हथियारी नक्सली गए, अब मौका तलाश रहे दिमागी नक्सली; लालकिले से बोले PM मोदी
पीएम मोदी ने लाल किले से लगातार 13वीं बार देशवासियों को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि देश से हथियारी नक्सल गए, लेकिन दिमागी नक्सली मौके की ताक में हैं, उन्हें पहचानने की जरूरत है।
'जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है': बागेश्वर धाम में धीरेंद्र शास्त्री के सानिध्य का अनुभव
हरिभूमि के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी का विशेष अनुभव वृत्तांत
बागेश्वर धाम की यात्रा केवल एक धार्मिक स्थल तक पहुंचने का अनुभव नहीं, बल्कि गढ़ा गांव और आसपास के क्षेत्र में आए बदलाव को करीब से देखने का अवसर भी है। पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से मुलाकात और उनके सहज व्यक्तित्व को करीब से देखने के बाद एक बात बार-बार मन में आती है-
'जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है।'
तीन दिन पहले सोशल मीडिया पर अपने एक छायाचित्र के साथ अनायास ही एक पोस्ट लिखा था “जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है।” यह वाक्य जीवन के अनुभव पर ही आधारित था। बीते कल उसी अनुभव से एक बार फिर गुजरने का अवसर मिला। मध्यप्रदेश अंतर्गत छतरपुर जिले के गढ़ा गाँव जाने का अवसर मिला, जहाँ पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का जन्म हुआ। वही गढ़ा, जिसे आज बागेश्वर धाम के रूप में राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है।
एक दशक पहले तक यह इलाका देश के उन पिछड़े और बुनियादी सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में गिना जा सकता था, जहाँ सामान्य जरूरतों के लिए भी लोगों को संघर्ष करना पड़ता था। आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में विकास की गति बहुत धीमी थी। लेकिन एक दशक के भीतर इस गाँव और पूरे इलाके की दशा और दिशा- दोनों बदल गई हैं।
इस बदलाव को समझने के लिए किसी आँकड़े की जरूरत नहीं। गाँव में प्रवेश करते ही तस्वीर सामने दिखाई देने लगती है।
जिस गाँव में कभी चाय पीने के लिए एक छोटी-सी टपरी ढूँढ़ना भी मुश्किल रहा होगा, आज वहाँ होटल, मोटल, धर्मशालाएँ और भोजनालय बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। गाँव की मूल आबादी से कई गुना अधिक लोग प्रतिदिन यहाँ आते-जाते हैं। यह संख्या कभी -ककभी हजारों से लाखों में भी तब्दील हो जाती है। एक छोटे-से गाँव का इस तरह तीर्थस्थल और आस्था के बड़े केंद्र में बदल जाना अपने आप में असाधारण घटना है।
और इसके केंद्र में है- एक व्यक्ति
एक ऐसा व्यक्ति, जिसने स्वयं अत्यंत साधारण, अभावग्रस्त और संघर्षशील परिवार में जन्म लिया। दारिद्रय और अभावग्रस्त जीवन में जो भी दुखों की कल्पना की जा सकती है, वह उन्होंन बालपन में ही भोगा है। अपनी मां को महज एक साड़ी में महीनों गुजारते देखने को भी वह विवश रहे। पूर्व जन्म के सत्कर्म के चलते किशोरावस्था में ही ईश्वर की कृपा ने उन्हें वह शक्तियां प्रदान की,ऐसी ऊँचाई दी कि आज हजारों-लाखों लोग उसके माध्यम से भगवान तक पहुँचने की कोशिश करते हैं। अपने दुख- दर्द के निवारण ओर उम्मीद-आकांक्षा की पूर्ति के लिए उन्हें ही माध्यम माने हुए हैं। यह पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का प्रभाव है।
उनके प्रति लोगों की आस्था और श्रद्धा को देखकर कई बार यह महसूस होता है कि लोग उनमें ही ईश्वर की छवि तलाशने लगते हैं। कोई उनके चरणों की धूल अपने शीश पर लगाकर स्वयं को धन्य मानता है, तो कोई केवल एक बार उनका सानिध्य तो छोड़िए दर्शन मात्र से अपने आपको सौभाग्यशाली समझता है।ऐसे में व्यक्ति से स्वयं को ईश्वर मान लेने की भूल सहज ही हो जाती है,लेकिन धीरेंद्र शास्त्री जी अपने आपको इस भ्रम से अभी तक बचाए हुए हैं। वह अच्छा मनुष्य होने की प्रक्रिया में ही है।
अपने शुरुआती जीवन की की कठिनाई और विपदाओं को वह भूले नहीं हैं। पांच सितारा सुविधाएँ, लंबी- लंबी गाड़ियों के काफिले, चार्टर विमान की कतारें, शिखर राजनेताओं और सफल उद्योगपतियों की उनके समक्ष निरंतर दंडवत उपस्थिति के बीच वह समाज के वंचित-दमित जन जीवन को भूलते नहीं है। आज भी हर रोज अठारह घंटे के श्रम और पांच से हजार नये लोगों के साथ मुलाकात को वह अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए हुए हैं।
इस पूरे आभामंडल के बीच जो दो बात सबसे अधिक प्रभावित करती है, वह है उनकी जीवन को लेकर विद्वता और आचरण में सहजता। सहज बने रहना कोशिश के तहत नहीं, स्वाभाविक है। विद्वता का बोध तो उनके मुख से निकले बोलों से सहज ही हो जाता है। गत दिवस उनका लगभग डेढ़ घंटे का सानिध्य मिला। इस दौरान कहीं भी ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि सामने बैठा व्यक्ति अपनी प्रसिद्धि, उपलब्धियों या प्रभाव का बोध करा रहा हो। न अहंकार का प्रदर्शन, न उपलब्धियों का श्रेय स्वयं को देने की कोशिश।बार-बार एक ही भाव सामने आया- जो कुछ है, बालाजी की कृपा से है। समाज से जो मिला है, उसे समाज को और बेहतर तरीके से लौटाना है।
शायद यही भाव उनके काम की दिशा भी तय करता है।
जो लोग अपनी परेशानियाँ, अपने दुख और अपनी उम्मीदें लेकर उनके पास आते हैं, उनके लिए कुछ करने की कोशिश लगातार दिखाई देती है। आदिवासी बहुल और बुनियादी सहूलियत से भी वंचित इलके में उनके द्वारा कैंसर अस्पताल जैसे बड़े प्रकल्प की स्थापना का प्रयास इसी सोच का विस्तार हैं। शिक्षा और भारतीय संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए गुरुकुल की स्थापना भी इसी कोशिश का हिस्सा है।भारतीय परंपरा में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और वैदिक चेतना का अभिन्न हिस्सा रही है। इसी भाव से यहां गौशाला का संचालन भी जारी है। जहां पुंगनूर जैसी दुर्लभ प्रजाति की गायें भी मौजूद हैं।
इन सबको केवल निर्माण कार्यों की सूची के रूप में देखना शायद उचित नहीं होगा। इनके पीछे एक ऐसी सोच दिखाई देती है, जिसमें अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और समाज के प्रति दायित्व को निभाने की कोशिश है।यह सब उस व्यक्ति के द्वारा है जिसने अभी जीवन के तीन दशक भी पूरे नहीं किए हैं। दुनिया को चमत्कृत कर देने वाला प्रभाव पैदा कर दिया है।
इस चमत्कार और हजारों लोगों की भीड़ के बीच उनसे एकांत में इत्मीनान से मुलाकात में करिश्माई आध्यात्मिक व्यक्तित्व से मिलने के साथ ही एक अल्हड़ युवा से मिलने जैसा अनुभव भी था।
बिंदास हँसी-बेफिक्र अंदाज और ताली बजाकर जोरदार ठहाके।इसके साथ ही चेहरे पर स्थायी रूप से विराजमान मंद-मंद मुस्कान। गंभीर से गंभीर विषय को भी सहजता से कहना, गूढ़ बात को भी मुस्कराते हुए समझा देना और बात-बात में ठहाका लगा देना- यही वह अंदाज है जो धीरेंद्र शास्त्री को सामान्य से अलग करता है। अन्य संतों के चेहरे पर दिखने वाली गंभीरता से बिल्कुल ही उलट उनका यह अंदाज उन्हें और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
गहरी बात सहजता से कह देने का उनका यह अंदाज अभी भी दिखा जब चर्चा के दौरान किसी प्रसंग पर उन्होंने कहा कि कार्य अच्छा या बुरा से ज्यादातर महत्वपूर्ण है कि वह किस उद्देश्य से किया जा रहा है। यज्ञ तो गुरू विश्वामित्र जी और लंकापति रावण दोनों ने ही किया था। जगत कल्याण की भावना से वशीभूत होकर विश्वामित्र जी जब यज्ञ कर रहे थे तो रामजी धनुष बाण लेकर स्वयं रक्षा के लिए खड़े हो गए, वहीं आनाचार के लिए शक्ति पाने रावण यज्ञ करा था तो रामजी ने उसका विध्वंस करा दिया। इसलिए उद्देश्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
एक तरफ लाखों लोगों की आस्था का केंद्र बना व्यक्तित्व। दूसरी तरफ उसी व्यक्तित्व में दिखाई देती सहजता, मस्ती और अल्हड़पन।
इतनी प्रसिद्धि, इतना सम्मान , इतना सामर्थ्य और इतना बड़ा आभामंडल मिलने के बाद भी यदि कोई व्यक्ति अपने भीतर यह भाव बचाकर रख सके कि “मैं नहीं, सब कुछ बालाजी और संन्यासी बाबा की कृपा से है”, तो यह अपने आप में सराहनीय भी है और वंदनीय भी है।
गढ़ा गाँव की यात्रा और पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी कासानिध्य एक बार फिर इस बात को प्रमाणित कर गया कि जीवन में उपलब्धियाँ कितनी बड़ी हैं, इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन उपलब्धियों का श्रेय हम किसे देते हैं और उनसे प्राप्त शक्ति का उपयोग किसके लिए और किस तरह करते हैं।और शायद इसीलिए तीन दिन पहले लिखी वह पंक्ति अपने आपको प्रमाणित करते हुए महसूस हुई कि-“जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है।
भगवान और भक्त बने आस्था के केंद्र
आज दुनिया जिस स्थान को बागेश्वर धाम के नाम से पुकारती है, दरअसल वह छतरपुर जिले के छोटे से गांव गढ़ा में स्थित दो देवालयों से अपनी मूल पहचान पाता है।यहां एक ओर महादेव हैं- शिवलिंग के स्वरूप में। महादेव के दर्शन करते हुए अद्भुत अनुभूति होती है। शिवलिंग को देखकर ऐसा लगता है मानो आप स्वयं काशी विश्वनाथ के स्वरूप के दर्शन कर रहे हों। इस शिवलिंग के सम्मुख सदैव दीपक के माध्यम से प्रकाश रहता है। स्थानीय मान्यता है कि यहां विद्युत बल्ब प्रभावी नहीं रहते और दीपक की परंपरा निरंतर बनी हुई है।
महादेव से कुछ ही दूरी पर हनुमान जी की प्रतिमा है। यही वह बालाजी हैं, जिनकी सेवा में आज पंडित धीरेंद्र शास्त्री स्वयं को समर्पित मानते हैं। वास्तव में बागेश्वर धाम की पहचान भी इसी बालाजी महाराज के नाम से जुड़ी हुई है।
लेकिन आज जब देश के कोने-कोने से लोग यहां पहुंच रहे हैं, तो यह समझना कठिन हो जाता है कि कितने लोग बालाजी के दर्शन के लिए आ रहे हैं और कितने धीरेंद्र शास्त्री से मिलने की इच्छा लेकर। शायद यही ईश्वर की कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण है कि एक संत और पीठाधीश्वर स्वयं उस आस्था के पर्याय बन गए हैं, जिसकी मूल शक्ति उनके आराध्य में है।
ईश्वर की कृपा क्या होती है, इसका सबसे सुंदर उदाहरण राम और हनुमान के संबंध में दिखाई देता है। राम की कृपा हुई तो हनुमान केवल सेवक नहीं रहे; वे स्वयं भगवान के स्वरूप में पूजे जाने लगे। यही तो ईश्वर की कृपा है, जब साधक और उसकी साधना स्वयं आस्था का केंद्र बन जाए।
कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति आज बागेश्वर धाम में दिखाई देती है।
लेकिन जितनी तेजी से यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है, उस अनुपात में व्यवस्थाएं अभी दिखाई नहीं देतीं। सरकार और प्रशासन के स्तर पर यहां विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। बेहतर सड़कें, यातायात व्यवस्था, स्वच्छता, ठहरने की सुविधाएं और श्रद्धालुओं के लिए समुचित आधारभूत ढांचा- इन सब पर गंभीरता से काम किया जाना चाहिए।
गढ़ा की गलियों और रास्तों से गुजरते हुए कई जगह यह महसूस होता है कि जिस गति से आस्था यहां लोगों को खींच रही है, उस गति से व्यवस्थाएं अभी पीछे हैं।
भविष्य में यदि यह स्थान शिरडी या कैंची धाम जैसे बड़े धार्मिक केंद्र का स्वरूप ग्रहण कर ले, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आस्था की शक्ति किसी साधारण से स्थान को असाधारण ऊंचाई तक पहुंचा सकती है।
बागेश्वर धाम आज केवल वर्तमान की कहानी नहीं है। यह भविष्य की एक बड़ी संभावना का संकेत भी दे रहा है। इस संभावना के केंद्र में हैं -बालाजी महाराज, उनकी कृपा, और उस कृपा को जन-जन तक पहुंचाने वाले धीरेंद्र शास्त्री।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
Hindustan
Haribhoomi










