA मैकेनिज्म लॉन्च
बोर्ड ने अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) की स्कीम लॉन्च प्रक्रिया तेज करने के लिए एक नया ग्रीन-चैनल मैकेनिज्म GARUDA को मंजूरी दी है. इसके तहत AIFs अपने प्लेसमेंट मेमोरेंडम फाइल करने के 10 वर्किंग डेज के भीतर फंडरेजिंग शुरू कर सकेंगे, जबकि मौजूदा वेटिंग पीरियड 30 दिनों का है. GARUDA यानी Green-Channel: AIF Rollout Upon Document Acknowledgement का मकसद SEBI के पास फाइल किए गए प्लेसमेंट मेमोरेंडम (PPMs) की प्रोसेसिंग को सुव्यवस्थित करना और AIFs की फंडरेजिंग को और आसान बनाना है. बोर्ड मीटिंग के बाद जारी बयान में SEBI ने कहा कि उसने SEBI (Alternative Investment Funds) Regulations, 2012 में संशोधन के जरिए GARUDA मैकेनिज्म को मंजूरी दे दी है.
इसके परिणामस्वरूप, नॉन-एक्रेडिटेड इन्वेस्टर स्कीम्स के लिए (जिसमें लार्ज वैल्यू फंड्स, AI-ओनली स्कीम्स और एंजल फंड्स शामिल नहीं हैं) AIFs के नई स्कीम लॉन्च करने की समयसीमा घटाकर 10 वर्किंग डेज कर दी गई है. जानकारों का मानना है कि यह कदम AIF इंडस्ट्री की तेज ग्रोथ और बढ़ती स्कीम फाइलिंग्स के बीच कैपिटल की तेज और कुशल डिप्लॉयमेंट को सक्षम बनाएगा.
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निवेशक की मृत्यु के बाद सिक्योरिटीज ट्रांसफर होगा आसान
मार्केट रेगुलेटर ने शुक्रवार की मीटिंग में निवेशक की मृत्यु के बाद सिक्योरिटीज के ट्रांसमिशन को आसान बनाने के उपायों को भी मंजूरी दी है, जिससे नॉमिनी और लीगल हेयर्स के लिए फाइनेंशियल एसेट्स क्लेम करना आसान और तेज होगा. रेगुलेटर ने बोर्ड मीटिंग में छोटी वैल्यू के क्लेम्स के लिए क्विक ट्रांसमिशन प्रोसेसिंग (QTP) नाम की एक नई कैटेगरी पेश की है और सिंपलिफाइड डॉक्यूमेंटेशन के लिए थ्रेशोल्ड को भी बढ़ाया है. बोर्ड ने अपने मेंबर्स के लिए एक नई आचार संहिता और SEBI (Employees' Service) Regulations, 2001 (ESR) में संशोधन को भी मंजूरी दी है, ताकि कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट और डिस्क्लोजर्स से जुड़े फ्रेमवर्क को मजबूत किया जा सके.
यह कदम SEBI द्वारा गठित एक हाई लेवल कमिटी (HLC) की सिफारिशों के बाद उठाया गया है, जिसे SEBI बोर्ड मेंबर्स और कर्मचारियों से जुड़े कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट, डिस्क्लोजर्स और संबंधित मामलों के मौजूदा नियमों की व्यापक समीक्षा के लिए बनाया गया था. QTP मैकेनिज्म की बात करें तो यह फिजिकल सिक्योरिटीज के लिए ₹10,000 तक और डीमैट सिक्योरिटीज के लिए ₹30,000 तक के क्लेम्स के लिए उपलब्ध होगा. इसके अलावा SEBI ने सिंपलिफाइड डॉक्यूमेंटेशन के जरिए ट्रांसमिशन की लिमिट को दोगुना कर दिया है. यह थ्रेशोल्ड हर लिस्टेड कंपनी के फिजिकल होल्डिंग्स के लिए ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख और हर बेनिफिशियल ओनर के डीमैट होल्डिंग्स के लिए ₹15 लाख से बढ़ाकर ₹30 लाख कर दिया गया है.
अन्य अहम ऐलान
रेगुलेटर ने प्रोसीजरल रिक्वायरमेंट्स को कम करने और ट्रांसमिशन प्रोसेस को सुव्यवस्थित करने के लिए कई और उपायों को भी मंजूरी दी है. इसके तहत PAN सबमिट करने की आवश्यकता को हटा दिया गया है, क्योंकि डीमैट अकाउंट खोलते वक्त PAN डिटेल्स पहले से ही उपलब्ध होती हैं. इसके अलावा वसीयत का प्रोबेट हासिल करने की अनिवार्य शर्त को भी हाल के उत्तराधिकार कानूनों में हुए संशोधनों के अनुरूप समाप्त कर दिया गया है.
SEBI ने अलग-अलग एफिडेविट और NOC की जगह एक कंबाइंड एफिडेविट-कम-नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट सबमिट करने की भी अनुमति दी है. आसान वेरिफिकेशन के लिए अब ओरिजिनल या अटेस्टेड कॉपी के अलावा QR कोड वाले डेथ सर्टिफिकेट की कॉपी भी स्वीकार की जाएगी. विदेशी जुरिस्डिक्शन में जारी डेथ सर्टिफिकेट्स के लिए रेगुलेटर ने भारतीय बैंकों की विदेशी ब्रांचेज या भारतीय बैंकों के साथ कॉरस्पॉन्डेंट बैंकिंग रिलेशनशिप रखने वाले विदेशी बैंकों के जरिए अतिरिक्त वेरिफिकेशन मैकेनिज्म निर्धारित किया है.
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डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य से है. किसी भी निवेश फैसले से पहले अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह जरूर लें.
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