Metal share: वेदांता एल्यूमिनियम, हिंडाल्को और नाल्को के शेयर क्यों 5% तक टूटे, क्या है यूएस-ईरान डील से संबंध
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम और शांति समझौते की दिशा में हुई प्रगति का असर मंगलवार को भारतीय मेटल शेयरों पर साफ दिखाई दिया। एल्युमिनियम की वैश्विक कीमतों में तेज गिरावट के बाद वेदांता लिमिटेड, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज और नेशनल एल्यूमिनियम के शेयरों में 5% तक की गिरावट दर्ज की गई।
लंदन मेटल एक्सचेंज पर एल्युमिनियम की कीमत 4.4% गिरकर 3379.50 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई, जो 27 मार्च के बाद का सबसे निचला स्तर। यह गिरावट इसलिए आई क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद होर्मुज स्ट्रेट के दोबारा खुलने की उम्मीद बढ़ गई है।
दरअसल, ईरान युद्ध के दौरान मध्य-पूर्व के कई एल्युमिनियम स्मेल्टर मिसाइल हमलों की चपेट में आए थे। वहीं होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से कच्चे माल और तैयार धातु की सप्लाई भी प्रभावित हुई थी। इससे वैश्विक बाजार में एल्युमिनियम की कमी पैदा हो गई थी और कीमतें तेजी से बढ़ी थीं। लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। बाजार को उम्मीद है कि स्ट्रेट खुलने के बाद एल्युमिनियम की सप्लाई फिर से सामान्य हो जाएगी, जिससे कीमतों पर दबाव बढ़ेगा।
सोमवार सुबह करीब 9:55 बजे निफ्टी मेटल इंडेक्स 1.5% गिरकर 12883.45 पर कारोबार कर रहा था। सबसे ज्यादा दबाव वेदांता एल्युमिनियम और वेदांता ऑयल एंड गैस पर दिखा, जिनके शेयर करीब 5% टूट गए। नालको में भी लगभग 4.85% की गिरावट दर्ज हुई। वहीं हिंडाल्को निफ्टी का सबसे बड़ा लूजर रहा और इसके शेयर करीब 4% तक फिसल गए।
अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज फर्म बैंक ऑफ अमेरिका का मानना है कि सप्लाई संबंधी जोखिम कम होने और मांग को लेकर चिंता बने रहने से निकट भविष्य में एल्युमिनियम की कीमतें दबाव में रह सकती हैं। रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल में मध्य-पूर्व का उत्पादन सालाना आधार पर 35% घटा था, लेकिन चीन और अन्य देशों में बढ़ता उत्पादन इस कमी की भरपाई कर सकता है।
हालांकि, एक्सिस सिक्योरिटीज का मानना है कि कीमतों में कुछ गिरावट संभव है, लेकिन एल्युमिनियम के दाम पुराने 2,500 डॉलर प्रति टन से नीचे जाने की संभावना कम है। ब्रोकरेज ने फाइनेंशियल ईयर 2026, FY27 और FY28 के लिए एल्युमिनियम कीमतों का अनुमान क्रमशः 3295 डॉलर, 3175 डॉलर और 3025 डॉलर प्रति टन बनाए रखा है।
ब्रोकरेज ने हिंडाल्को और नालको पर अपनी बाय रेटिंग बरकरार रखी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पकाल में दबाव रह सकता है। लेकिन लंबी अवधि में मजबूत मांग और उत्पादन लागत कीमतों को सहारा देती रहेगी।
(प्रियंका कुमारी)
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