डायन बताकर हत्या जैसी कुप्रथाएं रहीं तो लोकतंत्र नहीं टिकेगा:सुप्रीम कोर्ट ने महिला की हत्या करने वाले की उम्रकैद बरकरार रखी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डायन बताकर हिंसा जैसी कुप्रथाएं कानून के राज और संवैधानिक नैतिकता से बचती रहेंगी तो संवैधानिक लोकतंत्र नहीं टिक सकता। कोर्ट ने ओडिशा में 1998 में एक महिला को डायन बताकर घर से बाहर खींचने और पीटने वाले व्यक्ति की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। इस हमले में महिला की मौत हो गई थी। आरोपी ने एक अन्य आरोपी के साथ मिलकर महिला पर हमला किया था। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने यह फैसला सुनाया। बेंच ने कहा कि इस मामले में महिला की बेटी ने अपनी मां को बेहद क्रूर तरीके से मारे जाते देखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कुप्रथा पर जताई चिंता बेंच ने कहा, ‘‘मामले को खत्म करते हुए हम कहना चाहते हैं कि इस मामले के तथ्यों ने कोर्ट की अंतरात्मा को गहराई से झकझोर दिया है। एक असहाय महिला को डायन बताकर उसकी हत्या कर दी गई। यह सोचने वाली बात है कि उस बेटी पर इसका क्या असर पड़ा होगा, जिसने अपनी मां को सबसे क्रूर तरीके से मारे जाते देखा।’’ कोर्ट ने कहा कि भारत का संविधान समानता, भाईचारे और वैज्ञानिक सोच के सिद्धांतों पर आधारित समाज की कल्पना करता है। महिलाओं के खिलाफ होने वाली किसी भी अपमानजनक प्रथा को खत्म किया जाना चाहिए। बेंच ने कहा कि इसके बावजूद समाज के कुछ हिस्सों में डायन बताकर हिंसा जैसी कुप्रथाएं अब भी जारी हैं। ‘‘हमारे जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में ऐसी अपमानजनक कुप्रथाएं कानून के राज और संवैधानिक नैतिकता से बचती रहें, तो लोकतंत्र टिक नहीं सकता।’’ कोर्ट ने कहा, ‘‘हमें पूरी उम्मीद है कि यह मामला गंभीर याद दिलाएगा कि अंधविश्वास और तर्कहीन मान्यताओं पर हमेशा न्याय की जीत होनी चाहिए।’’ बेंच ने डायन बताकर हिंसा के असर बताए बेंच ने कहा कि यह सही है कि डायन बताकर हिंसा की समस्या अब भी समाज के कुछ हिस्सों में बनी हुई है। इन जगहों पर पूर्वाग्रह, अंधविश्वास और तर्कहीन डर कानून के राज और संवैधानिक नैतिकता पर हावी हो जाते हैं। कोर्ट ने कहा, ‘‘डायन बताकर हिंसा की क्रूरता केवल हत्या तक सीमित नहीं रहती। इसमें ज्यादातर महिलाओं को यातना, मारपीट, यौन हिंसा और समाज से अलग किए जाने का सामना करना पड़ता है।’’ बेंच के मुताबिक, ऐसी स्थिति में अंधविश्वास और डर को प्राथमिकता दी जाती है। इसके चलते कमजोर महिलाएं सामूहिक hostility का शिकार बनती हैं। कोर्ट ने कहा, ‘‘कई बार बेहद मुश्किल हालात में उस महिला को दोषी ठहराना आसान रास्ता बन जाता है, जिसने वह काम किया ही नहीं होता। इससे समाज में गहरे बैठे उस पूर्वाग्रह का पता चलता है, जो समाधान खोजने के बजाय किसी को बलि का बकरा बनाना चाहता है।’’ बेंच ने कहा, ‘‘ऐसे हालात में तर्क को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि सामूहिक तर्कहीनता के खिलाफ तर्क ही एकमात्र मजबूत सुरक्षा है।’’ कोर्ट ने अपने फैसले में डॉ. बीआर आंबेडकर को भी उद्धृत किया। उन्होंने कहा था, ‘‘न्यायपूर्ण समाज वह है, जिसमें सम्मान की बढ़ती भावना और तिरस्कार की घटती भावना मिलकर एक संवेदनशील समाज का निर्माण करती है।’’ बेटी की गवाही के आधार पर सजा बरकरार सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला बालकु ओराम की अपील पर सुनाया। उसने सितंबर 2022 के ओडिशा हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की ओर से आरोपी को सुनाई गई उम्रकैद और दोषसिद्धि को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए आरोपी की दोषसिद्धि और सजा की पुष्टि कर दी। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ प्रत्यक्ष सबूत मजबूत हैं। इससे साफ साबित होता है कि उसने सह-आरोपी के साथ मिलकर महिला की हत्या की थी। महिला पर एक लड़की की मौत डायन विद्या से कराने का आरोप लगाया गया था। फरवरी 1998 में लड़की की मौत के बाद हुआ हमला अभियोजन के मुताबिक, सुंदरगढ़ जिले के एक गांव में फरवरी 1998 में एक लड़की की मौत हुई थी। उसके परिवार के एक सदस्य ने दावा किया था कि लड़की की मौत पीड़ित महिला की डायन विद्या के कारण हुई। अभियोजन ने कहा कि इसके बाद आरोपी और सह-आरोपी पीड़ित महिला को उसके घर से बाहर खींचकर लाए। दोनों ने उस पर हमला किया, जिससे उसकी मौत हो गई। घटना महिला की बेटी ने देखी थी। पीड़ित महिला की बेटी की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी और सह-आरोपी को हत्या समेत कई अपराधों में दोषी ठहराया था। बाद में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘‘जब किसी मामले में एकमात्र चश्मदीद की गवाही के रूप में प्रत्यक्ष सबूत मौजूद हो, तो केवल उसी के आधार पर दोषी ठहराने में कोई कानूनी रुकावट नहीं है। गवाहों की संख्या नहीं, उनकी गवाही की गुणवत्ता मायने रखती है।’’ कोर्ट ने कहा कि पीड़ित महिला की बेटी ने हमले के तरीके और इस्तेमाल किए गए हथियारों के बारे में जो बताया, वह लगातार एक जैसा रहा। उसकी गवाही इतनी विश्वसनीय थी कि आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखी जा सके। बेंच ने कहा कि किसी करीबी रिश्तेदार को केवल रिश्ते के आधार पर पक्षपाती गवाह नहीं माना जा सकता। ऐसा रिश्तेदार स्वाभाविक गवाह भी हो सकता है।
बांग्लादेश राष्ट्रपति चुनाव में बीएनपी महासचिव फखरुल की जीत तय:ढाका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ा, वहीं लेक्चरर बने; खालिदा सरकार में मंत्री रह चुके
बांग्लादेश की रूलिंग पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम अलमगीर अब देश के अगले राष्ट्रपति बनने की राह पर हैं। BNP ने गुरुवार को राष्ट्रपति चुनाव के लिए उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया है। उन्होंने 1960 के दशक में ढाका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी और 1972 में वे ढाका कॉलेज में लेक्चरर बने। 2001 में खालिदा जिया के नेतृत्व वाली BNP सरकार में वे पहले कृषि राज्य मंत्री रहे। बाद में उन्होंने नागरिक उड्डयन और पर्यटन राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली। BNP के महासचिव पद से इस्तीफा दिया उम्मीदवारी मिलते ही 78 साल के फखरुल ने BNP के महासचिव पद और पार्टी की स्थायी समिति से इस्तीफा दे दिया। गुरुवार को ही उनका नामांकन पत्र चुनाव आयोग में जमा कर दिया गया। BNP के स्थायी समिति सदस्य अब्दुल मोईन खान के नेतृत्व में पार्टी का प्रतिनिधिमंडल ढाका के अगरगांव स्थित चुनाव आयोग पहुंचा और मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन को नामांकन पत्र सौंपा। 20 अगस्त को होगा राष्ट्रपति चुनाव बांग्लादेश में राष्ट्रपति को जनता सीधे नहीं चुनती। संसद के सदस्य राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। राष्ट्रपति चुनाव के लिए 20 अगस्त को मतदान होगा। फरवरी में हुए आम चुनाव में BNP को संसद में दो-तिहाई बहुमत मिला था। इसलिए फखरुल की जीत लगभग तय मानी जा रही है। पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 24 जुलाई को स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पद से इस्तीफा दे दिया था। उनका कार्यकाल अभी करीब दो साल बाकी था। फिलहाल संसद के स्पीकर हाफिज उद्दीन अहमद कार्यवाहक राष्ट्रपति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। फखरुल चुनाव जीतते हैं तो वे बांग्लादेश के 23वें राष्ट्रपति होंगे। छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर फखरुल का राजनीतिक सफर करीब छह दशक पुराना है। 1960 के दशक में ढाका यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उन्होंने छात्र राजनीति शुरू की। वे उस समय ईस्ट पाकिस्तान स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े थे। 1969 में राष्ट्रपति अयूब खान के खिलाफ बड़े जन आंदोलन के दौरान वे छात्र संगठन की ढाका यूनिवर्सिटी इकाई के अध्यक्ष थे। राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तार भी किया गया और जेल जाना पड़ा। हालांकि, छात्र राजनीति के बाद वे तुरंत सक्रिय राजनीति में नहीं आए। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षक के तौर पर करियर शुरू किया। 1972 में वे ढाका कॉलेज में लेक्चरर बने। बाद में कई सरकारी कॉलेजों में भी पढ़ाया। सरकारी नौकरी भी की फखरुल ने सरकारी व्यवस्था में भी काम किया। वे इंस्पेक्शन एंड ऑडिट निदेशालय में डिप्टी डायरेक्टर रहे। इसके अलावा बांग्लादेश नेशनल कमीशन फॉर यूनेस्को से भी जुड़े रहे। 1980 के दशक की शुरुआत में उन्होंने तत्कालीन उपप्रधानमंत्री एसए बारी के निजी सचिव के तौर पर भी काम किया। लेकिन कुछ साल बाद उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति में आने का फैसला किया। 1986 में राजनीति में आए फखरुल ने 1986 में सरकारी नौकरी छोड़ दी। दो साल बाद 1988 में वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ठाकुरगांव नगरपालिका के चेयरमैन चुने गए। 1990 के दशक की शुरुआत में एरशाद विरोधी आंदोलन के दौरान वे BNP में शामिल हुए। 1992 में उन्हें BNP की ठाकुरगांव जिला इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। यहीं से उनकी स्थानीय राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचने की शुरुआत हुई। 2001 में सांसद और मंत्री बने 2001 के आम चुनाव में फखरुल ठाकुरगांव-1 सीट से BNP के उम्मीदवार के तौर पर सांसद चुने गए। खालिदा जिया के नेतृत्व वाली BNP सरकार में उन्हें पहले कृषि राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में उन्होंने नागरिक उड्डयन और पर्यटन राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली। 2008 के चुनाव के बाद BNP विपक्ष में चली गई। इसके बाद पार्टी में फखरुल की भूमिका लगातार बढ़ती गई। करीब एक दशक तक BNP के महासचिव रहे 2009 में BNP की राष्ट्रीय परिषद ने फखरुल को वरिष्ठ संयुक्त महासचिव बनाया। 2011 में वे पार्टी के कार्यवाहक महासचिव बने। करीब पांच साल बाद 30 मार्च 2016 को उन्हें आधिकारिक तौर पर BNP का महासचिव नियुक्त किया गया। इसके बाद करीब एक दशक तक वे पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरों में रहे। खालिदा जिया की गिरफ्तारी से लेकर सरकार विरोधी प्रदर्शनों और चुनावों को लेकर हुए राजनीतिक टकराव तक, फखरुल लगभग हर बड़े मुद्दे पर BNP की तरफ से सामने रहे। वे मीडिया के सामने पार्टी का पक्ष रखने वाले प्रमुख नेताओं में भी शामिल रहे। इस दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और कुछ समय जेल में भी बिताना पड़ा। दूसरे कई BNP नेताओं की तुलना में उनकी राजनीतिक भाषा ज्यादा संयमित रही है। लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण वे पार्टी के अनुभवी नेताओं और प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। राष्ट्रपति पद के लिए पार्टी से अलग हुए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने राष्ट्रपति पद के लिए फखरुल के नाम का प्रस्ताव रखा। स्थायी समिति से मंजूरी मिलने के बाद फखरुल ने महासचिव और समिति के सदस्य पद से इस्तीफा दे दिया। बांग्लादेश के संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति का पद सक्रिय पार्टी राजनीति से ऊपर होता है। इसलिए उनके पार्टी पदों से इस्तीफे को राष्ट्रपति पद की संभावित नई भूमिका से जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्ष ने भी उतारा उम्मीदवार राष्ट्रपति चुनाव में बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने भी अपना उम्मीदवार उतारा है। जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन के नेता और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद ने अपना नामांकन पत्र जमा कर दिया है। हालांकि, संसद में BNP के दो-तिहाई बहुमत के कारण फखरुल की जीत की संभावना काफी मजबूत मानी जा रही है। छात्र नेता से राष्ट्रपति पद तक का सफर मिर्जा फखरुल इस्लाम अलमगीर का राजनीतिक सफर कई अलग-अलग भूमिकाओं से होकर गुजरा है। छात्र नेता से शुरुआत करने के बाद वे शिक्षक बने, सरकारी अधिकारी के तौर पर काम किया और नगरपालिका अध्यक्ष रहे। इसके बाद सांसद और राज्य मंत्री बने। फिर करीब एक दशक तक BNP के महासचिव के तौर पर पार्टी की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे। अब वे बांग्लादेश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की ओर बढ़ रहे हैं। अगर 20 अगस्त को संसद में उन्हें जीत मिलती है, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी की राजनीति से ऊपर उठकर पूरे देश के संवैधानिक प्रमुख की भूमिका निभाने की होगी।
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