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Dalai Lama का Health Update: घुटने के इलाज के लिए Delhi रवाना, Ladakh में लंबा प्रवास।

तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा 5 जून (शुक्रवार) को अपने बाएं घुटने के इलाज के लिए धर्मशाला से नई दिल्ली के लिए रवाना होंगे। यह जानकारी उनके आधिकारिक फेसबुक हैंडल पर जारी एक पोस्ट में दी गई है। पार्टी में बताया गया है, परम पावन दलाई लामा कल धर्मशाला से दिल्ली के लिए रवाना होंगे, जहां वे अपने बाएं घुटने का इलाज करवाएंगे। घोषणा में आगे कहा गया है कि स्वस्थ होने के बाद दलाई लामा जून के अंत में लद्दाख की यात्रा करेंगे और वहां लंबे समय तक रहेंगे। घोषणा में कहा गया स्वस्थ होने के बाद, वे जून के अंत में लद्दाख की यात्रा करेंगे और वहां लंबे समय तक रहेंगे।
इससे पहले बुधवार को, आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने धर्मशाला स्थित अपने कार्यालय में आयोजित एक विशेष समारोह में एल्बम 'मेडिटेशन्स: द रिफ्लेक्शंस ऑफ हिज होलीनेस द दलाई लामा' के लिए जीता ग्रैमी पुरस्कार औपचारिक रूप से ग्रहण किया।

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यह पुरस्कार अलसरोद वादक अमजद अली खान और उनके बेटों, अमान अली बंगश और अयान अली बंगश ने प्रदान किया। मीडिया को संबोधित करते हुए, वादक अमजद अली खान ने कहा कि हमने अपने बेटों, अमान अली बंगश और अयान अली बंगश के साथ सरोद बजाया है। हम परम पावन दलाई लामा की आवाज के साथ सरोद बजा रहे हैं। इसलिए हम यहां परम पावन दलाई लामा को यह ग्रैमी पुरस्कार भेंट करने आए हैं। 

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आयान अली बंगश ने ग्रैमी पुरस्कार जीतने और दलाई लामा के साथ सहयोग को "आशीर्वाद" बताया। उन्होंने कहा, "यहाँ होना हमारे लिए बहुत बड़ा सम्मान है और हम बहुत भाग्यशाली हैं। यह हमारे लिए एक आशीर्वाद है। हम परम पावन के आभारी हैं कि उन्होंने इस परियोजना को आशीर्वाद दिया और हमें इसका हिस्सा बनने का अवसर दिया। हम बहुत धन्य हैं। यह सब परम पावन के आशीर्वाद से ही संभव हुआ है। इसी वर्ष की शुरुआत में, दलाई लामा ने ऑडियोबुक श्रेणी में पुरस्कार जीता था, जहाँ उन्हें कैथी गार्वर की पुस्तक 'एल्विस, रॉकी एंड मी: द कैरोल कॉनर्स स्टोरी', ट्रेवर नोआ की पुस्तक 'इनटू द अनकट ग्रास', केतनजी ब्राउन जैक्सन की पुस्तक 'लवली वन: ए मेमोइर' और फैब मोरवन की पुस्तक 'यू नो इट्स ट्रू: द रियल स्टोरी ऑफ मिली वैनिली' के साथ नामांकित किया गया था।

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आत्मनिर्भर बनेगा Rural India! MSME अध्यक्ष मगनभाई पटेल ने बताया PM Modi सरकार के लिए 'विजयी' फॉर्मूला

हाल ही में ऑल इंडिया MSME फेडरेशन के अध्यक्ष मगनभाई पटेलने देश के केंद्रीय ग्रामीण मंत्रीजी शिवराज सिंह चौहान को देश के ग्रामीण क्षेत्र की वर्तमान परिस्थिति के बारे में अपने सुझाव प्रस्तुत करते हुए एक पत्र द्वारा बताया की हमारे देश के सम्माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्रभाई मोदीजी एवं उनकी टीम के कार्यकाल के दौरान देश की ग्रामीण स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। इसके बावजूद अभी भी कई चुनौतियां हैं, जिसके लिए हम आपके समक्ष कुछ सुझाव प्रस्तुत कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के हमारे इन सुझावों के साथ-साथ देश के श्रम, रोजगार और स्वास्थ्य से संबंधित सुझाव भी हम आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा एव विश्वास है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए हमारे सुझावों पर ध्यान देते हुए उचित परिणामोन्मुखी कार्य निश्चित रूप से हो सकता है।

भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश की संस्कृति, परंपरा, कृषि और अर्थव्यवस्था की जड़ें गांवों में बसी हैं। स्वतंत्रता के समय भारत की अधिकांश जनसंख्या गांवों में रहती थी। जब स्वतंत्रता मिली, तब देश का जीवन मुख्य रूप से गांवों में ही केंद्रित था। उस समय भारत की कुल जनसंख्या लगभग 34 करोड़ थी, जिसमें से करीब 85% लोग खेती और पशुपालन से जुड़े थे और मात्र 15% आबादी शहरों में रहती थी। इससे स्पष्ट होता है कि देश की मानवशक्ति और श्रमशक्ति का बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में था। वर्ष 1947 के दौरान देश के GDP में कृषि और ग्रामीण क्षेत्र का योगदान बहुत बड़ा था, जो आज घटकर लगभग 15% से 18% रह गया है। उस समय की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित होने के कारण आय के मुख्य स्रोत कृषि, डेयरी, पशुपालन और कुटीर उद्योग थे। देश के कुल रोजगार में लगभग 70% से 75% लोग कृषि और ग्रामीण व्यवसायों से जुड़े थे। शहरों में बड़े उद्योग कम होने के कारण रोजगार के लिए गांवों पर ही निर्भरता थी। तब देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 50 से 52 मिलियन टन था। उत्पादन कम होने के कारण भारत को अनाज का आयात करना पड़ता था, फिर भी देश की खाद्य आपूर्ति ग्रामीण किसान ही पूरी करते थे। उस समय बड़े उद्योग सीमित थे, इसलिए ग्रामीण कुटीर उद्योग जैसे हस्तशिल्प, खादी, हथकरघा, मिट्टी के बर्तन और बढ़ईगिरी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। 

अर्थव्यवस्था में इतना बड़ा योगदान होने के बावजूद ग्रामीण लोगों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी, जिसके मुख्य कारण कम उत्पादकता,सिंचाई का अभाव,गरीबी,जमींदारी प्रथा,कर्ज का बोझ और तकनीक की कमी थे। देश की अर्थव्यवस्था का आधार मजबूत होने के बावजूद ग्रामीण जनजीवन पिछड़ा हुआ था,लेकिन आज उसमे काफी सुधार देखने को मिल रहे है। 
 

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डेयरी उद्योग की स्थिति :-

स्वतंत्रता के समय भारत में दूध का कुल वार्षिक उत्पादन लगभग 17 मिलियन टन था, जो जनसंख्या और खपत के लिहाज से काफी अच्छा था। उस समय देश की जनसंख्या लगभग 30 करोड़ थी।आज इस स्थिति में काफी सुधार देखने को मिला है। आज देश की बनास डेयरी भारत की सबसे बड़ी सहकारी डेयरी संस्थाओं में से एक मानी जाती है, जहां इसके विभिन्न प्लांटों के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 1 करोड़ लीटर दूध प्रोसेस किया जाता है।

हमारा सुझाव है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी लगभग 2000 सहकारी डेयरी संस्थाएं स्थापित की जा सकती हैं, जो प्रतिदिन 5000 लीटर दूध प्रोसेस करें। इससे अलग-अलग क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन होगा, प्रबंधन का बेहतर वर्गीकरण होगा और पूरे ग्रामीण क्षेत्र का विकास हो सकेगा। देश में प्रतिदिन लगभग 65 से 70 करोड़ लीटर दूध का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग 50% से 60% दूध (यानी करीब 33 से 35 करोड़ लीटर) प्रतिदिन ग्रामीण क्षेत्रों से छोटे-बड़े शहरों में बिक्री के लिए पहुंचता है।

आज देश में प्रतिदिन औसतन 6 लाख टन सब्जियां विभिन्न खेतों से निकलती हैं, जिनमें से लगभग 70% से 80% हिस्सा ट्रकों के माध्यम से शहरी APMC बाजारों में पहुंचाया जाता है। इस प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर पेट्रोल और डीजल का व्यय होता है। आज सौर ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा  के कारण परिवहन क्षेत्र में काफी सुधार देखा जा रहा है, जिससे प्रदूषण में भी भारी मात्रा में कमी आ रही है।

हमारा सुझाव है कि देश में 20 कि.मी. की औसत देनेवाली पेट्रोल और डीजल गाड़ियों के साथ बैटरी से चलने वाली (इलेक्ट्रिक) गाड़ियों को अनिवार्य कर देना चाहिए। इससे प्रदूषण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, पेट्रोल-डीजल की खपत कम होगी, जिससे विदेशों से ईंधन के आयात में कमी आएगी और देश का राजस्व भी बचेगा।

रोजगार और व्यापार उद्योग:-

आज देश के ग्रामीण क्षेत्रों के मास्टर डिग्री धारक युवा कॉर्पोरेट कंपनियों में केवल 18 से 20 हजार रुपये की नौकरी कर रहे हैं। कॉर्पोरेट कंपनियां इंजीनियर, स्नातक या डिप्लोमा धारक कुशल युवाओं को उनकी योग्यता की तुलना में बहुत कम वेतन पर रखती हैं, जिसे एक प्रकार का शोषण ही कहा जा सकता है। इस स्थिति के समाधान हेतु ऐसे कुशल युवाओं के लिए निश्चित वेतन मानक निर्धारित किए जाने चाहिए। जिसमें पोस्ट ग्रेजुएट (Master's) के लिए शुरुआती वेतन 40 हजार रुपये, ग्रेजुएट के लिए 30 हजार रुपये, स्किल्ड लेबर (कुशल श्रमिक) के लिए 1000 रुपये प्रतिदिन और अनस्किल्ड लेबर (अकुशल श्रमिक) के लिए 700 रुपये प्रतिदिन का वेतन ढांचा होना चाहिए।इससे देश के लगभग 40 करोड़ युवाओं को प्रोत्साहन मिलेगा और इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव उत्पादन पर पड़ेगा। इस विषय पर न्यूनतम मजदूरी अधिनियम  के तहत श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के साथ परिणामोन्मुखी चर्चा की जानी चाहिए।

इसके अतिरिक्त, कॉर्पोरेट कंपनियों में लेबर कॉन्ट्रैक्ट (ठेका) पद्धति को समाप्त किया जाना चाहिए या उसके लिए एक पारदर्शी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, क्योंकि वर्तमान कॉन्ट्रैक्ट पद्धति में युवाओं का केवल शोषण ही होता है। इसके लिए कंपनियों को अपने पास ही पे-रोल रखना चाहिए और ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि ठेकेदार के खाते से सीधा कर्मचारी के खाते में वेतन जमा हो जाए। ठेकेदारों का कमीशन 10 से 20% तक ही सीमित होना चाहिए और इसका नियमित सरकारी ऑडिट होना चाहिए। कई सरकारी विभागों में रात्रि सुरक्षा गार्डों  के लिए सरकार आठ घंटे की ड्यूटी के लिए 20 हजार रुपये वेतन देती है, लेकिन ठेकेदार इन गार्डों को केवल 10 से 12 हजार रुपये देकर उनका शोषण करते हैं, जो एक प्रकार का 'महापाप' है।
 

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ग्रामीण क्षेत्रों में माइक्रो, स्मॉल, SSI और कुटीर उद्योग:-

एग्रो-प्रोसेसिंग यूनिट्स के तहत ग्रामीण कृषि उत्पादों को सीधे बेचने के बजाय उन पर प्रसंस्करण (Processing) करने के लिए जिनिंग प्लांट, माइक्रो, स्मॉल, SSI जैसे लघु उद्योग जैसे कि वेफर्स, मसाले,अचार,तेल मिलें शुरू करनी चाहिए और ग्रामीण उत्पादों के लिए बाजार का एक हिस्सा आरक्षित रखना चाहिए। गांवों में MSME को विशेष प्रोत्साहन देना चाहिए, जिसके लिए स्थानीय कारीगरों और लघु उद्योगों को SIDBI,NABARD  या अन्य बैंकों द्वारा सस्ती दरों पर ऋण और तकनीकी प्रशिक्षण देकर 'ग्रामीण क्लस्टर' विकसित करने चाहिए।

किसानों की उपज खराब न हो, इसके लिए गांवों के पास ही छोटे कोल्ड स्टोरेज या वेयरहाउस बनाने चाहिए। ग्रामीण उद्योगों के उत्पादों को Amazon या Flipkart जैसे प्लेटफॉर्म पर 'ग्रामीण ब्रांड' के रूप में लॉन्च किया जाना चाहिए। आज देश के ग्रामीण क्षेत्रों में माइक्रो, स्मॉल, कुटीर और खादी ग्रामोद्योग जैसे उद्योगों को अधिकतम प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्रों से बहुत बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है। ग्रामीण युवा और महिलाएं नौकरियों के लिए शहरों में बस रहे हैं, जिससे शहरी क्षेत्रों पर भार बढ़ गया है।शहरों में वेतन की तुलना में घरेलू खर्चे जैसे मकान किराया, सब्जी-किराना, बच्चों की शिक्षा आदि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में बहुत अधिक होने के कारण एक मध्यमवर्गीय परिवार हमेशा आर्थिक तंगी में ही रहता है।

इसके अलावा, क्रिप्टो करेंसी और AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि तकनीक का विस्तार जितना बढ़ेगा, देश में युवाओं की बेरोजगारी उतनी ही बढ़ सकती है। आज हमारे देश की जनसंख्या 140 करोड़ है, जो विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 20% से 25% कहा जा सकता है। चीन जैसे देशों की जनसंख्या भी लगभग 140 करोड़ है। इस कारण भारत और चीन को मिलकर व्यापार-उद्योग करना चाहिए और तकनीक के उपयोग के स्थान पर अधिक से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिले, ऐसे प्रयास करने चाहिए। इसके लिए भारत और चीन को विशेष चिंतन करने की आवश्यकता है।

इसके अतिरिक्त, पश्चिमी देशों में वर्तमान युद्ध की स्थिति और उसका संपूर्ण विश्व पर प्रभाव देखते हुए, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्रभाई मोदीजी द्वारा सुझाए गए मितव्ययिता के कदमों का हम स्वागत करते हैं। सोने की खरीद कम करना, पेट्रोल-डीजल की खपत घटाकर सार्वजनिक परिवहन  का अधिक उपयोग करना, और यदि औद्योगिक क्षेत्र शहर से दूर हो तो कॉमन बस या वाहन साझा कर किफायत से परिवहन का उपयोग करने से पेट्रोल-डीजल की खपत काफी कम हो सकती है, साथ ही प्रदूषण में भी निश्चित रूप से कमी आएगी।

इसके अलावा,विदेशों से अनावश्यक वस्तुओं जैसे कि सौंदर्य प्रसाधन,भौतिक सुख-सुविधाओं की वस्तुएं जैसे मोबाइल,AC,लक्जरी गाड़ियां आदि का आयात बंद कर देना चाहिए या कम करना चाहिए। इसके साथ ही, बड़े-बड़े विवाह समारोहों या सामाजिक प्रसंगों में दिखावे की प्रवृत्ति के कारण होनेवाले अंधाधुंध खर्चों पर भी रोक लगानी चाहिए। आज हमारे देश में विवाह और अन्य प्रसंगों में लोग अनावश्यक रूप से हजारों करोड़ रुपये खर्च कर देते हैं, जिसमें डेकोरेशन से लेकर भोजन तक, बिना सोचे-समझे भारी खर्च किया जाता है।आज सामान्य विवाह प्रसंगों में लोग एक थाली के 2000 से 5000 रुपये तक खर्च करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप धन का अत्यधिक अपव्यय होता है और साथ ही अन्न की भी भारी बर्बादी होती है। इसके अलावा, विवाह समारोहों में मनोरंजन के लिए विदेशों से कलाकारों को नहीं बुलाया जाना चाहिए, जो कुछ ही घंटों के करोड़ रुपये लेते हैं, जो कि अत्यंत दुखद है।

इसके अतिरिक्त,यदि सोने-चांदी के आभूषणों, कपडे,फर्नीचर, सौंदर्य प्रसाधन और अन्य भौतिक सुख-सुविधाओं की वस्तुओं की खरीद पर नियंत्रण रखा जाए,तो देश और नागरिकों को आर्थिक कठिनाइयों का कम सामना करना पड़ेगा। विदेशों में होनेवाली 'डेस्टिनेशन वेडिंग' पर भी रोक लगानी चाहिए। धन का इस प्रकार का अपव्यय और दिखावे की प्रवृत्ति देश को बर्बादी की ओर ले जानेवाला एक बड़ा कारक है।इस धन का सदुपयोग यदि देश के गरीब एवं जरूरतमंद वर्ग, कुपोषित बच्चों और महिलाओं के कल्याण के लिए किया जाए, तो यह एक मंदिर बनाने जैसा पुण्य कार्य माना जाएगा।

आज देश के 10% लोगों के पास 90% अर्थव्यवस्था है और 90% लोगों के पास केवल 10% अर्थव्यवस्था है। यदि आप इस विषय पर गहराई से चिंतन करंगे तो,यह स्थिति स्पष्ट रूप से सामने आ जाएगी।

आज जब पूरी दुनिया में अशांति की स्थिति बनी हुई है, तब देश की कॉर्पोरेट कंपनियों को कच्चे माल  की खरीद पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। स्टील,आयन,प्लास्टिक ग्रेन्यूल्स और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों को इस दिशा में विशेष रूप से सतर्क रहकर खर्चे कम करके उत्पाद को सस्ता करने की  की जरूरत है।

ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा:-

ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा की बात करें तो गांवों में निजी स्कूलों की स्थापना की जानी चाहिए। निजी स्कूलों में उच्च योग्यता प्राप्त शिक्षक, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, कंप्यूटर और प्रोजेक्टर जैसे आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित स्मार्ट क्लास रूम और खेल गतिविधियों की उपलब्धता के कारण ग्रामीण बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ेगी। इससे उनमें अनुशासन और संस्कार जैसे गुणों का विकास होगा,वे व्यसनों से दूर रह सकेंगे,शहरी इलाको में भी भारण कम होगा और भविष्य में एक सफल व्यक्ति बनकर अपना जीवन संवार सकेंगे।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य:-

आज भी देश के कई गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) पर किसी भी प्रकार की उचित स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं है। सरकारी अस्पतालों में जरूरी मेडिकल उपकरणों का अभाव है और गांवों में ब्लड बैंक की सुविधा भी नहीं है। आज भी गांवों में प्रसव के समय या अन्य आपातकालीन स्थितियों में मरीजों को समय पर रक्त न मिल पाने के कारण मृत्यु होने के कई मामले सामने आए हैं।अतः प्रत्येक तालुका स्तर पर कम से कम 50 कि.मी. के दायरे में एक ब्लड बैंक अनिवार्य रूप से होना चाहिए। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में सरकारी डॉक्टरों की उपस्थिति नियमित नहीं होती या वे शहरी क्षेत्रों से आने के कारण समय पर नहीं पहुंच पाते, जिससे मरीज की जान जोखिम में पड़ जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी '108' जैसी एम्बुलेंस सेवाएं समय पर नहीं पहुंच पातीं, जिसके कारण ग्रामीणों को निजी वाहनों से मरीज को नजदीकी प्राइवेट अस्पताल ले जाना पड़ता है और कई बार मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देता है।

यह हमारे सुझाव मात्र है। यहां हम किसी व्यक्ति,संस्था या कंपनी पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं, बल्कि देश में वर्तमान में जो परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं,उनका सामना करने और उनसे लड़ने के लिए केवल अपने विचार प्रस्तुत कर रहे हैं।

स्वतंत्रता के बाद भारत के ग्रामीण विकास में ऐतिहासिक परिवर्तन आया है। कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और रोजगार जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इसके बावजूद ग्रामीण भारत को पूर्ण रूप से समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।भारत का वास्तविक विकास तभी संभव होगा जब गांव आर्थिक रूप से मजबूत,शिक्षित,स्वस्थ और आत्मनिर्भर बनेंगे। 'गांव का विकास यानी देश का विकास'-इस विचार को साकार करने के लिए सरकार, समाज और जनता को मिलकर कार्य करना आवश्यक है।

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वैभव सूर्यवंशी बनेंगे गेमचेंजर? सूर्यकुमार यादव पर बड़ा फैसला... आखिर क्या चल रहा है?

Vaibhav Sooryavanshi: वैभव सूर्यवंशी जल्द ही आयरलैंड के खिलाफ होने वाली T20I सीरीज़ में टीम इंडिया के लिए डेब्यू कर सकते हैं, और फैंस पहले से ही उनके प्रदर्शन को लेकर काफी उत्साहित हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्हें इंग्लैंड सीरीज़ के लिए भी मौका मिल सकता है, जबकि इस साल उनका सबसे बड़ा इम्तिहान जापान में होने वाले एशियन गेम्स में देखने को मिल सकता है. इस एपिसोड में कड़क क्रिकेट में हम टीम इंडिया की T20 कप्तानी में हुए बड़े बदलाव पर भी चर्चा कर रहे हैं, जिसमें सूर्यकुमार यादव को कप्तानी से हटाए जाने की वजह और नए संभावित कप्तान को लेकर चल रही चर्चाएं शामिल हैं. Thu, 4 Jun 2026 19:12:39 +0530

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