निपुण भारत मिशन को मिलेगी नई गति, यूपी सरकार जिला समन्वयकों को देगी विशेष ट्रेनिंग
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार अब निपुण भारत मिशन और गुणवत्ता शिक्षा अभियान को जमीनी स्तर पर और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है. इसी क्रम में राज्य स्तर पर कार्यरत जिला समन्वयक (निपुण भारत मिशन) एवं जिला समन्वयक (प्रशिक्षण) के लिए 1 और 2 जून को राज्य स्तरीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा.
75 जनपदों से जिला समन्वयक प्रतिभाग करेंगे
इसके लिए सभी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों को संबंधित जिला समन्वयकों की प्रशिक्षण में अनिवार्य सहभागिता सुनिश्चित कराए जाने संबंधी निर्देश दिए गए हैं. राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी), लखनऊ में आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रदेश के सभी 75 जनपदों से जिला समन्वयक प्रतिभाग करेंगे.
सुदृढ़ करने का व्यापक अभियान है
प्रशिक्षण का उद्देश्य निपुण भारत मिशन और गुणवत्ता शिक्षा संवर्धन से जुड़ी गतिविधियों के प्रभावी क्रियान्वयन, अनुश्रवण और मूल्यांकन व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाना है. निपुण भारत मिशन एक शैक्षिक कार्यक्रम के साथ-साथ बच्चों की सीखने की बुनियादी क्षमता को सुदृढ़ करने का व्यापक अभियान है.
योगी सरकार ने पिछले एक दशक में परिषदीय शिक्षा के ढांचे, तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था और शिक्षण पद्धतियों में व्यापक सुधार किए हैं. ऑपरेशन कायाकल्प, स्मार्ट क्लास, डिजिटल मॉनिटरिंग, ई-कंटेंट और निपुण भारत मिशन जैसे अभियानों के माध्यम से परिषदीय शिक्षा व्यवस्था में बड़े परिवर्तन लाए गए हैं. अब जिला समन्वयकों के विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से इन सुधारों को विद्यालय स्तर तक प्रभावी ढंग से लागू करने और शिक्षा व्यवस्था को अधिक परिणाममुखी बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है.
प्रशिक्षण 1 जून को होगा
प्रशिक्षण कार्यक्रम को दो बैचों में आयोजित किया जाएगा. पहले बैच का प्रशिक्षण 1 जून को होगा, जिसमें आगरा, अलीगढ़, अयोध्या, आजमगढ़, बरेली, बस्ती, देवीपाटन, गोरखपुर और चित्रकूट मंडल के जिलों के प्रतिभागी शामिल होंगे. वहीं दूसरे बैच का आयोजन 2 जून को किया जाएगा, जिसमें झांसी, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, मिर्जापुर, मुरादाबाद, प्रयागराज, सहारनपुर और वाराणसी मंडल के जिला समन्वयक प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे.
परिणामों में वास्तविक सुधार दिखाई देगा
प्रदेश सरकार का मानना है कि जब जिला स्तर पर अकादमिक मॉनिटरिंग और प्रशिक्षण व्यवस्था मजबूत होगी, तभी विद्यालयों में सीखने के परिणामों में वास्तविक सुधार दिखाई देगा. इसी सोच के तहत प्रशिक्षण के माध्यम से जिला समन्वयकों को अकादमिक एवं प्रशासनिक अनुश्रवण, डेटा आधारित योजना एवं निर्णय निर्माण, प्रभावी समीक्षा प्रक्रियाओं, शिक्षक सहयोग तंत्र तथा सीखने के परिणामों (एसएलओज) में सुधार हेतु आवश्यक प्रक्रियाओं और प्रणालियों पर प्रशिक्षित किया जाएगा.
इसके साथ ही जिला समन्वयकों को निपुण भारत मिशन के लक्ष्यों, आधारभूत साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान (एफएलएन), गुणवत्ता मूल्यांकन, शिक्षकों के क्षमता संवर्धन, गतिविधि आधारित शिक्षण तथा विद्यालयों में गुणवत्ता शिक्षा संवर्धन से जुड़े विभिन्न विषयों पर भी प्रशिक्षण दिया जाएगा और जिला स्तर पर बेहतर योजना, प्रभावी अनुश्रवण और शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण सीखने को बढ़ावा दिया जाएगा.
स्रोत-आईएएनएस
योगी सरकार के प्रयासों का असर, पांच साल तक के बच्चों की मृत्यु दर में आई कमी
योगी सरकार के प्रयासों से प्रदेश में नवजात से पांच साल तक उम्र वाले बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है. आंकड़ों में आया यह सुधार हजारों बच्चों के सुरक्षित जीवन, लाखों परिवारों की उम्मीदों और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ते विश्वास की कहानी दर्शाता है. साथ ही जन्म के तुरंत बाद होने वाली मृत्यु दर में कमी लाने की चुनौती भी पेश करता है.
मृत्यु दर में कमी दर्ज की गई
सेंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की ताजा रिपोर्ट में नवजात से लेकर पांच साल तक उम्र वाले बच्चों की मृत्यु दर में कमी दर्ज की गई है. वर्ष 2023 की तुलना में 2024 में नवजात मृत्यु दर (एनएमआर) 26 से 25, शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) 37 से 35 और पांच साल तक उम्र वाले बच्चों की मृत्युदर 42 से 41 रह गई है. यह सर्वे प्रति 1000 बच्चों के हिसाब से किया गया है.
गुणवत्ता को बेहतर बनाने की कोशिश
उत्तर प्रदेश का उन चुनिंदा राज्यों में शामिल होना, जहां बच्चों की मृत्यु दर में सभी आयु वर्गों में कमी आई है, सबके सामूहिक समर्पण, अथक परिश्रम और जमीनी स्तर पर निरंतर किए गए प्रयासों का प्रमाण है. यह रुझान उत्साहजनक हैं तो हमें यह भी याद दिलाते हैं कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में कमी की रफ्तार अभी भी उम्मीद से धीमी है और जन्म के तुरंत बाद होने वाली मृत्यु दर में खास बदलाव नहीं आया है. इससे साफ पता चलता है कि बच्चों की मृत्यु दर में कमी का अगला चरण प्रसव, डिलीवरी और जीवन के पहले 48 घंटों के दौरान दी जाने वाली देखभाल की गुणवत्ता को बेहतर बनाने पर बहुत ज्यादा निर्भर करेगा.
निःशुल्क दवाओं व नियमित टीकाकरण
किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ शालिनी त्रिपाठी के अनुसार प्रदेश में स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य कर्मचारियों के अपग्रेड होने से एनएमआर और आईएमआर में कमी आई है. बीते तीन-चार सालों में आयुष्मान आरोग्य मंदिर से लेकर जिला महिला अस्पताल के डाक्टरों व स्टाफ नर्स को लगातार प्रशिक्षित किया गया है. इसके अलावा नवजात को सांस लेने में दिक्कत होने पर लगाई जाने वाली सीपैप मशीन, कंगारू मदर केयर, मिल्क बैंक, निःशुल्क दवाओं व नियमित टीकाकरण भी शिशुओं की मृत्यु दर कम करने में सहायक साबित हुए हैं. इसके अलावा अस्पतालों में शुरू हुए मदर न्यूबार्न केयर यूनिट (एमएनसीयू), जिसमें प्रसव के बाद मां-बच्चे को एक साथ वार्ड में ठहराया जाता है, से भी बड़ा लाभ हो रहा है.
प्रक्रियाओं को मजबूत करने में काफी मदद मिली
वीरांगना अवंती बाई महिला अस्पताल की स्टाफ नर्स डेजी रानी ने बताया कि नर्सों को नवजात शिशु की देखभाल पर नियमित रूप से साप्ताहिक वर्चुअल लर्निंग सेशन और समय-समय पर आमने-सामने रिफ्रेशर ट्रेनिंग दी जा रही है. इन ट्रेनिंग से उन्हें नवजात शिशु के खतरे के लक्षणों को पहचानने, समय पर रेफरल प्रोटोकॉल का पालन करने और जन्म के समय पुनर्जीवन प्रक्रियाओं को मजबूत करने में काफी मदद मिली है.
वीरांगना अवंती बाई अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान ने बताया कि बहुत से बच्चों की मौत संक्रमण व अस्वच्छता के कारण भी हो जाती थी. अब अस्पतालों में स्वच्छता व बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है. स्टाफ को प्रशिक्षित किया जाता है कि शिशु के पास आने से पहले डाक्टर, नर्स के हाथ साफ हों, प्रसूता का डिलिवरी क्षेत्र साफ हो, बच्चे को लपेटने वाला कपड़ा साफ हो, बच्चे की नाल काटने वाला उपकरण व नाल में बांधी जाने वाली क्लिप स्वच्छ हो. अस्पतालों में स्वच्छता व संक्रमण कम होना भी शिशु मृत्यु दर कम होने की एक वजह है.
स्रोत-आईएएनएस
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