फर्जी वीडियो विवाद पर भड़के भगवंत मान, बोले- मुझे बदनाम करने की रची जा रही साजिश
पंजाब की राजनीति में इन दिनों एक कथित फर्जी वीडियो को लेकर विवाद गरमाया हुआ है. इस मामले में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दी है और आरोप लगाया है कि उन्हें राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए सुनियोजित साजिश रची जा रही है. उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिस वीडियो को लेकर विवाद खड़ा किया गया है, उसमें दिखाई देने वाला व्यक्ति वह नहीं हैं और उनके खिलाफ झूठा प्रचार किया जा रहा है.
फर्जी वीडियो को बताया राजनीतिक साजिश
नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा वीडियो पूरी तरह भ्रामक है. उन्होंने दावा किया कि वीडियो में दिख रहा व्यक्ति न तो उनकी कद-काठी से मेल खाता है और न ही उनकी शारीरिक बनावट से.
मान ने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक ताकतें उन्हें बदनाम करने के लिए इस तरह के हथकंडों का इस्तेमाल कर रही हैं. उन्होंने कहा कि पंजाब में उनकी सरकार द्वारा लिए जा रहे फैसलों से विरोधी दल परेशान हैं और इसी वजह से उनके खिलाफ दुष्प्रचार का अभियान चलाया जा रहा है.
बेअदबी कानून को लेकर उठाया सवाल
मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी के मामलों को रोकने के लिए सख्त कानून बनाया है. उनके मुताबिक, जब तक ऐसा कानून नहीं था तब तक विपक्ष और विभिन्न संगठन सरकारों पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाते थे, लेकिन अब कानून बनने के बाद वही लोग इसका विरोध कर रहे हैं.
भगवंत मान ने कहा कि बेअदबी के खिलाफ कड़ा कानून लागू होने के बाद से ही उनके खिलाफ प्रचार तेज हो गया है. उन्होंने इसे राजनीतिक विरोधियों की बौखलाहट बताया और कहा कि जनता इस पूरे मामले की सच्चाई को समझ रही है.
अकाल तख्त के प्रति जताया सम्मान
विवाद के बीच मुख्यमंत्री ने श्री अकाल तख्त साहिब के प्रति अपनी आस्था और सम्मान को भी दोहराया. उन्होंने कहा कि उनके लिए श्री अकाल तख्त साहिब सर्वोच्च धार्मिक संस्था है और वह हमेशा उसके प्रति नतमस्तक रहे हैं.
मान ने कहा कि वह कभी भी ऐसी कोई बात सोच भी नहीं सकते जो अकाल तख्त साहिब के सम्मान के खिलाफ हो. हालांकि उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग धार्मिक संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए कर रहे हैं, जिससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है.
केजरीवाल ने भी किया समर्थन
इस पूरे विवाद में आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल भी मुख्यमंत्री भगवंत मान के समर्थन में सामने आए. उन्होंने कहा कि पंजाब में सरकार द्वारा किए जा रहे विकास कार्यों और जनहित के फैसलों से विरोधी दल परेशान हैं.
केजरीवाल का कहना है कि जब कोई सरकार जनता के हित में काम करती है तो उसके खिलाफ झूठे आरोप और अफवाहें फैलाने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं. उन्होंने दावा किया कि भगवंत मान के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान भी इसी राजनीति का हिस्सा है.
पंजाब की राजनीति में बढ़ा सियासी तापमान
फर्जी वीडियो विवाद ने पंजाब की राजनीति को एक बार फिर गर्मा दिया है. एक ओर मुख्यमंत्री इसे राजनीतिक साजिश बता रहे हैं, वहीं विपक्ष और अन्य पक्ष इस मुद्दे पर सवाल उठा रहे हैं. आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक राजनीतिक बहस का विषय बन सकता है.
फिलहाल भगवंत मान ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी तरह के दबाव में आने वाले नहीं हैं और पंजाब, किसानों, युवाओं तथा राज्य के हितों से जुड़े फैसले आगे भी लेते रहेंगे. उन्होंने जनता से अपील की कि वे अफवाहों और भ्रामक प्रचार से बचें तथा तथ्यों के आधार पर ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचें.
Explainer: क्या फिर टूटने जा रही है उद्धव ठाकरे की शिवसेना? 2022 से 2026 तक समझिए पूरा सियासी खेल
Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से भारी हलचल देखने को मिल रही है. शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे में एक बार फिर बड़ी टूट की अटकलों ने सियासी माहौल को पूरी तरह से गर्मा दिया है. राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा बहुत तेज है कि पार्टी के 5 सांसद उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ सकते हैं. यह सभी सांसद संसद में एक अलग समूह बनाने की तैयारी कर रहे हैं. इन खबरों के सामने आने के बाद उद्धव ठाकरे ने तुरंत पार्टी सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई. इस बैठक में उन्होंने सभी नेताओं को बहुत साफ संदेश दिया कि जो भी जाना चाहता है, उसे रोकने की कोई जरूरत नहीं है.
उद्धव ठाकरे का भावुक और कड़ा संदेश
सांसदों की बैठक में उद्धव ठाकरे ने बेहद भावुक अंदाज में अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि वर्तमान समय भले ही उनके पक्ष में न हो, लेकिन भविष्य जरूर उनका ही होगा. उन्होंने पार्टी के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं से संघर्ष जारी रखने और धैर्य बनाए रखने की अपील की. ठाकरे ने कहा कि राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन कठिन समय में ही किसी संगठन और उसके नेताओं की असली परीक्षा होती है.
क्या पार्टी के भीतर चल रहा है असंतोष?
उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई नेता या सांसद पार्टी छोड़ना चाहता है, तो उसे रोकने का कोई मतलब नहीं है. उन्होंने कहा कि अगर कोई जाना चाहता है तो उसे जाने दो. मैं सिर्फ उसे शुभकामनाएं दे सकता हूं और यही उम्मीद कर सकता हूं कि वह जहां जाए, वहां सफल हो. उनके इस बयान को पार्टी के भीतर चल रही असंतोष की चर्चाओं से जोड़कर देखा जा रहा है.
पुरानी बगावत का किया जिक्र
बैठक के दौरान उद्धव ठाकरे ने वर्ष 2022 की उस बड़ी राजनीतिक घटना का भी जिक्र किया, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में ऐतिहासिक बगावत हुई थी. उस बगावत के कारण न सिर्फ महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई थी, बल्कि शिवसेना भी दो हिस्सों में बंट गई थी. ठाकरे ने कहा कि उस समय उन्हें पार्टी के भीतर चल रही गतिविधियों की जानकारी थी, लेकिन वह किसी भी नेता को दबाव डालकर रोकने के पक्ष में नहीं थे. उनका मानना है कि जो व्यक्ति दिल से पार्टी के साथ नहीं रहना चाहता, उसे जबरन साथ रखने का कोई फायदा नहीं होता है.
संसद में अलग समूह बनाने की रणनीति
इधर राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि यदि असंतुष्ट सांसद अलग होते हैं तो वे किसी दूसरी पार्टी में शामिल होने के बजाय संसद में एक स्वतंत्र समूह बना सकते हैं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कदम पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा अपनाए गए मॉडल जैसा हो सकता है. ऐसी संभावना जताई जा रही है कि अलग होने वाले सांसद संसद में एक अलग ब्लॉक बनाकर बाहर से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए का समर्थन कर सकते हैं. हालांकि अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
शिवसेना के इतिहास की 5वी बड़ी बगावत
यदि 5 सांसदों के अलग होने की खबरें सच साबित होती हैं, तो यह शिवसेना के इतिहास में पांचवीं बड़ी बगावत होगी. पार्टी के गठन के बाद से अब तक कई बड़े नेता अलग होकर अपना रास्ता चुन चुके हैं. सबसे पहले 1991 में छगन भुजबल ने शिवसेना से बगावत की थी. इसके बाद 2005 में नारायण राणे ने पार्टी छोड़कर बड़ा राजनीतिक झटका दिया था. वर्ष 2006 में राज ठाकरे ने शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी मनसे का गठन किया, जिससे पार्टी को काफी नुकसान हुआ था. इसके बाद 2022 में एकनाथ शिंदे की बगावत ने शिवसेना के राजनीतिक भविष्य को पूरी तरह बदल दिया.
सबको याद है साल 2022
वर्ष 2022 की बगावत को शिवसेना के इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट माना जाता है. उस समय बड़ी संख्या में विधायक शिंदे के साथ चले गए थे. इसके परिणामस्वरूप उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था और बाद में चुनाव आयोग ने शिवसेना का नाम और चुनाव चिन्ह भी शिंदे गुट को दे दिया था. इसके बाद उद्धव ठाकरे को अपनी पार्टी का नया नाम और नया चुनाव चिन्ह अपनाना पड़ा था.
आदित्य ठाकरे को सांसदों पर पूरा भरोसा
इन तमाम अटकलों के बीच शिवसेना यूबीटी के नेता और विधायक आदित्य ठाकरे ने पार्टी सांसदों पर पूरा भरोसा जताया है. पुणे में मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी के सांसद पूरी तरह शिवसेना के साथ हैं और उनकी निष्ठा पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता है. आदित्य ठाकरे ने कहा कि कुछ लोग अंधभक्ति की बात करते हैं, लेकिन उन्हें अपने सांसदों पर अंधविश्वास है. उनका कहना था कि पार्टी नेतृत्व को अपने सभी सांसदों पर पूरा भरोसा है और वे किसी भी तरह की अफवाहों से प्रभावित नहीं होंगे.
ऑपरेशन टाइगर भी रहा चर्चाओं का विषय
हाल के दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में ऑपरेशन टाइगर नामक चर्चाएं भी सुर्खियों में हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि कुछ राजनीतिक ताकतें विपक्षी नेताओं और सांसदों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही हैं. हालांकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. फिर भी 5 सांसदों के संभावित अलगाव की खबरों ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है.
शिवसेना यूबीटी कर रही है एकजुट होने का दावा
फिलहाल, शिवसेना यूबीटी की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और सभी सांसद नेतृत्व के साथ खड़े हैं. वहीं दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी. यदि सांसदों की नाराजगी वास्तव में सामने आती है, तो महाराष्ट्र की राजनीति में एक और बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल सकता है. फिलहाल सभी की नजरें उद्धव ठाकरे और उनके सांसदों के अगले कदम पर टिक गई हैं.
FAQs
Q. एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे को क्यों छोड़ा?
एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की थी. उनका कहना था कि शिवसेना के दो-तिहाई विधायकों की मांग के बावजूद ठाकरे ने महा विकास अघाड़ी से गठबंधन खत्म करने से इनकार कर दिया.
Q. महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी कौन सी है?
हाल के वर्षों में भाजपा ने मराठा समुदाय को साधने के लिए अधिक मराठा उम्मीदवारों को टिकट दिया. इसका असर यह रहा कि 2014 से पार्टी लगातार विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.
Q. क्या महाराष्ट्र में बीजेपी के पास बहुमत है?
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 66.05% मतदान हुआ, जो 1995 के बाद सबसे ज्यादा रहा. भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने बड़ी जीत दर्ज करते हुए 288 में से 235 सीटों पर कब्जा किया.
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