Responsive Scrollable Menu

IND VS SL: श्रीलंका दौरे पर शुभमन गिल के निशाने पर 3 माइलस्टोन, जिसे हासिल कर एलीट लिस्ट में शामिल होंगे कप्तान

IND VS SL: क्रिकेट फैंस का इंतजार खत्म होने वाला है, क्योंकि अब भारत-श्रीलंका के बीच टेस्ट सीरीज शुरू होने में 24 घंटे का समय ही बचा है. दोनों टीमें इस सीरीज में बाजी मारने की तैयारी कर रही हैं. 15 अगस्त से सीरीज का पहला मुकाबला गॉल इंटरनेशनल स्टेडियम में खेला जाएगा, जिसपर सभी की नजरें टिकी होंगी. श्रीलंका के साथ खेली जाने वाली 2 मैचों की ये टेस्ट सीरीज वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के लिहाज से भारतीय टीम के लिए काफी अहम होने वाली है. वहीं, भारतीय कप्तान शुभमन गिल के पास भी इस सीरीज में 3 बड़े माइलस्टोन हासिल करने का मौका है. तो आइए इस आर्टिकल में आपको बताते हैं कि आखिर वो 3 बड़े माइलस्टोन कौन-कौन से हैं.

31 रन बनाते ही शुभमन गिल पूरे करेंगे 3000 टेस्ट रन

भारतीय कप्तान शुभमन गिल के पास श्रीलंका दौरे पर 3000 टेस्ट रन पूरे करने का बेहतरीन मौका है. गिल ने अब तक 41 टेस्ट मैच खेले हैं, जिसकी 74 पारियों में उन्होंने 44.31 के औसत से 2969 रन बनाए हैं. इस दौरान उन्होंने 11 शतक लगाए हैं और 8 अर्धशतक लगाए हैं. इस दौरान उनके बल्ले से 333 चौके और 47 छक्के निकले हैं. ऐसे में अब श्रीलंका दौरे पर सिर्फ 31 रन बनाते ही गिल अपने 3000 टेस्ट रन पूरे कर लेंगे. वह भारत के लिए ऐसा करने वाले 28वें खिलाड़ी बन जाएंगे.

जो रूट को पछाड़ नंबर-1 बनने का भी है मौका

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान और स्टार बल्लेबाज शुभमन गिल के पास श्रीलंका में इंग्लिश दिग्गज जो रूट को पीछे छोड़ने का मौका है. यदि शुभमन इस दौरे पर 159 रन बना लेते हैं, तो वह वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप 2025-27 में सबसे अधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज बन जाएंगे. शुभमन ने अब तक वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के इस संस्करण में 8 मैच खेले हैं, जिसकी 14 पारियों में 79.16 के औसत से 950 रन बनाए हैं. इस दौरान उनके बल्ले से 5 शतक और 1 अर्धशतक भी निकला है.

मौजूदा समय में WTC 2025-27 में सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड जो रूट के नाम पर दर्ज है. रूट ने इस संस्करण में 13 मैच खेले हैं, जिसकी 25 पारियों में 48.17 के औसत से 1108 रन बनाए हैं. इस दौरान उन्होंने भी 5 शतक और 2 अर्धशतक लगाए हैं. उनका हाईएस्ट स्कोर 160 रनों का रहा है.

विराट-सहवाग की एलीट लिस्ट में शामिल होने का मौका

श्रीलंका के साथ गॉल इंटरनेशनल स्टेडियम में भारतीय पहला टेस्ट मैच खेलेगी, जिसकी शुरुआत 15 अगस्त से होने वाली है. इस दौरे पर अगर शुभमन गिल शतक लगाने में कामयाब हो जाते हैं, तो वह भारत के लिए श्रीलंका की सरजमीं पर शतक लगाने वाले महज तीसरे भारतीय कप्तान बन जाएंगे. इससे पहले ये कारनामा पूर्व भारतीय दिग्गज सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली ने ही किया है. 

आपको बता दें, भारत ने श्रीलंका की सरजमीं पर पहला टेस्ट मैच 1985 में खेला था और तब से अब तक 7 भारतीय कप्तान वहां कप्तानी कर चुके हैं. मगर, शतक सिर्फ सचिन और विराट के बल्ले से ही आया है.

ये भी पढ़ें: IND vs SL: गॉल टेस्ट में कितने लेफ्ट आर्म बॉलर के साथ उतरेगी टीम इंडिया? कोच के बयान से मिला संकेत

Continue reading on the app

कहानी देश की आजादी की: राजनीति से मानवीय त्रासदी तक की पूरी कहानी, अगर बंटवारा नहीं होता तो क्या होता ?

भारत के विभाजन की त्रासदी केवल 1947 में देश की राजनीतिक सीमाओं के बदलने की घटना नहीं थी, बल्कि इसके साथ बड़े पैमाने पर हिंसा, विस्थापन, परिवारों के बिछड़ने और सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव का दौर भी आया. विभाजन विभीषिका की स्मृति हमें 1947 की उन घटनाओं की तरफ ले जाती है जिसे याद करते हुए इसके कारणों, मानवीय त्रासदी, विभिन्न समुदायों पर पड़े प्रभाव और भविष्य के लिए इससे मिलने वाली सीख पर चर्चा की जाती है.

विभाजन से जुड़े विमर्श में प्रमुख प्रश्न यह भी है कि क्या 1947 का विभाजन टाला जा सकता था? इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि विभाजन की पृष्ठभूमि किन राजनीतिक, सामाजिक और औपनिवेशिक परिस्थितियों में तैयार हुई और इसके बाद भारत तथा पाकिस्तान में समाज और संस्कृति पर इसका क्या प्रभाव पड़ा.

1947 को क्यों याद रखना जरूरी है?

इस विभाजन ने न सिर्फ भारत के टुकड़े किए बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया. पंजाब और बंगाल जैसे क्षेत्रों में सीमाएं खींचे जाने के बाद बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर, जमीन, व्यवसाय और सामाजिक परिवेश छोड़ना पड़ा. परिवार बिछड़े और  हजारों हजार लोगों की जान हिंसा में चली गई.

विभाजन की स्मृति  उन लोगों के अनुभवों और बलिदानों को भी याद दिलाती है, जिन्होंने हिंसा और विस्थापन का दंश झेला. इतिहास से जुड़े इन अनुभवों को याद करने का उद्देश्य भविष्य में ऐसी मानवीय त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोकने और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने की सीख लेना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा 2021 में की थी.

विभाजन की पृष्ठभूमि में कौन से कारक थे?

विभाजन के कारणों को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं. इनमें ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियां, सांप्रदायिक राजनीति, मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की मांग, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक नेतृत्व के बीच मतभेद तथा 1940 के दशक में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा जैसे कारकों का उल्लेख किया जाता है.

1909, 1919 और 1935 के संवैधानिक सुधारों में अलग निर्वाचन व्यवस्थाओं और प्रतिनिधित्व के प्रावधानों ने भी सामुदायिक आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित किया. 1905 का बंगाल विभाजन और 1911 में उसका निरस्त होना भी उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने में महत्वपूर्ण घटनाएं हैं.

1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद मुस्लिम लीग की अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग अधिक स्पष्ट राजनीतिक रूप में सामने आई. इसके बाद 1946 के चुनाव, डायरेक्ट एक्शन डे और विभिन्न क्षेत्रों में हुई सांप्रदायिक हिंसा ने परिस्थितियों को और जटिल बना दिया.

क्या विभाजन रोका जा सकता था?

यह इतिहास का एक महत्वपूर्ण लेकिन जटिल प्रश्न है, जिसका निश्चित उत्तर देना आसान नहीं है. इतिहासकार इस पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं. एक दृष्टिकोण के अनुसार, यदि राजनीतिक नेतृत्व, ब्रिटिश सरकार और विभिन्न समुदायों के बीच किसी वैकल्पिक सत्ता हस्तांतरण व्यवस्था पर सहमति बनती, तो विभाजन की संभावना अलग हो सकती थी. दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार, 1940 के दशक तक सांप्रदायिक राजनीतिक ध्रुवीकरण, अलग राष्ट्र की मांग और बढ़ती हिंसा इतनी गहरी हो चुकी थी कि विभाजन को रोकना अत्यंत कठिन हो गया था.

इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि विभाजन के विकल्पों पर राजनीतिक बातचीत की गुंजाइश थी, लेकिन यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि विभाजन को अनिवार्य रूप से रोका जा सकता था.

अगर 1947 में विभाजन नहीं होता तो क्या स्थिति होती?

यह भी एक हाइपोथीसिस है. अविभाजित भारत की संभावित स्थिति को लेकर कई तरह के अनुमान लगाए जाते हैं. एकीकृत उपमहाद्वीप का क्षेत्रफल, जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन, कृषि क्षमता, औद्योगिक आधार और समुद्री बंदरगाह इसे दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की क्षमता दे सकते थे.

कराची, मुंबई, चिटगांव और कोलकाता जैसे प्रमुख बंदरगाह एक ही आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा होते. पंजाब और सिंध की कृषि क्षमता, बंगाल का जूट उद्योग, खनिज संसाधन और बड़े घरेलू बाजार का संयुक्त उपयोग आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकता था.

मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच व्यापारिक संपर्क भी अलग रूप ले सकते थे. हालांकि ऐसे सभी निष्कर्ष संभावित परिदृश्यों पर आधारित हैं और इन्हें निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता.

विभाजन की मानवीय त्रासदी

विभाजन के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच बड़े पैमाने पर आबादी का स्थानांतरण हुआ. पंजाब और बंगाल में हिंसा सबसे गंभीर रूप से सामने आई. लाखों लोगों ने अपने घर और संपत्ति छोड़ी तथा शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हुए. मृतकों की संख्या को लेकर इतिहासकारों और विभिन्न स्रोतों में काफी अंतर है. सामान्यतः विभाजन से जुड़ी हिंसा में लाखों लोगों की मृत्यु का अनुमान लगाया जाता है. इसी तरह विस्थापित लोगों की संख्या भी विभिन्न अध्ययनों में अलग-अलग बताई गई है.

महिलाओं और बच्चों पर विभाजन का विशेष रूप से गंभीर प्रभाव पड़ा. अपहरण, यौन हिंसा, जबरन विवाह और परिवारों से बिछड़ने की घटनाओं ने हजारों परिवारों को प्रभावित किया. भारत और पाकिस्तान दोनों ने बाद में अपहृत महिलाओं और बच्चों की बरामदगी तथा पुनर्वास के लिए अभियान चलाए.

सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव 

विभाजन ने केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं किया, बल्कि सदियों से विकसित स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी प्रभावित किया. पंजाब और बंगाल की साझा भाषाई, साहित्यिक और लोक परंपराओं पर इसका प्रभाव पड़ा.

लोगों के विस्थापन के साथ स्थानीय बोलियों, खान-पान, लोकगीतों, धार्मिक परंपराओं और सामुदायिक जीवन के स्वरूप में बदलाव आया. दूसरी ओर, विस्थापित समुदायों ने भारत के विभिन्न शहरों में नई बस्तियां, व्यापारिक संस्थान और सांस्कृतिक केंद्र स्थापित किए. इस तरह विभाजन ने एक ओर विरासत के भौगोलिक संबंध को तोड़ा, तो दूसरी ओर विस्थापित समुदायों ने नई जगहों पर अपनी सांस्कृतिक पहचान को पुनर्गठित भी किया.

सिख समाज पर विभाजन का प्रभाव

पंजाब के विभाजन का सिख समाज पर विशेष प्रभाव पड़ा. सिख समुदाय के कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल नवगठित पाकिस्तान में चले गए. इनमें ननकाना साहिब, पंजा साहिब और करतारपुर साहिब जैसे प्रमुख गुरुद्वारे शामिल हैं. 1947 के दौरान पंजाब में बड़े पैमाने पर हिंसा और विस्थापन हुआ. सिख परिवारों को अपनी भूमि, घर और व्यवसाय छोड़कर भारत आना पड़ा. विभाजन ने सिख समुदाय के धार्मिक भूगोल और ऐतिहासिक स्मृति को भी प्रभावित किया.

जैन समाज और विभाजन

विभाजन से पहले लाहौर, स्यालकोट और रावलपिंडी सहित पश्चिमी पंजाब के कई शहरों में जैन समुदाय की उपस्थिति थी. वहां जैन मंदिर, धर्मशालाएं और सामुदायिक संस्थाएं थीं. विभाजन के दौरान जैन परिवारों को भी हिंसा और विस्थापन का सामना करना पड़ा. अनेक परिवार भारत आए और विभिन्न शहरों में जाकर पुनः बस गए. जैन समुदाय ने अपने धार्मिक और सामुदायिक संस्थानों के माध्यम से शरणार्थियों के राहत और पुनर्वास में भी योगदान दिया.

विभाजन से क्या खोया?

विभाजन के प्रभाव को केवल राजनीतिक सीमा परिवर्तन के रूप में नहीं देखा जा सकता. इससे कई स्तरों पर नुकसान हुआ. 

पहला, जनसांख्यिकीय बदलाव: सदियों से साथ रहने वाले समुदाय बिखर गए और लाखों लोग विस्थापित हुए.

दूसरा, धार्मिक और तीर्थ विरासत: कई ऐतिहासिक धार्मिक स्थल नई अंतरराष्ट्रीय सीमा के दूसरी ओर चले गए. इनमें ननकाना साहिब, पंजा साहिब, कटासराज, हिंगलाज माता और शारदा पीठ जैसे स्थल शामिल हैं.

तीसरा, सांस्कृतिक निरंतरता: परिवारों और समुदायों के विस्थापन से स्थानीय परंपराओं और ऐतिहासिक स्मृतियों की निरंतरता प्रभावित हुई.

चौथा, व्यापारिक संपर्क: जो क्षेत्र पहले एक ही आर्थिक और व्यापारिक भूगोल का हिस्सा थे, वे अंतरराष्ट्रीय सीमा से अलग हो गए.

पांचवां, पुरातात्विक और ऐतिहासिक विरासत: तक्षशिला, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और अनेक अन्य ऐतिहासिक स्थल भारत से अलग हो गए. हालांकि इन स्थलों को केवल किसी एक धार्मिक समुदाय की विरासत के रूप में देखना इतिहास की व्यापकता को सीमित कर सकता है; ये पूरे दक्षिण एशियाई सभ्यतागत इतिहास का हिस्सा हैं.

विभाजन और पुनर्निर्माण: शरणार्थियों के सामने बड़ी चुनौती

विभाजन के बाद भारत आए शरणार्थियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती तत्काल पुनर्वास की थी. कई परिवारों ने घर, जमीन, व्यवसाय और सामाजिक नेटवर्क खो दिए थे. कई लोग अस्थायी शिविरों, तंबुओं, फुटपाथों और रेलवे स्टेशनों पर रहने को मजबूर हुए. उनके सामने यह सवाल था कि परिवार को कहां बसाया जाए, रोजगार कैसे मिले और जीवन को दोबारा कैसे शुरू किया जाए.

इसके बावजूद शरणार्थियों ने धीरे-धीरे नए शहरों और बस्तियों में व्यापार, उद्योग और सामाजिक संस्थाएं स्थापित कीं. दिल्ली, अमृतसर, लुधियाना, जयपुर, मेरठ और देश के कई अन्य शहरों के आर्थिक-सामाजिक विकास में विभाजन के बाद आए लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही.

अनुसूचित जाति समुदाय और विभाजन

विभाजन का प्रभाव अनुसूचित जाति समुदायों पर भी पड़ा. पूर्वी बंगाल में नामशूद्र और अन्य दलित समुदायों के बीच विभाजन को लेकर अलग-अलग राजनीतिक धारणाएं थीं. पाकिस्तान के शुरुआती दौर में अनुसूचित जाति के नेता जोगेंद्र नाथ मंडल वहां की सरकार में शामिल हुए और उन्होंने अल्पसंख्यक तथा अनुसूचित समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा की उम्मीद की. हालांकि बाद की घटनाओं को लेकर उनका अनुभव निराशाजनक रहा.

मंडल ने 1950 में पाकिस्तान सरकार से इस्तीफा देकर भारत वापसी की. अपने इस्तीफे में उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू और विशेषकर दलित समुदायों के साथ भेदभाव, हिंसा और प्रशासनिक सुरक्षा की समस्याओं को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे. इस प्रसंग से यह सवाल भी सामने आता है कि विभाजन के बाद अल्पसंख्यकों और अनुसूचित समुदायों की सुरक्षा तथा नागरिक अधिकारों को किस प्रकार सुनिश्चित किया गया.

डॉ. आंबेडकर का विभाजन पर दृष्टिकोण

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पाकिस्तान के प्रश्न पर विस्तार से विचार किया था. उनकी पुस्तक 'Thoughts on Pakistan' (1940) और बाद में विस्तृत रूप 'Pakistan or the Partition of India' (1945) में उन्होंने मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की मांग, विभाजन और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की. आंबेडकर का तर्क था कि यदि विभाजन होता है तो केवल संवैधानिक आश्वासन पर्याप्त नहीं होंगे और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक गंभीर प्रश्न बनेगी. उन्होंने जनसंख्या के संभावित आदान-प्रदान और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर भी चर्चा की थी.

आज के लिए क्या सीख?

विभाजन की स्मृति का उद्देश्य केवल अतीत के दर्द को दोहराना नहीं, बल्कि उससे भविष्य के लिए सीख लेना भी है. इसके लिए सामाजिक सद्भाव, लोकतांत्रिक संस्थाओं, कानून के शासन और नागरिक अधिकारों को मजबूत करना महत्वपूर्ण है. विभाजन से जुड़े अनुभव यह भी बताते हैं कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, हिंसा, नफरत और राजनीतिक अविश्वास किस प्रकार व्यापक मानवीय संकट में बदल सकते हैं.

 

Continue reading on the app

  Sports

मिचेल स्टार्क ने तोड़ा कपिल देव का रिकॉर्ड, 'हिंदू क्रिकेटर' का विकेट लेकर किया बड़ा कारनामा

mitchell starc surpasses kapil dev: लिटन दास ऑस्ट्रेलिया के पेसर मिचेल स्टार्क का टेस्ट क्रिकेट में 435वां शिकार बने. इस विकेट के साथ ही स्टार्क ने टेस्ट में सबसे ज्यादा विकेट लेने के मामले में भारतीय दिग्गज कपिल देव को पीछे छोड़ दिया. अब उनकी नजर साउथ अफ्रीका के डेल स्टेन से आगे निकलने पर होगी, जिनके नाम टेस्ट में 439 विकेट दर्ज हैं. Fri, 14 Aug 2026 12:02:31 +0530

  Videos
See all

Independence Day : 15 अगस्त से पहले हाई अलर्ट पर Delhi-NCR! | Security Alert | Shorts | #tmktech #vivo #v29pro
2026-08-14T06:39:11+00:00

Viral Video : बापू को याद कर रोने लगे समाजवादी नेता! | Shorts | Mahatma Gandhi | #tmktech #vivo #v29pro
2026-08-14T06:45:07+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers