पंजाब सरकार ने की ठेकेदारी व्यवस्था खत्म करने की रूपरेखा मंजूर, 65 हजार से अधिक आउटसोर्स कर्मचारी होंगे नियमित
Punjab News: पंजाब की भगवंत सिंह मान सरकार ने राज्य के हजारों कच्चे कर्मचारियों के जीवन में बड़ा बदलाव लाते हुए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. राज्य कैबिनेट की ताजा बैठक में दशकों पुरानी और शोषणकारी मानी जाने वाली ठेकेदारी रोजगार व्यवस्था को हमेशा के लिए समाप्त करने का फैसला किया गया है.
65 हजार से अधिक आउटसोर्स कर्मचारियों को सीधा लाभ
सरकार के इस कदम से विभिन्न सरकारी विभागों में काम कर रहे 65 हजार से अधिक आउटसोर्स कर्मचारियों को सीधा लाभ मिलेगा. मुख्यमंत्री की अगुवाई में हुई इस बैठक में कर्मचारियों को नियमित रोजगार के रास्ते पर लाने वाले महत्वपूर्ण प्रस्तावों और दो नए विधेयकों को हरी झंडी दिखाई गई है. इस फैसले के बाद अब निजी ठेकेदारों या बिचौलियों की भूमिका खत्म हो जाएगी और कर्मचारियों का सीधा संबंध सरकार से स्थापित होगा.
ठेकेदारी प्रथा का अंत और नए विधेयकों को मंजूरी
कैबिनेट की बैठक में 'पंजाब स्टेट आउटसोर्स पर्सनल (ट्रांजिशन टू कॉन्ट्रैक्टुअल एंगेजमेंट) बिल, 2026' को मंजूरी दी गई है. इस नए कानून का मुख्य उद्देश्य निजी ठेकेदारों के माध्यम से काम कर रहे कर्मचारियों को सीधे सरकारी व्यवस्था के दायरे में लाना है. इसके साथ ही सरकार ने साल 2016 के पुराने कर्मचारी कल्याण अधिनियम को पूरी तरह से निरस्त करने का निर्णय लिया है, जो अब तक प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रहा था. मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि राज्य के हजारों युवाओं और कर्मचारियों ने बरसों तक बेहद कम वेतन पर सरकारी विभागों में अपनी सेवाएं दी हैं. अब समय आ गया है कि उनके अधिकारों की रक्षा की जाए और उन्हें बिचौलियों के चंगुल से मुक्त कराया जाए.
5 साल की सेवा पर सीधा सरकारी अनुबंध
सरकार की नई नीति के अनुसार, ग्रुप-सी और ग्रुप-डी के वे सभी आउटसोर्स कर्मचारी जिन्होंने लगातार पांच साल की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें सीधे सरकारी अनुबंध यानी कांट्रैक्ट के तहत लाया जाएगा. इसके अलावा, जो कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर काम करते हैं, उनके प्रति नरम रुख अपनाते हुए सरकार ने इस अवधि को कम करके केवल तीन साल निर्धारित किया है. नए नियमों के मुताबिक, सरकारी अनुबंध के तहत जब कोई कर्मचारी दस साल की सेवा पूरी कर लेगा, तो उसे विभाग में स्वीकृत रिक्त पदों के खिलाफ पूरी तरह से नियमित यानी पक्का करने पर गंभीरता से विचार किया जाएगा. इस पूरी योजना से राज्य के 51 अलग-अलग विभागों में कार्यरत कुल 65,048 कर्मचारियों को सीधा फायदा होने की उम्मीद है.
जोखिम वाले कामों में लगे कर्मियों को प्राथमिकता
मान सरकार ने इस नीति में उन कर्मचारियों को विशेष प्राथमिकता दी है जो विपरीत और खतरनाक परिस्थितियों में काम करते हैं. इनमें मुख्य रूप से फायर सर्विस के जांबाज कर्मी, बिजली विभाग के लाइनमैन, सीवर की सफाई करने वाले जांबाज, शहरी निकायों के सफाई कर्मचारी, कचरा प्रबंधन से जुड़े लोग और फील्ड में काम करने वाला शिकायत निवारण स्टाफ शामिल हैं. सरकार का मानना है कि इन लोगों ने समाज और व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए बहुत बड़ा योगदान दिया है, इसलिए इन्हें सबसे पहले सुरक्षा मिलनी चाहिए. आंकड़ों के लिहाज से देखें तो बिजली क्षेत्र के 15,753 कर्मचारी, स्थानीय निकाय विभाग के 8,436 कर्मचारी और स्कूल शिक्षा विभाग के 7,704 कर्मचारियों को इसका सीधा लाभ मिलेगा. इसके साथ ही स्वास्थ्य, परिवहन और कृषि विभागों के कर्मचारी भी इस दायरे में आएंगे.
वेतन और सुविधाओं की पूरी गारंटी
नई व्यवस्था लागू होने के बाद कर्मचारियों को कई अन्य बड़ी सहूलियतें भी मिलेंगी. अब ठेकेदार उनका वेतन नहीं रोक पाएंगे, क्योंकि कर्मचारियों का पूरा वेतन सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर किया जाएगा. इसके साथ ही महिला कर्मचारियों को प्रसूति लाभ मिलेगा और सभी कर्मचारियों को हर साल दस दिन की कैजुअल छुट्टी भी दी जाएगी. कर्मचारियों के कामकाज की निगरानी के लिए बायोमेट्रिक उपस्थिति और मानव संसाधन प्रबंधन प्रणाली को अनिवार्य किया गया है. सेवा सुरक्षा की गारंटी देते हुए सरकार ने प्रावधान किया है कि किसी भी कर्मचारी को बिना लिखित कारण बताए और बिना सुनवाई का मौका दिए नौकरी से बाहर नहीं निकाला जा सकेगा. सरकार ने स्पष्ट किया है कि कैबिनेट की मंजूरी के 45 दिनों के भीतर इस पूरे फैसले को जमीनी स्तर पर लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी.
विशेष अदालतों का गठन और डीए समीक्षा
कर्मचारियों से जुड़े फैसलों के अलावा कैबिनेट ने कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी मुहर लगाई है. संशोधित वेतन, पेंशन और महंगाई भत्ते से जुड़े पुराने बकाया मामलों की बारीकी से समीक्षा करने के लिए मंत्रियों की एक विशेष समिति का पुनर्गठन किया गया है. यह समिति लंबित वित्तीय मामलों का अध्ययन कर जल्द ही अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. वहीं, राज्य में भ्रष्टाचार के मामलों पर लगाम लगाने और उनका तेजी से निपटारा करने के लिए सात नई विशेष अदालतें स्थापित करने का फैसला भी लिया गया है. ये अदालतें मोहाली, जालंधर, लुधियाना, अमृतसर और पटियाला में खुलेंगी, जिससे मामलों की सुनवाई जल्दी पूरी हो सकेगी.
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भारत औद्योगीकरण के लिए कोयले की जगह सौर ऊर्जा का उपयोग करने वाला बन सकता है पहला देश : रिपोर्ट
नई दिल्ली, 31 मई (आईएएनएस)। भारत औद्योगीकरण के लिए कोयले की जगह सौर ऊर्जा का उपयोग करने वाला पहला देश हो सकता है। देश की सौर ऊर्जा क्षमता करीब 40 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है और मार्च 2026 तक 150 गीगावाट के अधिक हो गई है। यह जानकारी एक रिपोर्ट में दी गई।
जलवायु और पर्यावरण केंद्रित अमेरिकी न्यूज पोर्टल ग्रिस्ट ने येल ई360 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत गुजरात के कच्छ के रेगिस्तान में फैले विशाल सौर पैनलों के कारण यह क्षेत्र तेजी से दुनिया के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रों में से एक में परिवर्तित हो रहा है।
भारत-पाकिस्तान सीमा के पास लगभग 280 वर्ग मील में फैला खावड़ा सौर पार्क 2029 तक दुनिया की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा परियोजना बन सकता है।
एक बार पूरा होने पर, इस परियोजना में लगभग 6 करोड़ सौर पैनल लग जाएंगे और इससे 30 गीगावाट बिजली उत्पन्न होगी - जो ऑस्ट्रिया जितने बड़े देश को बिजली देने के लिए पर्याप्त है।
यह विशाल परियोजना सौर ऊर्जा की ओर भारत के बढ़ते कदम को दर्शाती है। देश की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता में प्रतिवर्ष लगभग 40 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है और मार्च में यह 150 गीगावाट को पार कर गई।
जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करते हुए बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के उद्देश्य से भारत ने 2030 तक इस क्षमता को फिर से दोगुना करने का लक्ष्य रखा है।
ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक एम्बर के ऊर्जा रणनीतिकार किंग्समिल बॉन्ड के अनुसार, भारत, चीन और पश्चिमी देशों से अलग राह पर चल रहा है, जिन्होंने अपनी अर्थव्यवस्थाओं का बड़ा हिस्सा जीवाश्म ईंधन पर टिकाया है।
बॉन्ड ने कहा, चीन ने कोयले पर अपनी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया; भारत सौर ऊर्जा पर निर्माण कर रहा है। उन्होंने आगे कहा कि भारत का मॉडल अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं को प्रेरित कर सकता है जो कार्बन उत्सर्जन में भारी वृद्धि किए बिना तीव्र विकास की तलाश में हैं।
भारत का तेज सौर ऊर्जा विस्तार महज एक दशक पहले की स्थिति से एक नाटकीय बदलाव को दर्शाता है, जब देश के ऊर्जा मिश्रण में सौर ऊर्जा की भूमिका सीमित थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि उस समय, जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ती वैश्विक चिंताओं के बावजूद, सरकार ने औद्योगिक विकास को समर्थन देने के लिए कोयला उत्पादन का पुरजोर समर्थन किया था।
2014 में सत्ता में आने के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 तक कोयला उत्पादन को दोगुना करने का संकल्प लिया था।
भारत ने यह तर्क देते हुए जलवायु शिखर सम्मेलनों में कोयले को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के अंतरराष्ट्रीय दबाव का विरोध किया कि विकासशील देशों को गरीबी कम करने और अपनी अर्थव्यवस्थाओं का विस्तार करने के लिए अभी भी जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता है।
हालांकि, सौर पैनलों की गिरती कीमतों और भारत की स्वाभाविक रूप से धूप वाली जलवायु ने धीरे-धीरे देश की ऊर्जा रणनीति को बदल दिया।
ग्लासगो में हुए कॉप26 जलवायु शिखर सम्मेलन के बाद से सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना में तीव्र गति आई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले वर्ष, भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों का योगदान पहली बार आधे से अधिक रहा।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार, अब से 2030 के बीच भारत की अतिरिक्त बिजली मांग का लगभग आधा हिस्सा सौर ऊर्जा से पूरा होने की उम्मीद है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शेष एक चौथाई हिस्सा पवन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा सहित अन्य कम कार्बन उत्सर्जन वाले स्रोतों से पूरा होने की संभावना है।
--आईएएनएस
एबीएस
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