बिहार की राजनीति में जुझारू युवा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को केवल सुलझते हुए वर्तमान का एक नेता ही नहीं, बल्कि “भविष्य की राजनीतिक धुरी” के रूप में देखने वालों की संख्या पिछले 5 वर्षों में तेजी से बढ़ती ही जा रही है और यह सिलसिला निरंतर आगे भी चलता रहेगा। ऐसा इसलिए कि उनके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कारण सक्रिय हैं, जो उन्हें राजनीतिक रूप से अजेय बनाते हैं। आइए इन्हें समझते हैं विस्तार से-
पहला, बिहार में भाजपा के भीष्म पितामह कैलाशपति मिश्रा के संजोए हुए सपनों को पूरा करते हुए पार्टी के पहले मुख्यमंत्री बनने का ऐतिहासिक महत्व है। निःसन्देह साल 2026 में सम्राट चौधरी का बिहार का मुख्यमंत्री बनना भाजपा के लिए ऐतिहासिक मोड़ माना गया, क्योंकि पहली बार बिहार में भाजपा ने मुख्यमंत्री पद अपने हाथ में लिया। इससे प्रदेशवासियों में यह संदेश गया कि भाजपा अब बिहार में “जूनियर पार्टनर” नहीं रहना चाहती बल्कि पार्टी ने बिहार में अपना सूझबूझ युक्त स्वतंत्र नेतृत्व स्थापित कर दिया।
पार्टी मामलों के जानकारों की मानें तो अब सम्राट चौधरी को केवल अंतरिम चेहरा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नेतृत्व के मोहरे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो ओबीसी सियासत के लिए सौभाग्य की बात है। चूंकि उनमें सामाजिक न्याय के सूत्रधार लालू प्रसाद वाली हाजिर जवाबी, सुशासन बाबू नीतीश कुमार वाली सियासी चतुराई के अलावा सद्भावी कैलाशपति मिश्रा वाली सूझबूझ भी भरी हुई है जिससे हरेक जाति-धर्म के लोगों में उनकी स्वीकार्यता दिनप्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।
दूसरा, सामाजिक समीकरणों में मजबूत पकड़: बिहार की राजनीति के भाजपाई नव चाणक्य सम्राट चौधरी का सबसे बड़ा राजनीतिक बल उनका व्यापक सामाजिक आधार माना जाता है। चूंकि वे पिछड़े वर्ग, विशेषकर कुशवाहा-कोइरी यानी लव कुश समाज या त्रिवेणी संघ से आते हैं, जो बिहार की राजनीति में निर्णायक प्रभाव रखता है। इससे भाजपा को लालू प्रसाद/नीतीश कुमार के सामाजिक न्याय के बीच यादव बनाम गैर-यादव ओबीसी राजनीति में बढ़त मिली ही, साथ ही ग्रामीण वोटबैंक में विस्तार आया, और मंडल राजनीति का नया जवाब देने का अवसर मिला।
चूंकि भाजपा लंबे समय से बिहार में एक ऐसा चेहरा खोज रही थी जो हिंदुत्व, ओबीसी राजनीति, और संगठनात्मक निष्ठा तीनों को एक साथ लेकर चल सके। लिहाजा सम्राट चौधरी उस समीकरण में फिट बैठते दिखे। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण, वैश्य, दलितों के साथ-साथ प्रगतिशील यादवों पर भी पूरी पकड़ है, जिसका फायदा भाजपा नीत एनडीए को बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में उन्होंने दिलवाया और पुरस्कार स्वरूप पहले गृहमंत्री, फिर मुख्यमंत्री बने।
तीसरा, व्यवहारिक आक्रामक भरा लेकिन नियंत्रित राजनीतिक शैली: राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि सम्राट चौधरी की राजनीति, तेजस्वी यादव की तरह ही पलटवारी आक्रामक, लेकिन संगठन के प्रति अनुशासित मानी जाती है। वे सड़क से लेकर सदन तक मुखर सियासी शैली अपनाते रहे हैं। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा पैदा हुई। भाजपा नेतृत्व अक्सर ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाता है जो जनसभाओं में भीड़ खींच सकें, विपक्ष पर हमला कर सकें, और संगठन के प्रति पूर्ण निष्ठावान रहें। ये सभी गुण सम्राट चौधरी में कूट कूट कर भरे हुए हैं। इसलिए उनका सियासी उदय पूर्वी भारत की राजनीति में अहम मायने रखती है।
चौथा, दिल्ली नेतृत्व का भरोसा: भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की राजनीति में “विश्वसनीय नेतृत्व” बहुत महत्व रखता है। चूंकि सम्राट चौधरी इन कसौटियों पर भी खरे उतरते हैं, इसलिए उनपर सबका भरोसा बढ़ा है। वाकई सम्राट चौधरी जमीनी संगठन से निकले नेता हैं, जो भाजपा की स्थापित लाइन से थोड़ा-सा भी विचलित नहीं होते, और गठबंधन राजनीति को भी संभालने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन के समय उनके नाम पर सहमति बनी। इससे भाजपा की सूबाई राजनीति को एक नई धार मिली है।
पांचवां, सूबाई चाणक्य नीतीश युग के बाद की राजनीति का केंद्र बना सम्राट युग: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक दौर के बाद बिहार में नेतृत्व का संक्रमण होना तय माना जा रहा था। ऐसे विचित्र समय में भी भाजपा ने युवा, ओबीसी, और आक्रामक राजनीतिक छवि वाले नेता के रूप में सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाकर भविष्य की राजनीति का संकेत दे दिया है। इसका उद्देश्य केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि अगले 10–15 वर्षों का राष्ट्रवादी राजनीतिक आधार तैयार करना भी माना जा रहा है। पार्टी की इस रणनीति को अमलीजामा पहनाने के प्रति सम्राट चौधरी ने भी प्रतिबद्धता दिखाई है।
छठा, सत्ताप्रतिष्ठान की राह में चुनौतियाँ भी कम नहीं: हालाँकि सम्राट चौधरी के सामने कतिपय बड़ी चुनौतियाँ हैं, जिसमें बेरोजगारी, पलायन, कानून व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य, जातीय संतुलन, और गठबंधन राजनीति के प्रबंधन में सम्राट चौधरी निरंतर सधी चाल चल रहे हैं और अहम फैसले ले रहे हैं। इससे बिहार वासियों के दिलोदिमाग पर सकारात्मक असर पड़ा है। भले ही सियासी ईर्ष्यावश विपक्ष लगातार उनकी सरकार को अपराध और प्रशासनिक मुद्दों पर घेर रहा है। लेकिन सम्राट चौधरी लगातार विकास,
रोजगार, और प्रशासनिक सुधार पर ठोस परिणाम देते ।नजर आते हैं, इसलिए सूबे में “भविष्य के नेता” वाली उनकी छवि स्थायी बनती जा रही है।
सातवां, बिहार की नई राजनीतिक कथा के अहम सूत्रधार और नेतृत्वकर्ता: सम्राट चौधरी का उदय केवल व्यक्ति विशेष का उत्थान नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में तीन बड़े परिवर्तनों का संकेत माना जा रहा है: पहला, भाजपा का स्वतंत्र प्रभुत्व, दूसरा, ओबीसी नेतृत्व का नया संस्करण, और तीसरा, पोस्ट-नीतीश युग की शुरुआत। चूंकि इस नई राजनीतिक कथा के अहम सूत्रधार और नेतृत्वकर्ता खुद सम्राट चौधरी ही हैं, इसीलिए समर्थक उन्हें “बिहार का वर्तमान और भविष्य” दोनों कह रहे हैं। उनकी तमाम कोशिशें भी इसी ओर इंगित करती दिखाई देती हैं। इसलिए हर ओर उल्लास की स्थिति देखी जा रही है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत सरकार ने सोना, चांदी और प्लैटिनम के आयात पर सीमा शुल्क में भारी बढ़ोतरी कर दी है जिससे इनकी कीमत में जबरदस्त उछाल आ गया है। शादियों के सीजन में सोने, चांदी के भाव में इस तेजी ने कई परिवारों की चिंता बढ़ा दी है लेकिन सरकार का कहना है कि यह कदम बेहद जरूरी हो गया था। हम आपको बता दें कि मोदी सरकार ने सोना और चांदी पर प्रभावी आयात शुल्क छह प्रतिशत से बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत कर दिया है, जबकि प्लैटिनम पर यह शुल्क छह दशमलव चार प्रतिशत से बढ़ाकर पंद्रह दशमलव चार प्रतिशत कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि यह कदम विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा, चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने और गैर जरूरी आयातों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
नई व्यवस्था के तहत सरकार ने सोना और चांदी के आयात पर दस प्रतिशत मूल सीमा शुल्क तथा पांच प्रतिशत कृषि अवसंरचना और विकास उपकर लगाया है, जिससे कुल प्रभावी कर पंद्रह प्रतिशत हो गया है। इसके साथ ही सोना और चांदी के डोरे, सिक्कों तथा अन्य संबंधित उत्पादों पर भी शुल्क बढ़ाया गया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार मौजूदा भू राजनीतिक परिस्थितियों और पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चे तेल के वैश्विक बाजार तथा समुद्री आपूर्ति मार्गों में भारी अस्थिरता पैदा हुई है। हम आपको बता दें कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है, इसलिए ऊंची तेल कीमतों और आपूर्ति बाधाओं से देश के आयात बिल, महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है।
मोदी सरकार का कहना है कि ऐसे समय में विदेशी मुद्रा संसाधनों को आवश्यक क्षेत्रों के लिए सुरक्षित रखना जरूरी हो जाता है। दरअसल, विदेशी मुद्रा का उपयोग कच्चे तेल, उर्वरक, औद्योगिक कच्चे माल, रक्षा जरूरतों, महत्वपूर्ण तकनीक और पूंजीगत वस्तुओं जैसे जरूरी आयातों के लिए प्राथमिकता से किया जाना चाहिए, क्योंकि ये देश की अर्थव्यवस्था, विनिर्माण, निर्यात, आधारभूत ढांचे और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़े हैं। इसके विपरीत सोना और चांदी जैसे बहुमूल्य धातुओं का आयात मुख्य रूप से उपभोग और निवेश आधारित माना जाता है, जिससे विदेशी मुद्रा का भारी बहिर्गमन होता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने की अपील की है ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम किया जा सके। हम आपको बता दें कि भारत अपनी आवश्यकता का लगभग पूरा सोना आयात करता है। पिछले कुछ महीनों में शेयर बाजार से कमजोर प्रतिफल और बुलियन कीमतों में तेजी के कारण निवेश के रूप में सोने की मांग तेजी से बढ़ी है। विश्व स्वर्ण परिषद के आंकड़ों के अनुसार मार्च तिमाही में भारत के स्वर्ण विनिमय कारोबार कोषों में निवेश सालाना आधार पर एक सौ छियासी प्रतिशत बढ़कर बीस मीट्रिक टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
देखा जाये तो मोदी सरकार के इस फैसले के पीछे केवल बहुमूल्य धातुओं के आयात को नियंत्रित करना ही नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ते आयात बिल और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को कम करना भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण कच्चे तेल और उर्वरकों के आयात खर्च में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे देश के भुगतान संतुलन और चालू खाते के घाटे पर गंभीर दबाव बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि आयात शुल्क बढ़ने से अल्पकाल में चालू खाते के घाटे और रुपये पर दबाव कम हो सकता है, लेकिन घरेलू बाजार में सोना और चांदी और महंगे हो सकते हैं तथा तस्करी का खतरा फिर बढ़ सकता है।
हम आपको याद दिला दें कि सरकार ने इससे पहले भी सोना और चांदी के आयात पर तीन प्रतिशत एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर लगाया था, जिसके बाद बैंकों ने एक महीने से अधिक समय तक आयात रोक दिया था। परिणामस्वरूप अप्रैल महीने में सोने का आयात लगभग तीस वर्षों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। बाद में बैंक कर भुगतान के बाद आयात फिर शुरू कर पाए, लेकिन अब नई शुल्क बढ़ोतरी के बाद व्यापारियों का मानना है कि आयात में फिर भारी गिरावट आ सकती है।
इसलिए उद्योग जगत ने सरकार के इस कदम पर चिंता जताई है। अखिल भारतीय रत्न एवं आभूषण परिषद के अध्यक्ष राजेश रोकडे ने कहा कि बढ़े हुए शुल्क और प्रधानमंत्री की मितव्ययिता अपील के कारण कारोबार कठिन दौर में पहुंच सकता है। उनका कहना है कि इससे अवैध बाजार और तस्करी को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी होने का खतरा है। परिषद के अनुसार अब सीमा शुल्क, वस्तु एवं सेवा कर तथा कृषि उपकर को मिलाकर सोना प्रति दस ग्राम लगभग सत्ताईस हजार रुपये तक महंगा हो सकता है, जबकि पहले यह बढ़ोतरी लगभग तेरह हजार पांच सौ रुपये थी। इस मुद्दे पर आगे की रणनीति तय करने के लिए उद्योग संगठनों की बैठक मुंबई में बुलाई गई है।
सेंको गोल्ड एंड डायमंड्स के प्रबंध निदेशक सुवंकर सेन का कहना है कि जब तक पश्चिम एशिया संकट और ऊंची तेल कीमतों की स्थिति बनी रहेगी, तब तक आयात शुल्क ऊंचे स्तर पर रह सकते हैं। उनके अनुसार इस कदम से सोने की मांग में दस से पंद्रह प्रतिशत तक कमी आ सकती है और उपभोक्ता हल्के वजन के आभूषणों की ओर रुख कर सकते हैं।
वहीं सरकार का तर्क है कि सीमा शुल्क में यह बढ़ोतरी उपभोक्ता विरोधी नहीं बल्कि संतुलित और सावधानीपूर्वक उठाया गया कदम है, जिसका उद्देश्य गैर जरूरी आयातों को नियंत्रित करना और देश की व्यापक आर्थिक स्थिरता को सुरक्षित रखना है। सूत्रों के अनुसार अतीत में भी वैश्विक अस्थिरता के समय सीमा शुल्क का उपयोग आर्थिक संतुलन बनाए रखने के साधन के रूप में किया जाता रहा है। वर्ष 2024-25 के केंद्रीय बजट में जब बाहरी आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत थी, तब सरकार ने सोना और चांदी पर शुल्क पंद्रह प्रतिशत से घटाकर छह प्रतिशत तथा प्लैटिनम पर शुल्क पंद्रह दशमलव चार प्रतिशत से घटाकर छह दशमलव चार प्रतिशत कर दिया था।
हम आपको यह भी बता दें कि पहले के दौर में भी स्वर्ण नियंत्रण संबंधी कठोर नियम लागू किए गए थे। तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने 1962 में स्वर्ण नियंत्रण उपाय लागू किए थे, जिनके तहत सोने पर अग्रिम कारोबार पर रोक लगाई गई और बैंकों द्वारा दिए गए स्वर्ण ऋण वापस लिए गए। बाद में 1963 में चौदह कैरेट से अधिक शुद्धता वाले आभूषणों के निर्माण पर रोक लगा दी गई और 1968 में कडा स्वर्ण नियंत्रण कानून लागू किया गया था।
-नीरज कुमार दुबे
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