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60 साल में पहली बार ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट के इतिहास में बना नया कीर्तिमान, भारतीय मूल के प्लेयर को मिली टीम में जगह

Nikhil Chaudhary : ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम में भारतीय मूल के 30 वर्षीय खिलाड़ी निखिल चौधरी को जगह मिली है. इसके साथ ही वो ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट के इतिहास में 60 साल के बाद जगह पाने वाले भारतीय मूल के खिलाड़ी बने हैं. इसके साथ ही वो ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम में जगह पाने वाले भारतीय मूल के पहले खिलाड़ी बन गए हैं. 

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₹370 की बिरयानी, महिला के साथ संभोग की कीमत? सोशल मीडिया के 'मजाक' के पीछे छिपी कड़वी हकीकत | 370 Biryani Controversy

एक वायरल वीडियो क्लिप ने वह कर दिखाया जो जेंडर समानता पर सालों की बातचीत, जागरूकता अभियान और सोशल मीडिया की बहसें अक्सर नहीं कर पातीं। इसने आईना दिखा दिया कि आज भी कुछ पुरुष महिला की सहमति को कितनी कम अहमियत देते हैं और हमारा समाज कितनी जल्दी ऐसी विकृत सोच का बचाव करने मैदान में उतर आता है।

हाल ही में गुरुग्राम के एक शख्स का वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। इस क्लिप में वह शख्स एक डेट पर ₹370 खर्च करने और उस निवेश पर 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' (ROI) की उम्मीद करने के बारे में बात करता है। जरा इस शब्दावली पर गौर कीजिए—निवेश पर रिटर्न! मानो उसने किसी इंसान के साथ गरिमापूर्ण वक्त बिताने के बजाय किसी शेयर बाजार में निवेश किया हो। हैरान करने वाली बात यह थी कि इस बात पर वहां मौजूद दर्शक हंसे और शो के होस्ट व कॉमेडियन प्रणीत मोरे भी खुलकर हंसे—वही प्रणीत मोरे जो बिग बॉस के मंच पर "संस्कारों" और "वैल्यूज" की बातें करते दिखे थे। आक्रोश बढ़ा, तो उस शख्स को नौकरी से निकाल दिया गया। लेकिन सवाल वही है—क्या मामला सिर्फ एक शख्स को नौकरी से निकालने भर से खत्म हो जाता है? बिल्कुल नहीं। क्योंकि समस्या कभी ₹370 की थी ही नहीं, और न ही बिरयानी की थी।
 
समस्या मजाक की नहीं, उसके पीछे की 'हक जताने की सोच' की है
यह मजाक इसलिए काम कर गया क्योंकि यह एक बेहद दकियानूसी, पुरुषसत्तात्मक और समाज में गहराई से पैठी उस धारणा पर आधारित था, जो मानती है कि महिलाओं पर खर्च किया गया पैसा एक 'इन्वेस्टमेंट' है और इसके बदले महिला के शरीर पर पुरुष का अधिकार वैध हो जाता है।

अगर हम सीधे शब्दों में कहें, तो यह 'यौन उत्पीड़न या यौन जबरदस्ती' की धमकी पर बना एक भद्दा मजाक था। जब आप इस क्लिप के लंबे वर्जन को देखते हैं, तो असलियत और भयावह हो जाती है। वह शख्स बेहद आत्मविश्वास के साथ बताता है कि कैसे वह पैसे वसूलने के लिए महिला को पार्क ले गया और उसकी सहमति के बिना उसकी लेगिंग्स के अंदर हाथ डालने की कोशिश की।

सबसे चिंताजनक पहलू: इस पूरी कहानी को सुनाते वक्त उस शख्स के चेहरे पर कोई झिझक नहीं थी। कमरे में कोई अजीब खामोशी या बेचैनी नहीं थी। किसी ने हैरानी से सांस नहीं रोकी। वहां सिर्फ ठहाके गूंज रहे थे। यह सामूहिक हंसी उस अकेले विलेन से कहीं ज्यादा खतरनाक है।
 

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कंटेंट क्रिएशन के नाम पर जवाबदेही से पल्ला झाड़ना कब तक?
अक्सर ऐसे मामलों के बाद ढाल के रूप में कुछ घिसे-पिटे जुमले उछाले जाते हैं: "यह सिर्फ एक मजाक था", "यह डार्क ह्यूमर है", "लोग आजकल ज्यादा संवेदनशील हो गए हैं।" लेकिन कोई भी वीडियो गलती से या अनजाने में 'कंटेंट' नहीं बनता। किसी ने उसे रिकॉर्ड किया, किसी ने एडिट किया, किसी ने थंबनेल लगाया और किसी ने हरी झंडी दी कि "यह मजेदार है, इसे अपलोड करो।" जब आप किसी ऐसी सोच को एयरटाइम देते हैं और उसे वायरल होने देते हैं, तो आप सिर्फ मूकदर्शक नहीं रहते; आप उस अपराध और सोच को बढ़ावा देने वाले भागीदार बन जाते हैं।

महिला और पुरुष क्रिएटर्स के लिए दोहरे मापदंड
समाज में औरतों के प्रति नफरत (Misogyny) सिर्फ पुरुषों के ठहाकों से नहीं, बल्कि हमारे दोहरे मापदंडों से भी जिंदा रहती है। जब महिला क्रिएटर्स समाज की बंदिशों या बदतमीजी के खिलाफ आवाज उठाती हैं, तो समाज उनके साथ कैसा व्यवहार करता है?

कुशा कपिला: उनके व्यक्तिगत जीवन के फैसले (तलाक) को पूरे इंटरनेट ने अपनी चर्चा का बाजार बना दिया और उन्हें बेरहमी से जज किया गया।

अपूर्वा मुखीजा: जब उन्होंने अपनी टाइमलाइन पर आने वाले भद्दे कमेंट्स का डटकर जवाब दिया, तो पुरुषों की बदतमीजी को दरकिनार कर अपूर्वा के 'गुस्से' और 'रिएक्शन' की आलोचना की जाने लगी।

महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे अपने हर शब्द, हर कपड़े और हर हाव-भाव की जिम्मेदारी लें, जबकि पुरुष क्रिएटर्स को अक्सर यह कहकर छोड़ दिया जाता है कि "यह तो बस कंटेंट है, यह उनका असली व्यक्तित्व नहीं है।" और जब भी पुरुषों के व्यवहार पर गंभीर बहस शुरू होती है, तो "सभी पुरुष ऐसे नहीं होते" (Not All Men) का नारा बुलंद करके उस विमर्श का गला घोंट दिया जाता है।

विरोध जरूरी है, लेकिन क्या यह काफी है?
इस ₹370 की बिरयानी वाले क्लिप पर पूरे इंटरनेट का गुस्सा जायज और जरूरी था। यह देखना सुखद था कि कुशा कपिला, डॉली सिंह से लेकर एल्विश यादव तक, इंटरनेट के हर कोने से लोगों ने एक सुर में माना कि यह बेहद गलत था।

लेकिन यह गुस्सा नाकाफी है। नाकाफी इसलिए, क्योंकि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है। यह उसी समाज की बानगी है जहाँ:

किसी घटना के बाद महिला से पूछा जाता है कि उसने क्या पहना था, वह कहाँ थी और किसके साथ थी; न कि अपराधी से सवाल किया जाता है।

जहाँ 'सहमति' (Consent) जैसे बुनियादी अधिकार को भी अपनी सुविधानुसार परिभाषित किया जाता है।

जहाँ आज भी वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) को कानूनी अपराध की श्रेणी में लाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाइयाँ लड़नी पड़ रही हैं।
 

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विलेन सिर्फ एक शख्स नहीं, हमारी संस्कृति है
यह मजाक चौंकाने वाला नहीं था, बल्कि यह हमारी मुख्यधारा की सोच का एक भद्दा दस्तावेज था। विलेन सिर्फ वह लड़का नहीं है जिसने यह बात कही; विलेन वह इकोसिस्टम और संस्कृति है जिसने उसे यह सिखाया कि ऐसी हरकतें 'कूल' या 'मजेदार' होती हैं। विलेन वे लोग भी हैं जो सामने बैठकर तालियां बजा रहे थे।

जब तक हम औरतों के प्रति नफरत को 'कॉमेडी', हक जताने की विकृत सोच को 'आत्मविश्वास' और उत्पीड़न को 'हंसी-मजाक' समझते रहेंगे, तब तक हम सब इस विफलता के जिम्मेदार हैं।

तो साफ है, यह मामला कभी ₹370 की बिरयानी का था ही नहीं। यह मामला एक महिला की अस्मिता और उसकी सहमति की कीमत का था। बिरयानी की कीमत तो सिर्फ ₹370 थी, लेकिन उस पर हंसे गए मजाक की कीमत हमारे समाज को बहुत भारी पड़ने वाली है।
 
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