Ekadashi Paran Rules: एकादशी पारण के दिन सावन सोमवार का व्रत भी है तो कैसे खोलें? जानें आसान नियम
Ekadashi Paran Rules: सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति के लिए खास माना जाता है। इस दौरान आने वाले सोमवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं। इस बार 10 अगस्त 2026 को एकादशी के पारण और सावन के दूसरे सोमवार का संयोग बन रहा है। ऐसे में उन भक्तों के सामने सवाल है जो एकादशी का व्रत रखने के साथ सोमवार का व्रत भी कर रहे हैं कि आखिर एकादशी का पारण किस तरह किया जाए।
पंचांग के अनुसार 9 अगस्त को कामिका एकादशी थी और 10 अगस्त को द्वादशी तिथि में इसका पारण किया जा रहा है। इसी दिन सावन का दूसरा सोमवार भी है।
एकादशी का पारण कब किया जाता है?
धार्मिक परंपरा में एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि में पारण करके किया जाता है। सामान्य तौर पर सूर्योदय के बाद और उचित पारण काल में व्रत खोलने की परंपरा है।
हालांकि, पारण का सटीक समय स्थान और पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए अपने शहर के पंचांग के अनुसार पारण का समय देखना बेहतर माना जाता है।
सावन सोमवार भी हो तो क्या करें?
अगर एकादशी पारण के दिन सावन सोमवार का व्रत भी रखा गया है, तो दोनों व्रतों के नियमों को ध्यान में रखना जरूरी है। ऐसी स्थिति में अन्न ग्रहण करना हर किसी के लिए अनिवार्य नहीं माना जाता।
अपनी व्रत परंपरा के अनुसार भक्त तुलसी दल, गंगाजल, चरणामृत या फलाहार लेकर एकादशी व्रत का पारण कर सकते हैं। इसके बाद सावन सोमवार के व्रत के नियमों का पालन जारी रखा जा सकता है।
तुलसी दल से कैसे करें एकादशी पारण?
अगर सोमवार के व्रत के कारण अन्न ग्रहण नहीं करना चाहते हैं, तो धार्मिक मान्यता के अनुसार तुलसी दल से पारण किया जा सकता है। इसके लिए भगवान विष्णु का ध्यान करें और श्रद्धापूर्वक तुलसी दल ग्रहण करें। इसके बाद सावन सोमवार के व्रत के अनुसार भगवान शिव की पूजा और अन्य नियमों का पालन जारी रखा जा सकता है। तुलसी का संबंध भगवान विष्णु की पूजा से माना जाता है और एकादशी व्रत में इसका विशेष महत्व बताया गया है।
गंगाजल या चरणामृत से भी कर सकते हैं पारण
जो श्रद्धालु सोमवार को अन्न के साथ फलाहार भी नहीं लेना चाहते, वे अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार गंगाजल या चरणामृत ग्रहण करके एकादशी व्रत का समापन कर सकते हैं। इसके बाद पूरे दिन भगवान शिव की पूजा, शिवलिंग का जलाभिषेक और मंत्र जाप करते हुए सावन सोमवार का व्रत रखा जा सकता है।
क्या एकादशी पारण में अन्न खाना जरूरी है?
आम तौर पर एकादशी व्रत के बाद द्वादशी में पारण करने की परंपरा है। लेकिन यदि पारण के दिन कोई दूसरा व्रत भी हो, जिसमें अन्न का सेवन नहीं किया जाता, तो व्रत की अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या अन्य मान्य पदार्थों से पारण किया जा सकता है। इस मामले में व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय पंचांग के नियमों का ध्यान रखना चाहिए।
एकादशी पारण के बाद सावन सोमवार की पूजा कैसे करें?
पारण के बाद सोमवार के व्रत का संकल्प जारी रखा जा सकता है। भगवान शिव का जलाभिषेक करें और उन्हें बेलपत्र, फूल आदि अर्पित करें। इसके बाद भगवान शिव का ध्यान करते हुए 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप किया जा सकता है। पूरे दिन सोमवार व्रत के नियमों का पालन करें और अपनी परंपरा के अनुसार शाम को या निर्धारित समय पर व्रत का समापन करें।
ध्यान रखें ये जरूरी बात
एकादशी पारण का समय शहर, तिथि और स्थानीय पंचांग के अनुसार बदल सकता है। इसी तरह व्रत खोलने के नियम अलग-अलग परंपराओं में भिन्न हो सकते हैं। इसलिए यदि आप दोनों व्रत एक साथ कर रहे हैं, तो अपने स्थानीय पंचांग में दिए गए पारण समय और परिवार की धार्मिक परंपरा को प्राथमिकता देना उचित रहेगा।
Sawan Somwar: सावन के दूसरे सोमवार पर बन रहा प्रदोष का संयोग, शिव रुद्राष्टकम पाठ से मिलेगा विशेष लाभ; जानें सही विधि
Sawan Somwar: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए बेहद खास माना जाता है। इस पूरे महीने शिव भक्त अलग-अलग तरीके से भोलेनाथ की पूजा करते हैं। खासकर सावन के सोमवार को शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है। मान्यता है कि सोमवार के दिन भगवान शिव का व्रत और पूजन करने से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और जीवन में चल रही परेशानियों से राहत मिलती है। इस बार सावन का दूसरा सोमवार और भी खास माना जा रहा है, क्योंकि इसी दिन प्रदोष व्रत का संयोग भी बन रहा है। सोमवार और प्रदोष दोनों ही भगवान शिव को समर्पित माने जाते हैं। ऐसे में शिव आराधना का महत्व और बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शिव रुद्राष्टकम का श्रद्धापूर्वक पाठ करना शुभ माना जाता है।
शिव रुद्राष्टकम पाठ क्यों माना जाता है खास?
रुद्राष्टकम भगवान शिव की स्तुति में रचा गया एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसमें भगवान शिव के स्वरूप और उनके गुणों का वर्णन करते हुए उनकी आराधना की जाती है। मान्यता है कि सावन में नियमित रूप से शिव स्तुति करने से मन को शांति मिलती है और भक्त का ध्यान सकारात्मक दिशा में जाता है। कई धार्मिक मान्यताओं में रुद्राष्टकम के पाठ को कार्यक्षेत्र से जुड़ी परेशानियों और मानसिक तनाव से राहत पाने के लिए भी उपयोगी बताया गया है। श्रद्धालु इसे विशेष रूप से सावन सोमवार और प्रदोष के अवसर पर पढ़ते हैं। हालांकि इसके फल को आस्था और धार्मिक विश्वास के रूप में ही देखना चाहिए।
सावन सोमवार पर कैसे करें रुद्राष्टकम का पाठ?
अगर आप सावन सोमवार के दिन रुद्राष्टकम का पाठ करना चाहते हैं तो सुबह स्नान करके पूजा के लिए तैयार हो जाएं। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान शिव का ध्यान करें। पूजा स्थल को साफ करके शिवलिंग या भगवान शिव की प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं। इसके बाद श्रद्धा के अनुसार भगवान शिव का जलाभिषेक करें। जलाभिषेक के लिए स्वच्छ जल का इस्तेमाल किया जा सकता है। पूजा के दौरान बेलपत्र और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने की परंपरा भी है। जलाभिषेक और पूजा पूरी करने के बाद शांत स्थान पर बैठकर रुद्राष्टकम का पाठ करें। पाठ के दौरान मन को एकाग्र रखने और जल्दबाजी न करने का प्रयास करें। पाठ पूरा होने के बाद भगवान शिव से अपनी मनोकामना और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना कर सकते हैं।
इन बातों का रखें ध्यान
सावन सोमवार के दिन पूजा से पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में सफेद, पीले, हरे या नारंगी जैसे सात्विक रंगों के वस्त्र पहनने की सलाह दी जाती है। पूजा के दौरान मन को शांत रखें और शिव मंत्र या स्तुति का श्रद्धापूर्वक जाप करें। यदि संभव हो तो मंदिर जाकर शिवलिंग के दर्शन और जलाभिषेक करें। घर पर पूजा करते समय भी पूजा स्थान की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पूजा-पाठ श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाए। धार्मिक अनुष्ठानों को किसी निश्चित सांसारिक परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं, बल्कि आस्था, सकारात्मकता और आध्यात्मिक साधना के रूप में देखना चाहिए।
करियर और कारोबार के लिए क्यों खास माना जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव की उपासना से व्यक्ति को मानसिक मजबूती और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। यही वजह है कि सावन सोमवार पर कई लोग अपने करियर, कारोबार और आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए शिव आराधना करते हैं। रुद्राष्टकम का पाठ करते समय मन को एकाग्र रखने से तनाव कम करने और आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद मिल सकती है। कारोबार या नौकरी से जुड़ी किसी परेशानी के बीच यह साधना व्यक्ति को शांत होकर आगे की योजना बनाने की प्रेरणा दे सकती है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हरिभूमि.कॉम इसकी पुष्टि नहीं करता है।
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