6 साल पार्टी में रहकर नहीं लड़ा एक भी चुनाव, अब इस दिग्गज नेता ने छोड़ी बीजेपी, नितिन नबीन को सौंपा इस्तीफा
क्या आप जानते हैं भारतीय जनता पार्टी में एक नेता ऐसा भी है जो पार्टी में 6 साल से अहम पद पर तो काबिज रहा लेकिन उसने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा. जी हां न तो विधायक का और न ही सांसद का. जी हां हम बात कर रहे हैं तमिलनाडु बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष रह चुके के. अन्नामलाई की. तमिलनाडु की राजनीति में इन दिनों पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई को लेकर चर्चाओं का दौर तेज है। पार्टी के भीतर उनकी भूमिका और भविष्य को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही हैं.
हालिया घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अन्नामलाई भाजपा में नई जिम्मेदारी संभालेंगे या फिर कोई अलग राजनीतिक राह चुनेंगे. इन अटकलों के बीच अन्नामलाई ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने अपना इस्तीफा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन को सौंपा है. इतना ही नहीं इस्तीफा के बाद वह दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से भी मुलाकात करने वाले हैं.
दिल्ली दौरे ने बढ़ाई राजनीतिक उत्सुकता
सूत्रों के अनुसार, अन्नामलाई ने भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व से मुलाकात कर अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा की है. बताया जा रहा है कि उन्होंने पार्टी के सामने अपनी भावनाएं रखी हैं और भविष्य की भूमिका को लेकर स्पष्टता चाही है. हालांकि पार्टी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन यह माना जा रहा है कि नेतृत्व उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देने पर विचार कर सकता है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अन्नामलाई का कद केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहा है. पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है, जिसके चलते पार्टी उनके अनुभव का उपयोग व्यापक स्तर पर करना चाह सकती है.
विजय की एंट्री के बाद बदला राजनीतिक समीकरण
तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय के सक्रिय राजनीति में आने और सत्ता तक पहुंचने के बाद राज्य का राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदला है. लंबे समय से द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द घूमने वाली राजनीति में अब नए चेहरे और नए मुद्दे जगह बना रहे हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि अन्नामलाई भी इस बदलाव को करीब से देख रहे हैं. युवा मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता और सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़ उन्हें राज्य की राजनीति का प्रभावशाली चेहरा बनाती है. ऐसे में उनके अगले कदम का असर केवल भाजपा पर ही नहीं, बल्कि पूरे तमिलनाडु के राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है.
पोस्टरों ने बढ़ाया सस्पेंस
अन्नामलाई के जन्मदिन से पहले कोयंबटूर सहित कई इलाकों में लगाए गए बड़े-बड़े पोस्टरों ने चर्चाओं को और हवा दी है. पोस्टरों में उन्हें नेतृत्व संभालने का आह्वान किया गया, जिसके बाद यह अटकलें लगने लगीं कि वे कोई नई राजनीतिक पहल कर सकते हैं.
हालांकि अन्नामलाई ने सार्वजनिक रूप से किसी भी संभावना की पुष्टि नहीं की है. उन्होंने मीडिया से केवल इतना कहा कि कुछ दिनों का इंतजार किया जाए, जिसके बाद स्थिति स्पष्ट हो जाएगी.
आईपीएस अधिकारी से लोकप्रिय नेता तक का सफर
के. अन्नामलाई का राजनीतिक सफर काफी दिलचस्प रहा है. भारतीय पुलिस सेवा की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए अन्नामलाई ने कम समय में खुद को भाजपा के सबसे चर्चित नेताओं में शामिल कर लिया. उनकी आक्रामक शैली, जनसभाओं में प्रभावी भाषण और संगठनात्मक क्षमता ने उन्हें अलग पहचान दिलाई.
शाह से मुलाकात पर टिकी सबकी नजरें
फिलहाल सबकी नजरें भाजपा नेतृत्व और अन्नामलाई के बीच होने वाली आगे की बातचीत पर टिकी हैं. चाहे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर नई जिम्मेदारी मिले या वे किसी नए राजनीतिक प्रयोग की ओर बढ़ें, इतना तय है कि उनका अगला कदम तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा असर छोड़ सकता है. आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि अन्नामलाई भाजपा के साथ नई भूमिका में दिखाई देंगे या फिर राज्य की राजनीति में कोई नया अध्याय शुरू करेंगे.
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Explainer: कार्यकाल के बीच इस्तीफा देने वाला सिद्धारमैया इकलौते CM नहीं, कर्नाटक में इतने मुख्यमंत्रियों ने बीच में ही छोड़ा पद
Explainer: कर्नाटक के कार्यवाहक मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. उनकी जगह कांग्रेस के ही डीके शिवकुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री चुन लिए गए हैं. जल्द ही वे सीएम पद की शपथ लेंगे. खास बात है कि सिद्धारमैया प्रदेश के इकलौते मुख्यमंत्री नहीं हैं, जिन्हें अपने पद से बीच कार्यकाल में ही इस्तीफा देना पड़ गया है. कर्नाटक में आजादी के बाद से अब तक 23 मुख्यमंत्री रहे हैं और उनमें से महज तीन मुख्यमंत्री ही अपने 5 साल के कार्यकाल को पूरा कर सके हैं.
प्रदेश में 19 मुख्यमंत्री ऐसे रहे हैं, जिनको बीच कार्यकाल में ही अपने पद से इस्तीफा देना पड़ गया है. आइये जानते हैं उन्हीं मुख्यमंत्रियों के बारे में…
- के. चेंगलराय रेड्डी (1947–1952): 1952 के पहले आम चुनाव होने के कारण पद छोड़ा.
- केंगल हनुमंथैया (1952–1956): पार्टी में आंतरिक कलह और दबाव के कारण इस्तीफा देना पड़ा. (INC, अगस्त 1956)
- कदिदल मंजप्पा (1956): राज्य पुनर्गठन (मैसूर राज्य का एकीकरण) के कारण थोड़े समय के लिए ही कार्यभार संभाला था.
- एस. निजालिंगप्पा (1956–1958): पहले कार्यकाल के दौरान, लिंगायत विधायकों के विद्रोह के कारण पार्टी आलाकमान के निर्देश पर इस्तीफा देना पड़ा.
- बी.डी. जत्ती (1958–1962): कार्यकाल पूरा होने से पहले ही नेतृत्व बदल दिया गया.
- एस.आर. कंठी (1962): बहुत कम समय के लिए कार्यवाहक मुख्यमंत्री रहे.
- वीरेंद्र पाटिल (1968–1971): 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद विधायकों द्वारा पाला बदलने और इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार के दबाव में इस्तीफा देना पड़ा.
- डी. देवराज उर्स (1978–1980): अपने दूसरे कार्यकाल में इंदिरा गांधी से मतभेद के कारण पार्टी छोड़ा था, जिस वजह से इस्तीफा देना पड़ा.
- आर. गुंडु राव (1980–1983): तत्कालीन आलाकमान के फैसलों और आंतरिक गुटबाजी के वजह से सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा.
- रामकृष्ण हेगड़े (1983–1988): हेगड़े के दूसरे कार्यकाल के दौरान 'टेलीफोन टैपिंग' विवाद में घिरने और उच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया.
- एस.आर. बोम्मई (1988–1989): मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों और विधायकों द्वारा बगावत करने से सरकार अल्पमत में आ गई और राष्ट्रपति शासन लग गया.
- वीरेंद्र पाटिल (1989–1990): खराब स्वास्थ्य और कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर पद छोड़ना पड़ा.
- एस. बंगारप्पा (1990–1992): कावेरी जल विवाद को संभालने में कथित विफलता और 'क्लासिक कंप्यूटर' घोटाले में नाम आने पर आलाकमान ने उन्हें हटा दिया.
- एम. वीरप्पा मोइली (1992–1994): पार्टी के अंदर असंतुष्ट विधायकों और गुटबाजी के दबाव में सीएम पद छोड़ना पड़ा.
- एच.डी. देवगौड़ा (1994–1996): यूनाइटेड फ्रंट द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए चुने जाने के वजह से सीएम पद से इस्तीफा दिया.
- जे.एच. पटेल (1996–1999): उनकी जनता दल सरकार के भीतर टूट और विधायकों के विरोध के कारण इस्तीफा दिया.
- एस.एम. कृष्णा (1999–2004): पूर्ण कार्यकाल पूरा करने के करीब थे, लेकिन चुनाव पूर्व कराने के लिए समय से पहले ही विधानसभा भंग कर दी.
- एन. धर्म सिंह (2004–2006): गठबंधन सरकार (कांग्रेस-जेडीएस) से जेडीएस के कई विधायकों द्वारा समर्थन वापस लेने के कारण सरकार गिर गई.
- एच.डी. कुमारसंवमी (2006–2007 - पहला कार्यकाल): गठबंधन के तहत भाजपा को सत्ता सौंपने के वादे से मुकरने के बाद समर्थन वापस लिए जाने से सरकार गिरी गई.
- बी.एस. येदियुरप्पा (2007 - पहला कार्यकाल): गठबंधन के साथी जेडीएस द्वारा समर्थन वापस लेने पर मात्र 7 दिनों में इस्तीफा देना पड़ गया.
- बी.एस. येदियुरप्पा (2008–2011 - दूसरा कार्यकाल): अवैध खनन और भूमि घोटालों में लोकायुक्त की रिपोर्ट आने पर पार्टी आलाकमान के निर्देश पर इस्तीफा दे दिया.
- डी.वी. सदानंद गौड़ा (2011–2012): येदियुरप्पा गुट द्वारा दबाव बनाए जाने की वजह से मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ गया.
- जगदीश शेट्टार (2012–2013): पार्टी के अंदर आंतरिक विवाद और आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुए नेतृत्व परिवर्तन हो गया.
- बी.एस. येदियुरप्पा (2018 - तीसरा कार्यकाल): विधानसभा में बहुमत साबित करने में असमर्थ रहने के कारण मात्र दो दिन में इस्तीफा देना पड़ गया.
- एच.डी. कुमारस्वामी (2018–2019 - दूसरा कार्यकाल): 'ऑपरेशन लोटस' के तहत 17 विधायकों के इस्तीफे के बाद सरकार बहुमत खो बैठी.
- बी.एस. येदियुरप्पा (2019–2021 - चौथा कार्यकाल): अपनी सरकार के दो वर्ष पूरे करने के अवसर पर, बढ़ती उम्र और आलाकमान के साथ मतभेदों के चलते इस्तीफा दिया.
- बासवराज बोम्मई (2021–2023): 2023 के विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार हुई, जिस वजह से सीएम पद छोड़ना पड़ा.
- सिद्धारमैया (2023–2026 - दूसरा कार्यकाल): कांग्रेस आलाकमान के साथ सत्ता के हस्तांतरण की वजह से देना पड़ा इस्तीफा.
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इन तीन मुख्यमंत्रियों ने ही पूरा किया अपना कार्यकाल
कर्नाटक में सिर्फ तीन ही मुख्यमंत्री ऐसे हैं, जिन्होंने अपने पांच साल का कार्यालय पूरा किया है. तीन मुख्यमंत्रियों, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया है, उनमें एस. निजलिंगप्पा, डी. देवराज उर्स और सिद्धारमैया शामिल हैं.
एस. निजलिंगप्पा साल 1962 से लेकर साल 1968 तक प्रदेश के सीएम रहे थे. निजलिंगप्पा प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. वहीं. डी देवराज उर्स साल 1972 से लेकर साल 1977 तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं. वहीं, हाल में सीएम पद से इस्तीफा देने वाले सिद्धारमैया ने साल 2013 से लेकर 2018 के बीच भी प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. वे कर्नाटक के तीसरे और 2026 तक आखिरी सीएम रहे हैं, जिन्होंने पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा किया है. खास बात है कि कार्यकाल पूरा करने वाले तीनों मुख्यमंत्री कांग्रेस से ही रहे हैं.
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कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बनेंगे डीके शिवकुमार
कर्नाटक की राजनीति से जुड़ा एक खास अपडेट ये है कि डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया है. विधायक दल के नेता के रूप में डीके शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव पेश किया गया था, जिसे मंजूर कर लिया गया है. खास बात है कि शिवकुमार का नाम किसी और ने नहीं बल्कि खुद सिद्धारमैया ने रखा था. खास बात है कि हाल में विधायक दल की मीटिंग हुई थी. मीटिंग में इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया गया है. ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के जनरल सेक्रेटरी केसी वेणुगोपाल ने डीके शिवकुमार को विधायक दल का नेता चुने जाने का ऐलान किया है. अब जल्द ही वे सीएम पद की शपथ ले सकते हैं.
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