तिरंगे से लेकर अशोकचक्र तक, 15 अगस्त पर रचाएं ये यूनिक देशभक्ति मेहंदी
Independence day Mehndi: 15 अगस्त पर ट्राई करें ये यूनिक देशभक्ति मेहंदी डिजाइन! तिरंगा, अशोक चक्र और जय हिंद से सजाएं हाथ। देखें स्वतंत्रता दिवस 2026 के लिए ट्रेंडी, सिंपल, मिनिमल और फुल हैंड मेहंदी डिजाइन, जो हर लुक में लगाएंगे देशभक्ति का रंग।
Independence Day Special: कभी इंकलाब, कभी वतन की मोहब्बत... इन उर्दू अल्फ़ाज़ों में आज भी जिंदा है आजादी का जज्बा
Independence Day Special Poems: 15 खास दिन पर साहित्य की वे रचनाएं भी याद आती हैं, जिन्होंने वतन से मोहब्बत, आजादी की चाह और एकता की आवाज को शब्दों में पिरोया। उर्दू शायरी और नज्मों की दुनिया में ऐसी कई रचनाएं हैं, जिनमें कभी आजादी के लिए उठती आवाज सुनाई देती है तो कभी शहीदों की कुर्बानी और बेहतर कल का सपना नजर आता है।
दशकों बाद भी इन रचनाओं का असर कम नहीं हुआ है। इनके शब्द आज भी देशप्रेम की वही गर्माहट और आजादी की कीमत का एहसास दिलाते हैं।
1. सरफरोशी की तमन्ना – बिस्मिल अजीमाबादी
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार
ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है
वाए क़िस्मत पाँव की ऐ ज़ोफ़ कुछ चलती नहीं
कारवाँ अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है
शौक़ से राह-ए-मोहब्बत की मुसीबत झेल ले
इक ख़ुशी का राज़ पिन्हाँ जादा-ए-मंज़िल में है
2. वतन के जांनिसार – जाफर मलीहाबादी
वतन के जाँ-निसार हैं वतन के काम आएँगे
हम इस ज़मीं को एक रोज़ आसमाँ बनाएँगे
दिलों में हुब्ब-ए-वतन है अगर तो एक रहो
निखारना ये चमन है अगर तो एक रहो
ऐ अहल-ए-वतन शाम-ओ-सहर जागते रहना
अग़्यार हैं आमादा-ए-शर जागते रहना
बनाना है हमें अब अपने हाथों अपनी क़िस्मत को
हमें अपने वतन का आप बेड़ा पार करना है
3. लहू वतन के शहीदों का – फिराक गोरखपुरी
लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है
उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी
मिरी सदा है गुल-ए-शम्-ए-शाम-ए-आज़ादी
सुना रहा हूँ दिलों को पयाम आज़ादी
लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है
उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी
मुझे बक़ा की ज़रूरत नहीं कि फ़ानी हूँ
मिरी फ़ना से है पैदा दवाम-ए-आज़ादी
जो राज करते हैं जम्हूरियत के पर्दे में
उन्हें भी है सर-ओ-सौदा-ए-ख़ाम-ए-आज़ादी
बनाएँगे नई दुनिया किसान और मज़दूर
यही सजाएँगे दीवान-ए-आम-ए-आज़ादी
4. ऐ सुबह-ए-वतन – सागर निजामी
ऐ सुब्ह-ए-वतन ऐ सुब्ह-ए-वतन
ऐ रूह-ए-बहार ऐ जान-ए-चमन
ऐ मुतरिब या ऐ साक़ी-ए-मन
ऐ सुब्ह-ए-वतन ऐ सुब्ह-ए-वतन
ले जोश-ए-जुनूँ की ज़र्बों ने ज़ंजीर-ए-ग़ुलामी तोड़ ही दी
जम्हूर के संगीं पंजे ने शाही की कलाई मोड़ ही दी
तारीख़ के ख़ूनीं हाथों से छीना है तिरा सीमीं दामन
ऐ सुब्ह-ए-वतन ऐ सुब्ह-ए-वतन
फिर लौट के आया सदियों में इक़बाल-ओ-तरब का सय्यारा
किरनों में उफ़ुक़ पर फिर चमका पस्ती के अँधेरों का मारा
हैराँ हैराँ नाज़ाँ नाज़ाँ ख़ंदाँ ख़ंदाँ रौशन रौशन
ऐ सुब्ह-ए-वतन ऐ सुब्ह-ए-वतन
इन कविताओं की खासियत सिर्फ इनके शब्दों में नहीं, बल्कि उन भावनाओं में है जो समय बीतने के बाद भी प्रासंगिक हैं। वतन से मोहब्बत, आजादी की कीमत, शहीदों का सम्मान, एकता और बेहतर भविष्य की उम्मीद - ये सभी भाव आज भी लोगों को जोड़ते हैं।
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