बालोद कलेक्ट्रेट में आदिवासी समाज का उग्र प्रदर्शन, बाबा बालक दास मामले पर जलाया चूल्हा
बालोद जिले में सोमवार को उस समय हालात तनावपूर्ण हो गए जब सर्व आदिवासी समाज के सैकड़ों लोग अपनी मांगों को लेकर कलेक्ट्रेट पहुंच गए। प्रदर्शनकारी डौंडी लोहारा विकासखंड के तुएगोंदी रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र में कथित अतिक्रमण के मामले में कार्रवाई की मांग कर रहे थे। बड़ी संख्या में पहुंचे लोगों ने प्रशासन की ओर से लगाए गए ट्रिपल लेयर बैरिकेड्स को पार किया और कलेक्ट्रेट परिसर में धरने पर बैठ गए।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनकी शिकायतों और ग्राम सभा के फैसलों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। कलेक्टर से मुलाकात नहीं होने पर लोगों का आक्रोश बढ़ता गया। देर शाम तक जब कोई समाधान नहीं निकला तो प्रदर्शनकारियों ने परिसर में ही चूल्हा जलाकर भोजन बनाना शुरू कर दिया। इस अनोखे विरोध प्रदर्शन ने पूरे जिले का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
बाबा बालक दास विवाद और वन भूमि अतिक्रमण का मामला
प्रदर्शन की मुख्य वजह तुएगोंदी क्षेत्र में कथित अतिक्रमण को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद है। सर्व आदिवासी समाज के नेताओं का आरोप है कि रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र में निर्माण कार्य किया जा रहा है और इसकी जानकारी कई बार प्रशासन को दी जा चुकी है। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि वर्ष 2019 से इस मुद्दे को विभिन्न मंचों पर उठाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
समाज के प्रमुख तुकाराम कोर्राम ने आरोप लगाया कि संबंधित क्षेत्र में करोड़ों रुपये की लागत से निर्माण कराया जा रहा है, जबकि वह भूमि वन क्षेत्र के दायरे में आती है। उन्होंने यह भी कहा कि मामले में शिकायत और कानूनी प्रक्रिया होने के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि प्रशासन की ओर से इस मामले पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यही कारण है कि आदिवासी समाज ने इसे अपने अधिकारों और जमीन से जुड़े मुद्दे के रूप में देखते हुए बड़े आंदोलन का रूप दिया है। स्थानीय लोगों का मानना है कि वन क्षेत्रों से जुड़े विवादों का समय पर समाधान नहीं होने से ऐसे आंदोलन लगातार बढ़ रहे हैं।
पुलिस-प्रदर्शनकारी आमने-सामने
दिनभर चले प्रदर्शन के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब हालात नियंत्रण से बाहर होते दिखाई दिए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि एक पुलिस अधिकारी ने उनके जल रहे चूल्हे में पानी डाल दिया, जिससे लोगों में नाराजगी बढ़ गई। इसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। कुछ जगह महिलाओं और पुलिसकर्मियों के बीच धक्का-मुक्की जैसी स्थिति भी देखने को मिली।
मौके पर मौजूद अधिकारियों ने स्थिति को संभालने की कोशिश की, लेकिन भीड़ के बढ़ते दबाव को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा बल बुलाना पड़ा। हालात को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। स्थानीय लोगों के अनुसार बालोद जिले में किसी प्रदर्शन के दौरान पहली बार वाटर कैनन का उपयोग किया गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन और आदिवासी समाज के बीच संवाद की जरूरत को फिर से सामने ला दिया है। फिलहाल प्रदर्शनकारियों की मांग है कि विवादित मामले की निष्पक्ष जांच हो और उनकी शिकायतों पर जल्द कार्रवाई की जाए। वहीं प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठा रहा है।
अल नीनो की आहट से बारिश पर मंडराया संकट! जानिए क्या भारत पर भी पड़ेगा असर? पढ़ें खबर
प्रशांत महासागर की गहराइयों से उठ रही एक अदृश्य चुनौती अब पूरी दुनिया के मौसम का मिजाज बदलने और भारत पर कहर बरपाने को तैयार खड़ी है। दरअसल यह कोई साधारण मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि ‘अल नीनो’ नामक वह प्राकृतिक घटना है, जिसकी आहट मात्र से ही बाढ़, सूखे और भयंकर लू का तांडव मचने की आशंका गहरा जाती है।
क्या होता है अल नीनो?
दरअसल मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का समय-समय पर गर्म होना ही अल नीनो कहलाता है। यह गर्माहट इतनी प्रचंड होती है कि रेन सिस्टम में होने वाला मामूली सा डिस्टरबेंस भी पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेता है। अमेरिकी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के मौसम विशेषज्ञों ने इस बार अटलांटिक तूफान को सामान्य से शांत रहने का अनुमान लगाया है, जिसके पीछे अल नीनो का ही हाथ बताया जा रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो सामान्य से कम तूफानी गतिविधि की 55 प्रतिशत संभावना है, जबकि सामान्य से अधिक गतिविधि की संभावना महज 10 प्रतिशत ही है।
क्या इस बार अल नीनो का असर दिखाई देगा?
वहीं अटलांटिक तूफान का मौसम जून की शुरुआत से 30 नवंबर तक चलता है, जिसमें तूफानी गतिविधियां सितंबर के मध्य में अपनी चरम पर होती हैं। लेकिन अल नीनो के चलते इस बार अटलांटिक में तूफानों का जोर कुछ कम रह सकता है। हालांकि, प्रशांत महासागर में पैदा होने वाली यह मौसमी घटना दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़, सूखे और लू की तीव्रता को बढ़ाने का काम करती है। अपने सक्रिय चरण के दौरान यह वैश्विक औसत तापमान को भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ा देती है, जिससे हर तरफ हाहाकार मचने का खतरा रहता है।
‘ला नीना’ क्या है?
दरअसल अल नीनो की घटनाएं आमतौर पर हर 2 से 7 साल में एक बार दस्तक देती हैं और इनका प्रभाव 9 से 12 महीने तक कायम रहता है। इसके विपरीत ‘ला नीना’ है, जिसका अर्थ प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से ठंडा होना है। अल नीनो के दौरान हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती हैं, जिससे प्रशांत महासागर का गर्म पानी वापस पूर्व की ओर अमेरिका के तटों की ओर बहने लगता है। यह अटलांटिक तूफानों की गतिविधियों को कम करता है, जबकि प्रशांत महासागर में तूफानों की गतिविधियों को बढ़ा देता है। एक तरफ राहत तो दूसरी तरफ आफत का यह खेल प्रकृति का ही अजब करिश्मा है।
भले ही अल नीनो की शुरुआत प्रशांत महासागर में होती हो, लेकिन इसका प्रभाव पूरी दुनिया में किसी भूचाल से कम नहीं होता। भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी और मध्य अफ्रीका, और अमेजन बेसिन जैसे क्षेत्रों को भीषण गर्मी और जंगलों में लगने वाली आग का सामना करना पड़ेगा। अमेरिका के कुछ हिस्सों, खासकर दक्षिणी भाग में भारी बारिश और बाढ़ तबाही मचा सकती है, जबकि उत्तरी अमेरिका में भी असहनीय गर्मी का प्रकोप देखने को मिल सकता है।
भारत पर अल नीनो का सीधा और भयंकर असर होगा। देश को लंबी गर्मी के थपेड़ों का सामना करना पड़ेगा। मॉनसून के मौसम में सामान्य से कम बारिश होने की प्रबल संभावना है, जिसका सीधा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ेगा। फसलों की पैदावार कम हो जाएगी और इसका असर सीधे हमारी थाली पर पड़ेगा, जब खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छूने लगेंगे। जलवायु परिवर्तन के चलते भारत में पहले ही तापमान बढ़ रहा है और अल नीनो का आगमन इस आग में घी डालने का काम करेगा। ऐसे में आने वाले महीनों में हमें प्रकृति के इस क्रूर चक्र से निपटने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ेगा, वरना मुंह की खानी पड़ सकती है।



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