Congress ने Caste Census पर केंद्र को घेरा, Jairam Ramesh बोले- मंशा संदेहास्पद
कांग्रेस ने जाति जनगणना के मुद्दे पर शुक्रवार को केंद्र सरकार पर निशाना साधा और कहा कि जातियों की सूची उपलब्ध नहीं कराए जाने और उत्तरदाताओं द्वारा बताए गए जवाब को उसी रूप में दर्ज किए जाने की व्यवस्था से सरकार की मंशा पर गंभीर संदेह पैदा होता है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह भी कहा कि इस पूरे मामले में राजनीतिक दलों के साथ कोई चर्चा नहीं की गई। उनका कहना था कि यह उम्मीद की जा रही थी कि जाति संबंधी सवाल बिहार और तेलंगाना में किए गए जाति सर्वेक्षणों की तरह राज्यवार पहले से तैयार सूची के साथ पूछा जाएगा और उत्तर के अनुरूप उचित विकल्प पर केवल निशान लगाया जाएगा।
रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘‘दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ है, जिससे मंशा पर गंभीर संदेह पैदा होता है।’’ उन्होंने ‘एक्स’ पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा 5 मई, 2025 को जाति जनगणना के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखे पत्र को भी साझा किया। रमेश ने कहा, ‘‘यह पांच मई, 2025 को जाति जनगणना के संबंध में प्रधानमंत्री को लिखा गया कांग्रेस अध्यक्ष का पत्र था। उनके सबसे पहले और बुनियादी सुझाव को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है।
साथ ही, खरगे जी की मांग के अनुसार राजनीतिक दलों के साथ भी कोई चर्चा नहीं की गई है।’’ केंद्र ने शुक्रवार को जनसंख्या गणना के चरण के तहत उत्तरदाताओं से पूछे जाने वाले 40 सवालों को अधिसूचित किया। इनमें जाति और कोविड टीकाकरण की जगह से संबंधित सवाल भी शामिल हैं। इस महीने की शुरुआत में जारी राजपत्र अधिसूचना के अनुसार, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के बर्फ से ढके क्षेत्रों में जनसंख्या गणना एक से 30 सितंबर तक होगी।
इसमें कहा गया है, ‘‘उपरोक्त जनगणना के संचालन के लिए घर-घर जनसंख्या गणना शुरू होने से ठीक पहले 17 से 31 अगस्त तक स्व-गणना का विकल्प उपलब्ध होगा।’’ देश के बाकी हिस्सों में जनसंख्या गणना अगले साल शुरू होगी। यह पहली बार होगा जब जनगणना के तहत जाति संबंधी विवरण एकत्र किए जाएंगे। सूत्रों ने बताया कि प्रश्नावली में जातियों की सूची दिए जाने की संभावना नहीं है और उत्तरदाताओं द्वारा बताए गए जवाब को उसी रूप में दर्ज किया जाएगा।
जाति जनगणना का निर्णय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने पिछले साल 30 अप्रैल को लिया था।
Supreme Court ने Karur भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के आदेश पर रोक लगाई
उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल करूर में हुई भगदड़ में मारे गए लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने संबंधी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के आदेश को रद्द करने वाले मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले पर शुक्रवार को रोक लगा दी। मुख्यमंत्री विजय ने 10 जुलाई को उन 31 लोगों को नियुक्ति पत्र दिए थे, जिनके परिजनों की 27 सितंबर 2025 को करूर में हुई भगदड़ में मौत हो गई थी। विजय की रैली के दौरान हुई इस भगदड़ में 41 लोगों की मौत हो गई थी और 60 से अधिक लोग घायल हुए थे।
न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सरकारी आदेश को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं तथा अन्य को नोटिस जारी किया। पीठ ने राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता से कहा, ‘‘आप सरकार की नीति पर सवाल उठाने वाले कौन होते हैं? मान लीजिए कि इस त्रासदी में किसी परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की मौत हो गई तो क्या सरकार को उसके बेटे या बेटी को रोजगार नहीं देना चाहिए?’’ मद्रास उच्च न्यायालय ने 27 जुलाई को विजय का वह आदेश रद्द कर दिया था, जिसमें पिछले साल करूर में हुई भगदड़ में मारे गए लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का प्रावधान किया गया था।
उच्च न्यायालय ने कहा था कि इससे ऐसी मांगों की बाढ़ आ जाएगी। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सी. वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने कहा था कि सरकारी विभागों में अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का इंतजार कर रहे कई लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज करना उचित नहीं है। उच्च न्यायालय ने कहा था कि कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल संवैधानिक सीमाओं के भीतर किया जाना चाहिए।
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