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Uncovered With Manoj Gairola: 1962 नहीं 1959 में भारत और चीन के बीच चली थी पहली गोली, अरुणाचल प्रदेश में ‘ड्रैगन’ के घुसपैठ की कहानी

Uncovered With Manoj Gairola: क्या आप जानते हैं...भारत और चीन के बीच पहली गोली कब और कहां चली थी? आप सोच रहे होंगे 1962 की जंग में, लेकिन नहीं, पहली गोली 25 अगस्त 1959 में चली थी और जगह थी अरुणाचल प्रदेश. जिसे उस वक्त NEFA कहते थे. जहां ये पहली गोली चली थी, उसी इलाके में चीनी फौज के फिर से घुसपैठ करने की खबर है. अरुणाचल की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी पीपीए ने दावा किया है कि चीन ने भारतीय फौजियों की पेट्रोलिंग को ब्लॉक कर दिया है. यहां तक कि स्थानीय लोगों को भी उस इलाके में जानवरों को चराने से रोक दिया है. सोशल मीडिया पर भी वहां के लोग चीनी घुसपैठ की बात कर रहे हैं.

अनकवर्ड के आज के एपिसोड में- भारत और चीन के बीच तनाव की के सेंटर अरुणाचल प्रदेश की. अरुणाचल को लेकर एक साथ दो घटनाएं हुई हैं. एक तरफ तो अरुणाचल में चीनी घुसपैठ और दूसरी तरफ कुछ जगहों के नामकरण को लेकर भारत और चीन के बीच Diplomatic Tension. खास बात ये है कि ये सब तब हो रहा है, जब अगले महीने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत आने की संभावना है.

1962 में असम का हिस्सा था अरुणाचल

भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है. इस बॉर्डर के पूर्वोत्तर पर भारत का राज्य है- अरुणाचल प्रदेश. चीन अक्सर इस पर अपना दावा पेश करता रहता है. यहां तक की 1962 की जंग में तो चीन ने इसका अधिकांश हिस्सा अपने कब्जे में भी ले लिया था. तब अरुणाचल को NEFA कहते थे और ये असम राज्य का हिस्सा था. जंग खत्म होने के बाद चीन अपने इलाके में वापस लौट गया. लेकिन इस जंग से पहले 1959 में चीन ने NEFA के अपर सुबनसिरी जिले के लोंगजू इलाके में हमला करके जो जगह कब्जे में ली थी, उसे आज तक नहीं छोड़ा.

अब जिस इलाके से चीनी घुसपैठ की खबर आ रही है, वह इसी अपर सुवनसिरी जिले में है, ये इलाका है ताक्सिंग. यह भारत का अंतिम सीमावर्ती गांव है. अब वाकई घुसपैठ हुई है या नहीं. और अगर हुई है तो कहां तक हुई है.  इसका जवाब या तो सरकार दे सकती है या फिर सेना. लेकिन इससे पहले ये जानना जरूरी है कि आखिर अरुणाचल पर चीन की बुरी नजर क्यों टिकी हुई है? क्यों भारत और चीन के बीच सबसे पहला झगड़ा अरुणाचल में ही हुआ था.

भारत चीन की 3,488 किमी. लंबी सीमारेखा में से करीब 1,200 किमी की सीमा अरुणाचल प्रदेश से लगती है. दरअसल, ये सीमा चीन से नहीं बल्कि तिब्बत से लगती है, जो कभी एक आजाद मुल्क हुआ करता था. 1914 में ब्रिटिश राज के दौरान शिमला में एक समझौता हुआ. इसके तहत भारत और तिब्बत के बीच की सीमा तय की गई. इसे मैकमोहन लाइन कहते हैं. अरुणाचल प्रदेश का पूरा इलाका भारत में माना गया. इसमें कुछ जगह ऐसी हैं जहां की संस्कृति और धर्म दोनों तिब्बत से मिलते हैं. जैसे कि तवांग. तवांग वो जगह है जहां 1683 में तिब्बत के सबसे बड़े धर्म गुरु, छठे दलाई लामा त्सांगयांग ग्यात्सो पैदा हुए थे. तिब्बतियों के बीच ल्हासा के बाद सबसे ज़्यादा महत्व तवांग मॉनेस्ट्री का ही है.

1947 में भारत आजाद हुआ और मैकमोहन लाइन को ही भारत और तिब्बत के बीच की सीमा माना गया. 1950 के दशक में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया. और वो भारत का पड़ोसी बन गया. उसने मैकमोहन लाइन को मानने से इनकार कर दिया. चीन का दावा है कि अरुणाचल प्रदेश, और खासतौर से तवांग, तिब्बत का दक्षिणी भाग हैं. और इस पर उसका अधिकार है.

दलाई लामा के भारत आने से चीन नाराज

चीन के तिब्बत पर अक्रमण के दौरान वहाँ के धर्म गुरु - 14वें दलाई लामा - भागकर सबसे पहले तवांग ही आए थे. वो तारीख थी 31 मार्च 19 सौ उनसठ.  इसके कुछ ही महीने बाद भारत औऱ चीन के बीच पहली बार गोली चली थी. यानी दलाई लामा के भारत आने से चीन इतना नाराज था, कि उसने हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे को किनारे करके सीधे गोली की बोली बोलना शुरू कर दिया. बात आगे बढ़ी तो 1962 का युद्ध भी हुआ. ईस्टर्न सेक्टर में चीनी फौज लगभग पूरा अरुणाचल जीतकर असम के मैदानों तक पहुंच गई थी. लेकिन फिर अचानक से चीन ने खुद ही सीजफायर का ऐलान किया. और फौज वापस बुला ली.

चीन ने फौज वापस क्यों बुलाई और 1962 की जंग में भारत से कहां गलतियां हुईं. इसके बारे में किसी और एपिसोड में विस्तार से बात करेंगे. फिलहाल इतना समझते हैं कि 1962 के बाद भी चीन की निगाहे अरुणाचल पर टिकी रही. 1975 में तवांग के तुलुंग ला में चीनी सैनिकों ने बॉर्डर क्रॉस कर घात लगाकर भारत के फौजियों पर हमला किया. इस हमले में 4 सैनिक शहीद हुए.

कम समय में भारी संख्या में तैनात इंडियन आर्मी

इसके बाद 1986 और 87 में तवांग की समदोरोंग चू घाटी में चीनी सैनिकों ने घुसपैठ करके पक्के बंकर और तंबू लगा दिए. जवाब में इंडियन आर्मी ने 'ऑपरेशन फाल्कन' चलाया और बेहद कम समय में भारी संख्या में फौज तैनात कर दी. कई महीनों तक दोनों देशों की फौज आमने-सामने रहीं. बाद में चीन को वापस लौटना पड़ा. इसके अलावा 2022 में भी चीनी फौज ने तवांग सेक्टर के यांगत्से में घुसपैठ की कोशिश की. भारतीय जवानों ने चीनी सेना का डटकर मुकाबला किया और उन्हें वापस जाने पर मजबूर किया. इस आमने-सामने की लड़ाई में कटीले डंडों का इस्तेमाल हुआ था, जिसमें दोनों पक्षों के कई सैनिक घायल हुए थे.

 चीन से जुड़ा रोचक तथ्य

अब आपको एक और इंट्रस्टिंग बात बताते हैं. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो बार भारत आए हैं. 2014 में जब वो भारत आए थे, तब उनके आने से पहले ही उनकी फौज ने लद्दाख में घुसपैठ कर दी थी. इसी तरह 2019 में जब वो भारत यात्रा पर आए थे, तब उनके जाने के बाद गलवान में घुसपैठ की गई थी. अगले महीने ब्रिक्स की मीटिंग में उनके भारत आने की बात कही जा रही है. और उससे पहले ही अरुणाचल में घुसपैठ की खबर आ गई है. अब ये शी जिनपिंग का स्टाइल है या इत्तफाक, ये तो नहीं कहा जा सकता. लेकिन इतना जरूर है कि 1962 के बाद, जब-जब चीन ने भारत की सीमा में घुसपैठ की कोशिश की, तब-तब उसे जवाब दिया गया. और अगर इस बार भी घुसपैठ हुई है, तो उम्मीद है कि इस बार भी उसे जवाब मिलेगा. 

 

 

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छतरपुर में ई-अटेंडेंस बनी शिक्षकों की मुसीबत, नेटवर्क के लिए स्कूल की छत पर चढ़ना पड़ा

छतरपुर जिले के ग्रामीण इलाके से ई-अटेंडेंस व्यवस्था को लेकर एक ऐसा वीडियो सामने आया है, जिसने ऑनलाइन हाजिरी की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

वायरल वीडियो में एक शिक्षक मोबाइल नेटवर्क तलाशने के लिए स्कूल की छत पर खड़े नजर आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि शिक्षक को ई-अटेंडेंस दर्ज करने के लिए बेहतर नेटवर्क की जरूरत थी, लेकिन स्कूल परिसर में मोबाइल सिग्नल नहीं मिलने के कारण उन्हें छत पर जाना पड़ा।

छतरपुर में ई-अटेंडेंस के लिए छत पर चढ़े शिक्षक

छतरपुर के ग्रामीण इलाके में सामने आया वायरल वीडियो ई-अटेंडेंस व्यवस्था की जमीनी परेशानी को दिखाता है। वीडियो में शिक्षक स्कूल की छत पर खड़े होकर मोबाइल फोन में नेटवर्क तलाशते दिखाई दे रहे हैं। उनका उद्देश्य किसी मनोरंजन या निजी काम के लिए छत पर जाना नहीं था, बल्कि ऑनलाइन हाजिरी दर्ज करना बताया जा रहा है।

ग्रामीण स्कूलों में मोबाइल नेटवर्क हर जगह एक जैसा नहीं मिलता। कई इलाकों में कभी सिग्नल कमजोर रहता है तो कभी इंटरनेट की स्पीड इतनी कम होती है कि ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी करने में काफी समय लग जाता है। ऐसी स्थिति में शिक्षक को स्कूल के अंदर से बाहर, खुले स्थान या ऊंची जगह पर जाकर नेटवर्क तलाशना पड़ सकता है।

मोबाइल नेटवर्क की समस्या बनी सबसे बड़ी परेशानी

ई-अटेंडेंस का उद्देश्य शिक्षकों की उपस्थिति को ऑनलाइन दर्ज करना और पूरी प्रक्रिया को आसान व पारदर्शी बनाना है। लेकिन ऑनलाइन व्यवस्था तभी ठीक तरह से काम कर सकती है, जब संबंधित जगह पर मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध हो।

शहरी क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क आमतौर पर आसानी से मिल जाता है। लेकिन ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्थिति अलग हो सकती है। कई स्कूल ऐसे क्षेत्रों में हैं जहां नेटवर्क कमजोर रहता है। कुछ जगहों पर मोबाइल फोन को एक खास स्थान पर रखने या खुले इलाके में जाने पर ही सिग्नल मिलता है।

समय पर हाजिरी नहीं लगी तो वेतन कटने की चिंता

शिक्षकों की सबसे बड़ी चिंता केवल नेटवर्क नहीं, बल्कि उसके कारण होने वाला संभावित नुकसान है। शिक्षकों के अनुसार अगर नेटवर्क की वजह से समय पर ई-अटेंडेंस दर्ज नहीं हो पाती है तो वेतन कटने जैसी परेशानी सामने आ सकती है।

किसी शिक्षक के लिए कुछ मिनट की नेटवर्क समस्या और उसकी हाजिरी के रिकॉर्ड में अंतर काफी गंभीर हो सकता है। अगर शिक्षक समय पर स्कूल पहुंच चुका है, लेकिन मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण ऑनलाइन सिस्टम में उपस्थिति दर्ज नहीं कर पा रहा, तो ऐसी स्थिति में उसकी वास्तविक मौजूदगी और डिजिटल रिकॉर्ड अलग हो सकते हैं।

सुबोध त्रिपाठी की रिपोर्ट

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Sun, 16 Aug 2026 00:40:00

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