'जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है': बागेश्वर धाम में धीरेंद्र शास्त्री के सानिध्य का अनुभव
हरिभूमि के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी का विशेष अनुभव वृत्तांत
बागेश्वर धाम की यात्रा केवल एक धार्मिक स्थल तक पहुंचने का अनुभव नहीं, बल्कि गढ़ा गांव और आसपास के क्षेत्र में आए बदलाव को करीब से देखने का अवसर भी है। पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से मुलाकात और उनके सहज व्यक्तित्व को करीब से देखने के बाद एक बात बार-बार मन में आती है-
'जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है।'
तीन दिन पहले सोशल मीडिया पर अपने एक छायाचित्र के साथ अनायास ही एक पोस्ट लिखा था “जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है।” यह वाक्य जीवन के अनुभव पर ही आधारित था। बीते कल उसी अनुभव से एक बार फिर गुजरने का अवसर मिला। मध्यप्रदेश अंतर्गत छतरपुर जिले के गढ़ा गाँव जाने का अवसर मिला, जहाँ पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का जन्म हुआ। वही गढ़ा, जिसे आज बागेश्वर धाम के रूप में राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है।
एक दशक पहले तक यह इलाका देश के उन पिछड़े और बुनियादी सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में गिना जा सकता था, जहाँ सामान्य जरूरतों के लिए भी लोगों को संघर्ष करना पड़ता था। आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में विकास की गति बहुत धीमी थी। लेकिन एक दशक के भीतर इस गाँव और पूरे इलाके की दशा और दिशा- दोनों बदल गई हैं।
इस बदलाव को समझने के लिए किसी आँकड़े की जरूरत नहीं। गाँव में प्रवेश करते ही तस्वीर सामने दिखाई देने लगती है।
जिस गाँव में कभी चाय पीने के लिए एक छोटी-सी टपरी ढूँढ़ना भी मुश्किल रहा होगा, आज वहाँ होटल, मोटल, धर्मशालाएँ और भोजनालय बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। गाँव की मूल आबादी से कई गुना अधिक लोग प्रतिदिन यहाँ आते-जाते हैं। यह संख्या कभी -ककभी हजारों से लाखों में भी तब्दील हो जाती है। एक छोटे-से गाँव का इस तरह तीर्थस्थल और आस्था के बड़े केंद्र में बदल जाना अपने आप में असाधारण घटना है।
और इसके केंद्र में है- एक व्यक्ति
एक ऐसा व्यक्ति, जिसने स्वयं अत्यंत साधारण, अभावग्रस्त और संघर्षशील परिवार में जन्म लिया। दारिद्रय और अभावग्रस्त जीवन में जो भी दुखों की कल्पना की जा सकती है, वह उन्होंन बालपन में ही भोगा है। अपनी मां को महज एक साड़ी में महीनों गुजारते देखने को भी वह विवश रहे। पूर्व जन्म के सत्कर्म के चलते किशोरावस्था में ही ईश्वर की कृपा ने उन्हें वह शक्तियां प्रदान की,ऐसी ऊँचाई दी कि आज हजारों-लाखों लोग उसके माध्यम से भगवान तक पहुँचने की कोशिश करते हैं। अपने दुख- दर्द के निवारण ओर उम्मीद-आकांक्षा की पूर्ति के लिए उन्हें ही माध्यम माने हुए हैं। यह पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का प्रभाव है।
उनके प्रति लोगों की आस्था और श्रद्धा को देखकर कई बार यह महसूस होता है कि लोग उनमें ही ईश्वर की छवि तलाशने लगते हैं। कोई उनके चरणों की धूल अपने शीश पर लगाकर स्वयं को धन्य मानता है, तो कोई केवल एक बार उनका सानिध्य तो छोड़िए दर्शन मात्र से अपने आपको सौभाग्यशाली समझता है।ऐसे में व्यक्ति से स्वयं को ईश्वर मान लेने की भूल सहज ही हो जाती है,लेकिन धीरेंद्र शास्त्री जी अपने आपको इस भ्रम से अभी तक बचाए हुए हैं। वह अच्छा मनुष्य होने की प्रक्रिया में ही है।
अपने शुरुआती जीवन की की कठिनाई और विपदाओं को वह भूले नहीं हैं। पांच सितारा सुविधाएँ, लंबी- लंबी गाड़ियों के काफिले, चार्टर विमान की कतारें, शिखर राजनेताओं और सफल उद्योगपतियों की उनके समक्ष निरंतर दंडवत उपस्थिति के बीच वह समाज के वंचित-दमित जन जीवन को भूलते नहीं है। आज भी हर रोज अठारह घंटे के श्रम और पांच से हजार नये लोगों के साथ मुलाकात को वह अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए हुए हैं।
इस पूरे आभामंडल के बीच जो दो बात सबसे अधिक प्रभावित करती है, वह है उनकी जीवन को लेकर विद्वता और आचरण में सहजता। सहज बने रहना कोशिश के तहत नहीं, स्वाभाविक है। विद्वता का बोध तो उनके मुख से निकले बोलों से सहज ही हो जाता है। गत दिवस उनका लगभग डेढ़ घंटे का सानिध्य मिला। इस दौरान कहीं भी ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि सामने बैठा व्यक्ति अपनी प्रसिद्धि, उपलब्धियों या प्रभाव का बोध करा रहा हो। न अहंकार का प्रदर्शन, न उपलब्धियों का श्रेय स्वयं को देने की कोशिश।बार-बार एक ही भाव सामने आया- जो कुछ है, बालाजी की कृपा से है। समाज से जो मिला है, उसे समाज को और बेहतर तरीके से लौटाना है।
शायद यही भाव उनके काम की दिशा भी तय करता है।
जो लोग अपनी परेशानियाँ, अपने दुख और अपनी उम्मीदें लेकर उनके पास आते हैं, उनके लिए कुछ करने की कोशिश लगातार दिखाई देती है। आदिवासी बहुल और बुनियादी सहूलियत से भी वंचित इलके में उनके द्वारा कैंसर अस्पताल जैसे बड़े प्रकल्प की स्थापना का प्रयास इसी सोच का विस्तार हैं। शिक्षा और भारतीय संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए गुरुकुल की स्थापना भी इसी कोशिश का हिस्सा है।भारतीय परंपरा में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और वैदिक चेतना का अभिन्न हिस्सा रही है। इसी भाव से यहां गौशाला का संचालन भी जारी है। जहां पुंगनूर जैसी दुर्लभ प्रजाति की गायें भी मौजूद हैं।
इन सबको केवल निर्माण कार्यों की सूची के रूप में देखना शायद उचित नहीं होगा। इनके पीछे एक ऐसी सोच दिखाई देती है, जिसमें अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और समाज के प्रति दायित्व को निभाने की कोशिश है।यह सब उस व्यक्ति के द्वारा है जिसने अभी जीवन के तीन दशक भी पूरे नहीं किए हैं। दुनिया को चमत्कृत कर देने वाला प्रभाव पैदा कर दिया है।
इस चमत्कार और हजारों लोगों की भीड़ के बीच उनसे एकांत में इत्मीनान से मुलाकात में करिश्माई आध्यात्मिक व्यक्तित्व से मिलने के साथ ही एक अल्हड़ युवा से मिलने जैसा अनुभव भी था।
बिंदास हँसी-बेफिक्र अंदाज और ताली बजाकर जोरदार ठहाके।इसके साथ ही चेहरे पर स्थायी रूप से विराजमान मंद-मंद मुस्कान। गंभीर से गंभीर विषय को भी सहजता से कहना, गूढ़ बात को भी मुस्कराते हुए समझा देना और बात-बात में ठहाका लगा देना- यही वह अंदाज है जो धीरेंद्र शास्त्री को सामान्य से अलग करता है। अन्य संतों के चेहरे पर दिखने वाली गंभीरता से बिल्कुल ही उलट उनका यह अंदाज उन्हें और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
गहरी बात सहजता से कह देने का उनका यह अंदाज अभी भी दिखा जब चर्चा के दौरान किसी प्रसंग पर उन्होंने कहा कि कार्य अच्छा या बुरा से ज्यादातर महत्वपूर्ण है कि वह किस उद्देश्य से किया जा रहा है। यज्ञ तो गुरू विश्वामित्र जी और लंकापति रावण दोनों ने ही किया था। जगत कल्याण की भावना से वशीभूत होकर विश्वामित्र जी जब यज्ञ कर रहे थे तो रामजी धनुष बाण लेकर स्वयं रक्षा के लिए खड़े हो गए, वहीं आनाचार के लिए शक्ति पाने रावण यज्ञ करा था तो रामजी ने उसका विध्वंस करा दिया। इसलिए उद्देश्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
एक तरफ लाखों लोगों की आस्था का केंद्र बना व्यक्तित्व। दूसरी तरफ उसी व्यक्तित्व में दिखाई देती सहजता, मस्ती और अल्हड़पन।
इतनी प्रसिद्धि, इतना सम्मान , इतना सामर्थ्य और इतना बड़ा आभामंडल मिलने के बाद भी यदि कोई व्यक्ति अपने भीतर यह भाव बचाकर रख सके कि “मैं नहीं, सब कुछ बालाजी और संन्यासी बाबा की कृपा से है”, तो यह अपने आप में सराहनीय भी है और वंदनीय भी है।
गढ़ा गाँव की यात्रा और पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी कासानिध्य एक बार फिर इस बात को प्रमाणित कर गया कि जीवन में उपलब्धियाँ कितनी बड़ी हैं, इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन उपलब्धियों का श्रेय हम किसे देते हैं और उनसे प्राप्त शक्ति का उपयोग किसके लिए और किस तरह करते हैं।और शायद इसीलिए तीन दिन पहले लिखी वह पंक्ति अपने आपको प्रमाणित करते हुए महसूस हुई कि-“जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है।
भगवान और भक्त बने आस्था के केंद्र
आज दुनिया जिस स्थान को बागेश्वर धाम के नाम से पुकारती है, दरअसल वह छतरपुर जिले के छोटे से गांव गढ़ा में स्थित दो देवालयों से अपनी मूल पहचान पाता है।यहां एक ओर महादेव हैं- शिवलिंग के स्वरूप में। महादेव के दर्शन करते हुए अद्भुत अनुभूति होती है। शिवलिंग को देखकर ऐसा लगता है मानो आप स्वयं काशी विश्वनाथ के स्वरूप के दर्शन कर रहे हों। इस शिवलिंग के सम्मुख सदैव दीपक के माध्यम से प्रकाश रहता है। स्थानीय मान्यता है कि यहां विद्युत बल्ब प्रभावी नहीं रहते और दीपक की परंपरा निरंतर बनी हुई है।
महादेव से कुछ ही दूरी पर हनुमान जी की प्रतिमा है। यही वह बालाजी हैं, जिनकी सेवा में आज पंडित धीरेंद्र शास्त्री स्वयं को समर्पित मानते हैं। वास्तव में बागेश्वर धाम की पहचान भी इसी बालाजी महाराज के नाम से जुड़ी हुई है।
लेकिन आज जब देश के कोने-कोने से लोग यहां पहुंच रहे हैं, तो यह समझना कठिन हो जाता है कि कितने लोग बालाजी के दर्शन के लिए आ रहे हैं और कितने धीरेंद्र शास्त्री से मिलने की इच्छा लेकर। शायद यही ईश्वर की कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण है कि एक संत और पीठाधीश्वर स्वयं उस आस्था के पर्याय बन गए हैं, जिसकी मूल शक्ति उनके आराध्य में है।
ईश्वर की कृपा क्या होती है, इसका सबसे सुंदर उदाहरण राम और हनुमान के संबंध में दिखाई देता है। राम की कृपा हुई तो हनुमान केवल सेवक नहीं रहे; वे स्वयं भगवान के स्वरूप में पूजे जाने लगे। यही तो ईश्वर की कृपा है, जब साधक और उसकी साधना स्वयं आस्था का केंद्र बन जाए।
कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति आज बागेश्वर धाम में दिखाई देती है।
लेकिन जितनी तेजी से यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है, उस अनुपात में व्यवस्थाएं अभी दिखाई नहीं देतीं। सरकार और प्रशासन के स्तर पर यहां विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। बेहतर सड़कें, यातायात व्यवस्था, स्वच्छता, ठहरने की सुविधाएं और श्रद्धालुओं के लिए समुचित आधारभूत ढांचा- इन सब पर गंभीरता से काम किया जाना चाहिए।
गढ़ा की गलियों और रास्तों से गुजरते हुए कई जगह यह महसूस होता है कि जिस गति से आस्था यहां लोगों को खींच रही है, उस गति से व्यवस्थाएं अभी पीछे हैं।
भविष्य में यदि यह स्थान शिरडी या कैंची धाम जैसे बड़े धार्मिक केंद्र का स्वरूप ग्रहण कर ले, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आस्था की शक्ति किसी साधारण से स्थान को असाधारण ऊंचाई तक पहुंचा सकती है।
बागेश्वर धाम आज केवल वर्तमान की कहानी नहीं है। यह भविष्य की एक बड़ी संभावना का संकेत भी दे रहा है। इस संभावना के केंद्र में हैं -बालाजी महाराज, उनकी कृपा, और उस कृपा को जन-जन तक पहुंचाने वाले धीरेंद्र शास्त्री।
Right to Fly National Flag: आजादी के पांच दशक बाद तक आम नागरिकों को नहीं थी तिरंगा फहराने की छूट; जानिए कैसे मिला यह अधिकार
देशभर में स्वतंत्रता दिवस का उल्लास है और केंद्र सरकार के 'हर घर तिरंगा' अभियान के तहत करोड़ों नागरिक अपने घरों पर शान से राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहे हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 1947 में देश के आजाद होने के बाद करीब 50 वर्षों तक आम नागरिकों को अपनी मर्जी से रोजाना तिरंगा फहराने की इजाजत नहीं थी। तत्कालीन नियमों और फ्लैग कोड के सख्त प्रतिबंधों के कारण केवल गिने-चुने राष्ट्रीय पर्वों पर ही आम जनता को झंडा फहराने की अनुमति दी गई थी।
आजादी के बाद क्यों लगाई गई थी आम जनता पर पाबंदी
वर्ष 1950 में राष्ट्रीय ध्वज के अनावरण और संविधान लागू होने के बाद से ही ध्वज के सम्मान को बनाए रखने के लिए नियम तय किए गए थे। सरकार का मुख्य दृष्टिकोण यह था कि तिरंगे के उपयोग को सीमित रखा जाए ताकि किसी भी तरह से इसका अनादर न हो।
सरकार की आशंका थी कि बिना रोक-टोक छूट देने से इसका व्यावसायिक दुरुपयोग हो सकता है, रैलियों या प्रदर्शनों में अंधाधुंध इस्तेमाल होगा और रख-रखाव में लापरवाही बरती जा सकती है। इसी वजह से देश में यह आम धारणा बन गई कि राष्ट्रीय ध्वज का उपयोग केवल मंत्रियों, सरकारी भवनों और प्रशासनिक कार्यालयों तक ही सीमित है।
फ्लैग कोड की वैधानिक स्थिति और उससे जुड़े नियम
राष्ट्रीय ध्वज के उपयोग को नियमित करने के लिए संसद ने दो मुख्य कानून पारित किए थे- पहला, व्यावसायिक दुरुपयोग रोकने के लिए 'द एम्ब्लेम्स एंड नेम्स (प्रिवेंशन ऑफ इम्प्रॉपर यूज) एक्ट, 1950' और दूसरा, राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को रोकने के लिए 'प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971'। इन कानूनों के अलावा गृह मंत्रालय द्वारा 'फ्लैग कोड' जारी किया गया था।
यह कोड संसद से पारित कानून नहीं था, बल्कि कार्यपालिका के प्रशासनिक दिशा-निर्देशों का एक समूह था। इसके तहत आम नागरिकों, निजी संस्थानों और स्कूलों को केवल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे खास अवसरों पर ही झंडा फहराने की इजाजत थी, जबकि सामान्य दिनों में निजी परिसरों पर झंडा लगाना प्रतिबंधित माना जाता था।
रायगढ़ की फैक्ट्री में फहराया तिरंगा और कमिश्नर की आपत्ति
इस पूरी व्यवस्था को चुनौती तब मिली जब अमेरिका से पढ़ाई पूरी कर लौटे युवा उद्योगपति नवीन जिंदल ने अपने देश में तिरंगा फहराने की पहल की। अमेरिका में पढ़ाई के दौरान यूनिवर्सिटी स्टूडेंट सीनेट के अध्यक्ष रहते हुए उन्हें गर्व से ध्वज फहराने की आदत थी। 1990 के दशक में भारत लौटकर जब उन्होंने तत्कालीन मध्य प्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के रायगढ़ में अपनी फैक्ट्री के कार्यालय परिसर में रोजाना तिरंगा फहराना शुरू किया, तो सितंबर 1994 में बिलासपुर के तत्कालीन डिवीजनल कमिश्नर ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई।
कमिश्नर ने चेतावनी दी कि तत्कालीन फ्लैग कोड के तहत निजी परिसर में झंडा फहराना गैर-कानूनी है और ऐसा करने पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
अदालत की चौखट तक कैसे पहुंचा मामला
अपनी ही मातृभूमि पर अपनी इमारत पर राष्ट्रध्वज न फहरा पाने की पाबंदी नवीन जिंदल को स्वीकार नहीं हुई। उन्होंने पूर्व कानून मंत्री व वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण सहित देश के शीर्ष कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श लिया। कानूनी राय में यह बात सामने आई कि संसद के दोनों कानूनों में कहीं भी सम्मानपूर्वक झंडा फहराने पर रोक नहीं है, बल्कि यह पाबंदी केवल सरकारी प्रशासनिक निर्देशों के जरिए थोपी गई है।
इसके बाद नवीन जिंदल ने दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर फ्लैग कोड के उन कड़े प्रतिबंधों को चुनौती दी जो नागरिकों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने से रोकते थे।
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला और केंद्र सरकार के तर्क
मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि 'द एम्ब्लेम्स एंड नेम्स एक्ट, 1950' की धारा 3 के तहत सरकार को सार्वजनिक स्थानों या इमारतों पर ध्वज के उपयोग को नियंत्रित और प्रतिबंधित करने का पूरा अधिकार है, और यह नीतिगत फैसला अदालतों के दखल से बाहर होना चाहिए।
हालांकि, सितंबर 1995 में दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार के तर्कों को खारिज करते हुए नवीन जिंदल के पक्ष में फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फ्लैग कोड संसद से पारित कानून नहीं बल्कि प्रशासनिक निर्देश है, इसलिए इसके जरिए नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीना नहीं जा सकता। यदि कोई नागरिक देश के किसी वास्तविक कानून का उल्लंघन किए बिना गरिमा के साथ तिरंगा फहराना चाहता है, तो उसे रोका नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और फ्लैग कोड ऑफ इंडिया 2002
दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी। जब यह अपील शीर्ष अदालत में लंबित थी, तब सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े प्रतिबंधों की समीक्षा के लिए अक्टूबर 2000 में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया।
इस समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने 'फ्लैग कोड ऑफ इंडिया, 2002' तैयार किया, जो 26 जनवरी 2002 से देश में प्रभावी हुआ। इस नए कोड के जरिए पहली बार आम नागरिकों, निजी संस्थानों और शैक्षणिक संगठनों को साल के सभी दिनों में मर्यादा के साथ राष्ट्रध्वज फहराने की व्यवहारिक अनुमति मिल गई।
23 जनवरी 2004: सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ का ऐतिहासिक फैसला
रायगढ़ की फैक्ट्री से शुरू हुआ यह संघर्ष करीब एक दशक बाद 23 जनवरी 2004 को अपने अंतिम मुकाम पर पहुंचा। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी.एन. खरे, जस्टिस बृजेश कुमार और जस्टिस एस.बी. सिन्हा की तीन जजों की पीठ ने 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम नवीन जिंदल' मामले में सर्वसम्मति से ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में व्यवस्था दी कि सम्मान और गरिमा के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है, जो कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का एक मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिकार असीमित नहीं है और अनुच्छेद 19(2) तथा राष्ट्रीय सम्मान के संरक्षण से जुड़े कानूनों के तहत इस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लागू रहेंगे।
नियमों में निरंतर बदलाव और 24 घंटे तिरंगा फहराने की आधुनिक छूट
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े नियमों में समय-समय पर बड़े सुधार किए गए। दिसंबर 2021 में सरकार ने फ्लैग कोड में संशोधन कर हाथ से बने खादी के अलावा मशीन से बने और पॉलिएस्टर के झंडों के उपयोग को भी मंजूरी दी। इसके बाद जुलाई 2022 में एक और अहम संशोधन किया गया, जिसके तहत यदि तिरंगा खुले आसमान के नीचे या किसी नागरिक के निजी आवास पर फहराया गया है, तो उसे दिन और रात (24 घंटे) फहराए रखने की अनुमति दे दी गई। आज देश का हर नागरिक जिस गर्व से अपने घर पर तिरंगा लहराता है, उसकी नींव इसी ऐतिहासिक अदालती लड़ाई से जुड़ी हुई है।
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