अमेरिका और इजराइल के रिश्तों में प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दोस्ती को लंबे समय से अहम माना जाता रहा है। लेकिन अब दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आगामी इजरायली आम चुनाव में नेतन्याहू का समर्थन करने से दूरी बना सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह इजराइल में नेतन्याहू की कमजोर होती राजनीतिक स्थिति और जनता का बदलता मूड है। इजराइल में अक्टूबर 2026 में आम चुनाव प्रस्तावित है। अमेरिकी मीडिया आउटलेट एक्सओस की रिपोर्ट के मुताबिक जब नेतन्याहू हाल में वाशिंगटन पहुंचे थे तब ट्रंप ने उनसे बंद कमरे में चुनाव को लेकर सवाल किया था। ट्रंप ने कथित तौर पर पूछा था कि क्या वह चुनाव जीत रहे हैं? इस सवाल पर नेतन्याहू चुप रहे।
बैठक में मौजूद दूसरे लोगों ने हालांकि कहा कि नेतन्याहू चुनाव जीत सकते हैं। लेकिन इजराइल में सामने आ रहे प्रीपोल सर्वे अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। कई सर्वों में नेतन्याहू प्रधानमंत्री पद की दौड़ में पीछे दिखाई दे रहे हैं और उनके गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों का आंकड़ा हासिल करने में मुश्किल बताई जा रही है। वहीं दूसरी तरफ गादी आइजन कोर्ट यायर लैपिड और नफ्ताली बेनेट जैसे नेताओं की लोकप्रियता बढ़ती दिखाई दे रही है। कई सर्वों में आइजन कोर्ट को प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे लोकप्रिय दावेदार बताया गया है। यही स्थिति ट्रंप के लिए भी मुश्किल पैदा कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक आइजन कोर्ट, लैपिट और बेनेट ने वाइट हाउस से अपील की है कि ट्रंप इजराइली चुनाव को लेकर तठस्थ रुख अपनाएं। ऐसे में ट्रंप शायद इजराइली जनता के मूड के खिलाफ जाकर नेतन्या के समर्थन में खुलकर उतरने से बचना चाहते हैं। हालांकि ट्रंप और नेतन्या के बीच व्यक्तिगत संबंधों को मजबूत माना जाता है। लेकिन नीतिगत मतभेद कई बार सामने आ चुके हैं।
ट्रंप ने अतीत में नेतन्याहू की नीतियों को लेकर नाराजगी जताई है। लेबनान को लेकर नेतन्याहू की नीति और गाजा को लेकर ट्रंप की शांति योजना दोनों नेताओं के बीच मतभेद का कारण बनी है। ट्रंप के लिए यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि दूसरे देशों के चुनावों में उतना समर्थन हमेशा कामयाब नहीं रहा। हंगरी में उन्होंने विक्टर ऑर्बन का समर्थन किया। जबकि चुनाव में ऑर्बन को हार का सामना करना पड़ा था। जर्मनी में ट्रंप ने एएफडी का समर्थन किया। लेकिन वहां भी उनकी पसंद के मुताबिक नतीजे नहीं आए। कनाडा में भी ट्रंप की राजनीतिक दखल की कोशिशों को झटका लगा। ऐसे में इजराइल में नेतन्याहू के साथ खड़ा होना ट्रंप के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
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80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले पर पहली बार वंदे मातरम गाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13वीं बार तिरंगा फहराया। पीएम मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कहा कि भारत को अब दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना है। हमें आत्मनिर्भर बनना है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि एक तरफ पीएम मोदी भारत को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने का काम कर रहे थे तो दूसरी तरफ इजराइल ने बड़ा खेल कर दिया। इजराइल ने भारत का झंडा गाड़ दिया। सबसे पहले तो भारत में इजराइली राजदूत रूएनार ने हिंदी में भारतवासियों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई दी। स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। इसी बीच इजराइल के डिप्लोमेट्स भारत के एक रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए और भारतीय लोगों को झंडा बांटने लगे।
बता दें कि दो दिन पहले भी इजराइल के डिप्लोमेट्स ने भारत में वंदे मातरम गाना शुरू कर दिया था। यह संदेश खासतौर पर भारत में रहने वाले उन लोगों के लिए था जो वंदे मातरम गाना नहीं चाहते। वंदे मातरम। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इजराइल के अखबार ने भी तहलका मचा दिया है। इजराइल का अखबार यरूशलम पोस्ट भारत की ताकत के बारे में दुनिया को बता रहा है। भारत की ग्रोथ इंफ्रास्ट्रक्चर के बारे में दुनिया को बता रहा है। सोचिए एक तरफ राहुल गांधी भारत की विदेश नीति का मजाक बना रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ इजराइल भारत की ताकत का गुणगान कर रहा है। हर घर तिरंगा अभियान के तहत मुंबई में इजराइल की डिप्टी काउंसिल जनरल अभिशाख हेर ने मुंबई के सीएसटी स्टेशन पर भारतीय लोगों को तिरंगा बांटना शुरू कर दिया। इजराइल की डिप्लोमेट ने खासतौर पर मुस्लिम महिलाओं को भी तिरंगा दिया और भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस की बधाई भी दी।
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