पान मसाला की प्लास्टिक पैकिंग पर बैन:अब सिर्फ पेपर, टिन या कांच के जार में बिकेगा गुटखा; FSSAI ने जारी किए नए नियम
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पान मसाला की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक को बैन कर दिया है। नए नियमों के तहत कंपनियां अब सिर्फ पेपर, टिन या ग्लास कंटेनर में ही पान मसाला पैक कर बेच सकेंगी। कंपनियों को नए ईको-फ्रेंडली विकल्पों की तरफ जाना होगा। FSSAI ने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड पैकेजिंग अमेंडमेंट रेगुलेशन 2026 को नोटिफाई कर दिया है। ये नए नियम तुरंत लागू हो गए हैं। 9 सवालों के जवाब में समझते हैं नए नियम क्या हैं, कंपनियों को क्या बदलाव करने होंगे और आम ग्राहकों पर क्या असर होगा… सवाल 1: FSSAI ने क्या नियम लागू किए हैं? जवाब: FSSAI ने पान मसाला की पैकेजिंग में किसी भी तरह के प्लास्टिक, पॉलीथीन, PVC, पॉलिस्टर या सिंथेटिक पॉलीमर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। सवाल 2: प्लास्टिक-एल्युमिनियम फॉयल पैकेजिंग बैन क्यों की गई? जवाब: मुख्य वजह पर्यावरण सुरक्षा है। प्लास्टिक और एल्युमिनियम फॉयल वाले पाउच सालों तक नष्ट नहीं होते और प्रदूषण बढ़ाते हैं। इस नियम का मकसद पान मसाला की पैकेजिंग को पूरी तरह प्लास्टिक फ्री और इको-फ्रेंडली बनाना है। यह फैसला पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के 'प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016' के प्रावधानों के तहत लिया गया है। सवाल 3: अब कंपनियां पैकेजिंग के लिए क्या इस्तेमाल करेंगी? जवाब: पान मसाला बनाने वाली कंपनियां अब सिर्फ प्लास्टिक-मुक्त पेपर, पेपरबोर्ड, सेल्यूलोज या अन्य प्राकृतिक रूप से मिलने वाले मटेरियल का उपयोग कर सकेंगी। FSSAI ने टिन के डिब्बे या कांच के कंटेनर्स को भी पैकेजिंग के लिए मंजूरी दी है। सवाल 4: क्या कंपनी बाहर कागज और अंदर प्लास्टिक या चमकीली पन्नी लगा सकती है? जवाब: नहीं। FSSAI ने इस पर साफ तौर पर रोक लगाई है। अगर कोई कंपनी नियमों से बचने के लिए बाहर से कागज का कवर लगाती है, लेकिन पाउच के अंदर नमी रोकने के लिए प्लास्टिक या एल्युमिनियम का इस्तेमाल करती है तो उसे गैरकानूनी माना जाएगा। पैकेजिंग अंदर और बाहर, दोनों तरफ से पूरी तरह प्लास्टिक-फ्री होनी चाहिए। सवाल 5: क्या इस तरह का बदलाव पहली बार हुआ है? जवाब: हां, पैकेजिंग के नियमों को लेकर यह एक बड़ा बदलाव है। 2018 के 'खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) नियमों' में संशोधन किया गया है। अब पान मसाला को 'शेड्यूल 4' के तहत एक नई एंट्री के रूप में शामिल किया गया है। इसमें सरकार उन सामानों की लिस्ट रखती है, जिनके लिए पैकेजिंग मटेरियल के खास नियम और सुझाव तय किए जाते हैं। सवाल 6: क्या पान मसाला या गुटखा बेचने पर भी प्रतिबंध लगा है? जवाब: नहीं, FSSAI ने स्पष्ट किया है कि यह नोटिफिकेशन खास तौर पर सिर्फ पैकेजिंग नियमों के लिए है। प्रोडक्ट के तौर पर पान मसाला की बिक्री पर कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। यह बाजार में बिकता रहेगा। सवाल 7: नियम न मानने वालीं कंपनियों पर क्या एक्शन होगा? जवाब: यदि कोई कंपनी प्लास्टिक, सिंथेटिक पॉलीमर या एल्युमिनियम लेयर वाली पैकेजिंग का इस्तेमाल जारी रखती है तो उस पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट और 'प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स' के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इसमें भारी जुर्माना लगाने से लेकर उत्पादन पर रोक और कंपनी का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। सवाल 8: क्या पान मसाला के दामों पर भी असर पड़ेगा? जवाब: हां, इसके दामों में बढ़ोतरी की संभावना है। प्लास्टिक पाउच के मुकाबले पेपर, टिन या कांच की पैकेजिंग तैयार करना कंपनियों के लिए थोड़ा महंगा होता है। जब कंपनियों की पैकेजिंग कॉस्ट यानी लागत बढ़ेगी, तो वे इसका बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं, जिससे आने वाले समय में पान मसाला के दाम बढ़ सकते हैं। सवाल 9: नए नियम कब से लागू माने जाएंगे? जवाब: 10 अगस्त 2026 को राजपत्र में प्रकाशित होने के साथ ही ये नियम लागू हो गए हैं। कंपनियों को अब तत्काल अपनी पैकेजिंग व्यवस्था बदलनी होगी। ---------------------- ये खबर भी पढ़ें… कार लोन लेते समय सिर्फ EMI न देखें:5 गलतियां बना सकती हैं आपकी नई गाड़ी महंगी; जानिए इससे बचने के तरीके कार खरीदते समय जब बात फाइनेंस और लोन की आती है, तो कई लोग जल्दबाजी में गलत फैसले ले लेते हैं। डीलर आपको एक आकर्षक मंथली किस्त यानी EMI बताता है, बैंक ब्याज दर बताता है और खरीदार का पूरा फोकस सिर्फ इस बात पर चला जाता है कि महीने की किस्त कम से कम कैसे हो। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही कम EMI आपको लंबे समय में भारी पड़ सकती है? पूरी खबर पढ़ें…
FO ट्रेडिंग में रिटेल-निवेशकों का लॉस घटकर ₹91,685 करोड़ हुआ:सेबी के सख्त नियमों का असर; हर निवेशक का औसत नुकसान बढ़कर ₹1.16 लाख पहुंचा
भारतीय शेयर बाजार के इक्विटी डेरिवेटिव्स यानी FO सेगमेंट में रिटेल निवेशकों को होने वाला कुल घाटा वित्त वर्ष 2025-26 में घटकर 91,685 करोड़ रुपए पर आ गया है। वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 1.12 लाख करोड़ रुपए था। वित्त मंत्रालय ने 11 अगस्त को संसद को यह अहम जानकारी दी है। मार्केट रेगुलेटर सेबी की ओर से FO सेगमेंट में जोखिम कम करने के लिए उठाए गए कई कड़े और नए कदमों के बाद रिटेल निवेशकों के घाटे में यह गिरावट दर्ज की गई है। ट्रेडिंग करने वाले निवेशकों की संख्या घटी, प्रति व्यक्ति एवरेज नुकसान बढ़ा सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, सेबी के नए नियमों का बाजार पर सीधा असर दिखा। इक्विटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में ट्रेडिंग करने वाले यूनिक इंडिविजुअल इन्वेस्टर्स की संख्या वित्त वर्ष 2024-25 में 98.10 लाख थी, जो 2025-26 में घटकर 78.60 लाख रह गई। हालांकि, कम निवेशकों के बाद भी प्रति व्यक्ति औसत नुकसान में मामूली बढ़त देखी गई है। FY26 में FO में ट्रेड करने वाले हर व्यक्ति का औसत घाटा बढ़कर 1.16 लाख रुपए हो गया, जो FY25 में 1.14 लाख रुपए था। सेबी ने निवेशकों की सुरक्षा के लिए उठाए कड़े कदम वित्त मंत्रालय ने बताया कि सेबी ने स्टॉक मार्केट में स्थिरता लाने और आम निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए कई रेगुलेटरी और सर्विलांस उपाय लागू किए हैं। इसमें सबसे पहले प्लेटफॉर्म पर रिस्क डिस्क्लोजर को अनिवार्य किया गया। अब जब भी कोई यूजर ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर लॉग इन करता है, तो ब्रोकर को यह चेतावनी दिखाना जरूरी है कि FY22 में FO में ट्रेड करने वाले 10 में से 9 रिटेल ट्रेडर्स को नुकसान हुआ था। मई 2025 में सेबी ने लिए और भी कड़े फैसले मई 2025 में सेबी ने बाजार में जोखिम को और बेहतर ढंग से मॉनिटर करने के लिए कुछ और महत्वपूर्ण फैसले लिए। इसके तहत अलग-अलग एक्सचेंजों पर अलग-अलग डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की एक्सपायरी के दिनों को स्ट्रीमलाइन किया गया। साथ ही पोजीशन लिमिट्स के लिए उपयुक्त रिस्क मैट्रिक्स लागू किए गए, जिससे FO सेगमेंट में जोखिमों का खुलासा और उनकी निगरानी आसान हो सके। FO में STT से सरकार की कमाई बढ़कर ₹27,695 करोड़ हुई वित्त मंत्रालय ने बताया कि सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स यानी STT को एक मॉडर्न और टेक्नोलॉजी-ऑपरेटेड कलेक्शन मैकेनिज्म के रूप में तैयार किया गया है। यह टैक्स सीधे रेगुलेटेड सिक्योरिटीज मार्केट के इंफ्रास्ट्रक्चर में एम्बेडेड यानी जुड़ा होता है। इससे टैक्स चोरी और लीकेज की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो जाती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, FO ट्रेड्स पर लगने वाले STT से सरकार का रेवेन्यू वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 27,695 करोड़ रुपए हो गया। यह FY25 के 22,225 करोड़ रुपए के मुकाबले काफी ज्यादा है। अगर FY22 से तुलना करें तो उस वक्त सालाना STT कलेक्शन महज 6,634 करोड़ रुपए था। नॉलेज बॉक्स: क्या होता है फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस यानी FO? FO यानी 'फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस' शेयर बाजार का एक डेरिवेटिव सेगमेंट है। इसमें निवेशक सीधे शेयर खरीदने के बजाय किसी शेयर या इंडेक्स जैसे- निफ्टी या सेंसेक्स के भविष्य के दाम पर दांव लगाते हैं। यह काफी जोखिम भरा यानी हाई-रिस्क ट्रेडिंग मॉडल होता है, जिसमें कम समय में भारी मुनाफा या बड़ा घाटा हो सकता है। ये खबर भी पढ़ें… कार लोन लेते समय सिर्फ EMI न देखें: 5 गलतियां बना सकती हैं आपकी नई गाड़ी महंगी; जानिए इससे बचने के तरीके कार खरीदते समय जब बात फाइनेंस और लोन की आती है, तो कई लोग जल्दबाजी में गलत फैसले ले लेते हैं। डीलर आपको एक आकर्षक मंथली किस्त यानी EMI बताता है, बैंक ब्याज दर बताता है और खरीदार का पूरा फोकस सिर्फ इस बात पर चला जाता है कि महीने की किस्त कम से कम कैसे हो। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही कम EMI आपको लंबे समय में भारी पड़ सकती है? पूरी खबर पढ़ें…
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