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अमेरिका-ईरान युद्ध से महंगाई के कारण आमजन प्रभावित

भले ही 1970 के तेल संकट जैसे हालात होने की संभावना ना हो या 2008 जैसी वित्तीय मंदी के हालात ना हो फिर भी एक बात साफ है कि अमेरिका-ईरान के बीच करीब तीन माह से चल रहे युद्ध के नकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। चाहे एशिया के देश हो या फिर योरोपीय देश सभी केवल वैश्विक तनाव ही नहीं अपितु ईंधन आपूर्ति प्रभावित होने से बढ़ते दामों को रोकने में विफल ही हो रहे हैं। पिछले दस-पन्द्रह दिनों में ही हमारे देश में पेट्रोल- एलपीजी-सीएनजी- पीएनजी के दामों में एक बार नहीं अपितु तीन बार बढ़ोतरी हो चुकी है। हांलाकि वर्तमान हालातों में सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। विपक्ष चाहे लाख आरोप लगाये या आंदोलन-प्रदर्शन करें पर अंतरराष्ट्रीय हालातों से आंख नहीं मूंदनी चाहिए। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आमजन से आग्रह को भी इसी संदर्भ में सकारात्मकता से लिया जाना चाहिए। वैसे भी जब संकट का दौर हो और उस संकट के लिए हम या हमारी सरकार जिम्मेदार नहीं हो तो फिर देश में नकारात्मक माहौल बनाने के स्थान पर सकारात्मक माहौल बनाया जाना चाहिए। यह किसी एक व्यक्ति या किसी एक दल का नहीं अपितु सभी राजनीतिक दलों का दायित्व हो जाता है। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है। ईधन संकट का बड़ा कारण अमेरिका-ईरान युद्ध ना होकर अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण हार्मुज संकट बन गया है। हार्मुज के रास्ते से ही कच्चे तेल की आपूर्ति होती है और तनाव के चलते हार्मुज जनडमरुमध्य रास्ते को अवरुद्ध कर दिया गया है इससे आपूर्ति प्रभावित हो रही है। यह तो वैकल्पिक उर्जा के रुप में देश में सोलर, विण्ड एनर्जी के क्षेत्र में पिछले सालों में योजनावद्ध तरीके से तेजी से और बेहतर काम हुआ है और इसी का परिणाम है कि आज प्रधानमंत्री इलेक्ट्रोनिक वाहनों के उपयोग या सोलर एनर्जी के उपयोग पर खुले तौर पर आग्रह करने की स्थिति में है। नवीकरणीय उर्जा के क्षेत्र में देश में तेजी से काम हुआ है और हो रहा है जो एक हद तक संकट को कम करने में सहायक बन रहा है। 

आज की दुनिया आइसोलेट दुनिया नहीं है। एक देश की दूसरे देश पर निर्भरता बढ़ी है। कहीं से ईंधन के लिए तो कहीं से खाद्यान्न, कहीं दवा, कहीं अन्य किसी वस्तु के लिए निर्भरता बढ़ी है। युद्ध के चलते इंटरनेशनल लोजिस्टिक सेवाएं प्रभावित हुई है। जहां तक देश की ही बात की जाएं तो पेट्रोल, डीजल, एलपीजी आदि के कीमत में बढ़ोतरी का व्यापक प्रभाव पड़ने लगा है। सीधी सी बात है जब आवागमन महंगा होगा चाहे वह आम आदमी, सार्वजनिक क्षेत्र या लोजिस्टिक का हो तो उसका सीधा सीधा वस्तुओं और सेवाओं पर पड़ेगा ही। यही कारण है ईंधन यानी तेल के भावों में बढ़ोतरी के साथ ही वस्तुओं और सेवाओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। इसके साथ ही आयात पर निर्भर वस्तुओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। जहां तक तेल का प्रष्न है देश में खाद्य तेल ओैर अखाद्य तेल दोनों ही प्रभावित हो रहे हैं। खाद्य तेलों में भी आयात पर निर्भरता अधिक है। लाख प्रयासों के बावजूद तिलहन मिशन से तिलहनों का उत्पादन तो बढ़ा है पर अभी विदेशी निर्भरता बनी हुई ही है। इसी तरह से अन्य वस्तुओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। जहां तक सेवा क्षेत्र का प्रष्न है स्वीगी-जोमेटो आदि सेवा प्रदाताओं ने पिछले दिनों में अपने दामों में 16 फीसदी से भी अधिक की बढ़ोतरी कर दी है। मोबाइल सेवा प्रदाताओं ने प्लानों को रिवाइज किया हैं तो उबेर-ओला जैसे सेवा प्रदाताओं ने किराया बढ़ा दिया है। हो तो यहां तक रहा हैं कि बैंकों द्वारा जमाओं पर ब्याज दर में कमी लाना शुरु कर दिया है। 

इसे भी पढ़ें: आखिर क्या है Abraham Accords का असली मतलब, इस पर साइन करने वाले मुस्लिम देशों को क्या-क्या करना पड़ेगा?

एक बात साफ हो जानी चाहिए कि लोजिस्टिक लागत बढ़ेगी तो उसका असर सभी वस्तुओं में देखने को मिलेगा। भारत सरकार वेनेजुएला से वैकल्पिक तरीके से कच्चे तेल लाने का प्रयास कर रही है तो अन्य विकल्प भी खोजे जा रहे हैं। पर यह साफ हो जाना चाहिए कि कच्चे तेल की आपूर्ति जब तक सामान्य नहीं हो जाती तब तक पूरी तरह से संकट समाप्त होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इन वैश्विक हालातों के पीछे अमेरिका-ईरान की हठधर्मिता ही है। अमेरिका-इजरायल ने ईरान से लड़ाई शुरु करते समय रुस यूक्रेन युद्ध के हालातों से सबक नहीं लिया। रुस के सामने यूक्रेन पिद्दी सा देश होने के बावजूद आज तीन साल से भी अधिक समय होने के बावजूद निर्णायक स्तर पर नहीं पहुंचा है। पर अमेरिका ने यह सोचा था कि दो-तीन दिन में ही ईरान को घुटने टिकवा देंगे और यही अमेरिका की नासमझी रही। मानो या ना मानो पर वास्तविकता यह है कि आज अमेरिका के सामने अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने का संकट आ गया है और यही कारण है कि अंदरखाने अमेरिका और ट्रंप किसी भी तरह से सीज फायर के लिए प्रयासरत है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि युद्ध में नुकसान अमेरिका को ही अधिक हो रहा है। ईरान तो अपने घर से लड़ रहा है और उसके निशाने पर आसपास के देश है। ऐसे में स्टेक तो अमेरिका-इजरायल का ही हो जाता है। इसके अलावा एक बात और समझनी होगी कि ट्रंप 2 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने आये दिन तुगलकी फरमान जारी कर दुश्मन ही दुश्मन बनाएं है। गली के गुंडे जैसी पहचान बन गई है ट्रंप की तो दूसरी और अमेरिका के ही अधिकांश लोगों का भरोसा ट्रंप ने खो दिया है। ऐसे में सम्मानजनक सीजफायर ही अमेरिका के लिए अब इस संकट से निकलने का रास्ता रह गया है और इसके लिए ही अंदरखाने प्रयास जारी है। 

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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भारत में जानलेवा हुई गर्मी के साइड इफेक्ट्स समझिए, इसके कारण और बचाव के उपाय जानिए

हमारे देश का राजनीतिक तापमान तो वर्षपर्यंत उच्च रहता आया है और चुनावी इलाकों में इसके वैचारिक हीट स्ट्रोक से सिस्टम का झुलसना स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन जब मई-जून के महीने में मौसमी तापमान जानलेवा स्तर तक खतरनाक रूप से चढ़ता जाता है तो लोग बाग परेशान हो उठते हैं। फिर अपनी राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गलतियों पर पछतावा के अलावा कुछ नहीं मिलता, क्योंकि विकास के नाम पर आधुनिक भारतीय सभ्यता विनाश की ओर बढ़ती चली जा रही है और पश्चिमी शिक्षा प्राप्त हमारे हुक्मरान तमाशबीन बने बैठे हैं, क्योंकि हरेक आपदा को अवसरों में बदलकर  अपनी कमाई बढ़ाने का धंधा उन्होंने सीख लिया है। बेशक अपवाद भी होंगे, लेकिन अल्पमत में, जिनकी लोकतंत्र में कम कद्र होती आई है।

वहीं, भारत में बढ़ती खतरनाक गर्मी केवल “मौसमी बदलाव” नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, तेजी से शहरीकरण, जंगलों की कटाई और प्रदूषण का संयुक्त परिणाम बन चुकी है। हाल के वर्षों में उत्तर भारत, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत में 46°C–48°C तक तापमान दर्ज हुआ है।  मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश का एक बड़ा हिस्सा इस समय भट्ठी बना हुआ है। हमारे शहर हीट आइलैंड में तब्दील होते जा रहे हैं। उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक, ज्यादातर शहरों में औसत तापमान सामान्य से 3-5 डिग्री सेल्सियस ऊपर चल रहा है। कहीं कहीं तो पिछले 14-15 वर्षों के रिकॉर्ड टूट चुके हैं। कोढ़ में खाज यह कि फिलहाल राहत के संकेत नहीं है, क्योंकि अल-नीनो की वजह से मौसम आगे और कड़ी परीक्षा ले सकता है।

इसे भी पढ़ें: देशभर में आग उगल रहा आसमान, Severe Heatwave ने बढ़ाया Heat Stroke का खतरा, रात में भी पड़ रही भयंकर गर्मी, जीना हुआ मुहाल

अलबत्ता आप मानें या न मानें, लेकिन गर्मी की बढ़ती प्रवृति में भविष्य के लिए सबसे बड़ा संदेश छिपा हुआ है। वह यह कि यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो भारत में गर्मी केवल असुविधा नहीं बल्कि “राष्ट्रीय स्वास्थ्य और आर्थिक संकट” बन सकती है। लिहाजा, आने वाले वर्षों में जल संरक्षण, हरित विकास और स्वच्छ ऊर्जा ही सबसे बड़े समाधान होंगे। 

विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सीजन 27 अप्रैल और 19 मई दो ऐसे दिन रहे, जब धरती के सबसे ज्यादा गर्म 50 शहरों में सभी भारत के थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट हमें चेताती है कि देश के 50% से ज्यादा शहरों में भीषण गर्मी का खतरा 'अधिक' से लेकर 'बेहद अधिक' के स्तर तक पहुंच चुका है। और तो और, साल 2015 से 2020 के दरम्यान लू वाले दिनों का औसत 7.4 दिन से बढ़कर 32.2 दिन हो गया है, और यह लगातार बढ़ रहा है। इसका गहरा दुष्प्रभाव हमारी सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ने के आसार प्रबल हैं।

हमारे शहरों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं, क्योंकि वो अंधाधुंध विकास की होड़ में अपनी हरियाली उजाड़कर उन्हें कंक्रीट के जंगलों में तब्दील करते जा रहे हैं। लिहाजा, भारत में गर्मी अब हर साल एक नया रेकॉर्ड बना रही है। चिंताजनक बात यह है कि दिन तो तपते ही हैं, अब रातें भी तपने लगी हैं और राहत देने वाली नहीं रहीं। इस 20 मई को दिल्ली ने मई महीने में 13 साल की सबसे गर्म रात देखी, जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 5.2 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहा। 21 मई को स्थिति उससे भी ज्यादा बुरी हुई।इस प्रकार से हाल के बरसों में हीटवेव की तीव्रता, उसका समय और सीमा अभूतपूर्व रूप से बढ़े हैं। इससे शहरों पर संकट ज्यादा है, जो घटती हरियाली, बढ़ते कंक्रीट स्ट्रक्चर और प्रदूषण की वजह से अर्बन हीट आईलैंड इफेक्ट' झेल रहे हैं।

इससे हमारे कामकाज पर भी नकारात्मक असर पड़ चुका है, क्योंकि मौसम की यह मार दोतरफा है- सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ चुकी है। नैशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के मुताबिक, 2025 में हीट स्ट्रोक के सात हजार से ज्यादा सस्पेक्टेड केस सामने आए थे। हालांकि माना जाता है कि भारत में हीट स्ट्रोक और उससे होने वाली मौतों का सही आंकड़ा रिपोर्ट नहीं हो पाता। क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी मौसम का सीधा वार झेलती रहती है। इनमें गिग वर्कर्स, दिहाड़ी मजदूर, स्ट्रीट वेंडर्स वगैरह भी शामिल हैं। चूंकि घर बैठने से न इनका काम चलेगा और न अपने देश का। लिहाजा इस मौसम में ये सबसे ज्यादा जोखिम में ये लोग ही होते हैं। किसान और मजदूर भी इन्हीं जैसे होते हैं। ऐसे में इनकी सुरक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते है, जैसे सार्वजनिक शेल्टर, पेयजल की व्यवस्था और जहां संभव हो वहां काम के घंटों और चरित्र में बदलाव। इसे गंभीर चेतावनी के रूप में लिया जा सकता है। 

चूंकि बढ़ती हुई गर्मी से हमारी आपकी कार्यक्षमता पर सीधा असर पड़ता है, काम के घंटे कम होते हैं और प्रॉडक्टिविटी भी घट जाती है। लिहाजा यह बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है। एक आकलन के मुताबिक, यदि यही हाल रहा तो 2030 तक गर्मी की वजह से भारत की जीडीपी का 4.5 प्रतिशत प्रभावित होगा। ये सारे आंकड़े एक गंभीर चेतावनी हैं। चूंकि क्लाइमेट चेंज की वजह से मौसम के और बिगड़ने की आशंका है, इसलिए बेहतर रहेगा अगर हमलोग अपनी तैयारी पहले से कर लें।

# भारत में खतरनाक गर्मी बढ़ने के प्रमुख कारण जानिए

भारत में खतरनाक गर्मी बढ़ने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं- पहला, जलवायु परिवर्तन: धरती का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार मानव गतिविधियों से पैदा हुई ग्लोबल वार्मिंग ने भारत में हीटवेव को अधिक लंबा और तीव्र बना दिया है। दूसरा,  जंगलों की कटाई: पेड़ प्राकृतिक “कूलिंग सिस्टम” होते हैं। लिहाजा बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से नमी कम हो रही है, वर्षा चक्र प्रभावित हो रहा है, जमीन अधिक गर्म हो रही है। तीसरा, शहरी हीट आइलैंड प्रभाव :कंक्रीट, डामर, वाहन, एसी और उद्योग शहरों को “हीट ट्रैप” बना रहे हैं। शहर रात में भी गर्म बने रहते हैं। चौथा, प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसें: कोयला, पेट्रोल-डीजल, फैक्ट्रियों और वाहनों से निकलने वाली गैसें वातावरण में गर्मी रोकती हैं। पांचवां, कमजोर मानसून और एल-नीनो: एल-नीनो जैसी वैश्विक मौसमी घटनाएँ भारत में सूखा और गर्म हवाएँ बढ़ाती हैं। छठा, भूजल की कमी और सूखी जमीन जब मिट्टी में नमी कम होती है तो धरती तेजी से गर्म होती है। इससे लू और अधिक खतरनाक हो जाती है। सातवां, अनियोजित विकास: खुले मैदान कम होना, झीलों और तालाबों का खत्म होना, अत्यधिक कंक्रीट निर्माण इनसे स्थानीय तापमान तेजी से बढ़ रहा है।

# गर्मी से होने वाले खतरे को समझिए

गर्मी से होने वाले खतरे निम्नलिखित हैं:- हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हार्ट और बीपी की समस्या, बच्चों और बुजुर्गों में मृत्यु जोखिम, फसल नुकसान, बिजली और पानी संकट श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी, भारत में हीटवेव से स्वास्थ्य संकट तेजी से बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
 

# ये हैं व्यक्तिगत स्तर पर बचने के प्रमुख निदान 

व्यक्तिगत स्तर पर बचने के प्रमुख निदान इस प्रकार हैं- पहला, दोपहर में बाहर निकलने से बचें, विशेषकर 12 बजे से 4 बजे तक। दूसरा, पर्याप्त पानी पिएँ, ओआरएस, नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी। तीसरा, हल्के सूती कपड़े पहनें, गहरे रंग और टाइट कपड़ों से बचें। चौथा, शरीर को ठंडा रखें, सिर ढकें, छाता प्रयोग करें, गीला कपड़ा रखें। पांचवां, बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान, उन्हें बंद और गर्म कमरों में न रखें।

# हमें सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए

सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए- पहला, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण- यह सबसे सस्ता और प्रभावी उपाय है। दूसरा, तालाब और जलस्रोत बचाना: स्थानीय तापमान कम करने में मदद मिलती है। तीसरा, “कूल रूफ” अभियान: सफेद या परावर्तक छतें घरों को ठंडा रखती हैं। चौथा, शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना: पार्क ग्रीन कॉरिडोर, छायादार सड़कें। पांचवां, प्रदूषण नियंत्रण:  स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक परिवहन को बढ़ावा देना। छठा, हीट एक्शन प्लान: कई शहर अब हीट अलर्ट, कूलिंग सेंटर और स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ा रहे हैं।

- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक 

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  Sports

MI की Captaincy पर फैंस का बड़ा सर्वे, Rohit Sharma को पछाड़ Jasprit Bumrah बने नंबर वन

मुंबई इंडियंस के लिए इंडियन प्रीमियर लीग 2026 का सीजन बेहद निराशाजनक रहा और अब टीम की कप्तानी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। पांच बार की चैंपियन टीम इस बार पूरे सीजन में लय में नजर नहीं आई और 14 मुकाबलों में सिर्फ चार जीत हासिल कर सकी। टीम को 10 मैचों में हार का सामना करना पड़ा और वह लीग चरण से ही बाहर हो गई।

गौरतलब है कि लगातार खराब प्रदर्शन के बाद हार्दिक पांड्या की कप्तानी पर सवाल उठने लगे हैं। क्रिकेट जानकारों से लेकर प्रशंसकों तक, कई लोग अब मुंबई इंडियंस के अगले कप्तान को लेकर अपनी राय दे रहे हैं।

मौजूद जानकारी के अनुसार एक सर्वे में प्रशंसकों से पूछा गया कि इंडियन प्रीमियर लीग 2027 में मुंबई इंडियंस की कप्तानी किसे सौंपी जानी चाहिए। इस सर्वे में सबसे ज्यादा समर्थन तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह को मिला है। करीब 44 प्रतिशत प्रशंसकों ने बुमराह को अगले कप्तान के रूप में पसंद किया है।

बता दें कि इस सीजन में पंजाब किंग्स के खिलाफ एक मुकाबले में हार्दिक पांड्या और सूर्यकुमार यादव की गैरमौजूदगी में जसप्रीत बुमराह ने टीम की कप्तानी की थी। उस मुकाबले में मुंबई इंडियंस ने जीत हासिल की थी और बुमराह की कप्तानी की काफी तारीफ हुई थी।

मुंबई इंडियंस के पूर्व कप्तान रोहित शर्मा भी इस चर्चा में पीछे नहीं हैं। सर्वे में उन्हें 27 प्रतिशत से ज्यादा समर्थन मिला है। रोहित शर्मा की कप्तानी में ही मुंबई इंडियंस ने पांच बार इंडियन प्रीमियर लीग का खिताब जीता था और टीम को दुनिया की सबसे सफल क्रिकेट फ्रेंचाइजियों में शामिल किया था।

वहीं युवा बल्लेबाज तिलक वर्मा को 17 प्रतिशत और सूर्यकुमार यादव को करीब 10 प्रतिशत समर्थन मिला है। हालांकि ज्यादातर क्रिकेट जानकारों का मानना है कि मौजूदा समय में जसप्रीत बुमराह टीम के लिए सबसे संतुलित विकल्प साबित हो सकते हैं।

गौरतलब है कि हार्दिक पांड्या ने अपने इंडियन प्रीमियर लीग करियर की शुरुआत मुंबई इंडियंस से ही की थी। बाद में उन्हें वर्ष 2022 से पहले टीम ने रिलीज कर दिया था, जिसके बाद वह गुजरात टाइटंस के कप्तान बने। हार्दिक ने अपने पहले ही सीजन में गुजरात को चैंपियन बनाया और अगले साल टीम को फिर फाइनल तक पहुंचाया था।

इसके बाद वर्ष 2024 में हार्दिक पांड्या की मुंबई इंडियंस में वापसी हुई और उन्हें रोहित शर्मा की जगह कप्तान बनाया गया। लेकिन यह फैसला टीम के लिए ज्यादा सफल साबित नहीं हुआ। इंडियन प्रीमियर लीग 2024 में मुंबई इंडियंस अंक तालिका में सबसे नीचे रही थी।

हालांकि वर्ष 2025 में टीम ने कुछ सुधार जरूर दिखाया और अंतिम चार तक पहुंचने में सफल रही थी। मुंबई इंडियंस ने एलिमिनेटर मुकाबले में गुजरात टाइटंस को हराया था, लेकिन दूसरे क्वालीफायर में पंजाब किंग्स से हारकर बाहर हो गई थी।

इंडियन प्रीमियर लीग 2026 से मुंबई इंडियंस को बड़ी उम्मीदें थीं और माना जा रहा था कि टीम छह साल बाद खिताब जीत सकती है। लेकिन पूरे सीजन में टीम बल्लेबाजी, गेंदबाजी और रणनीति तीनों मोर्चों पर संघर्ष करती नजर आई। हार्दिक पांड्या भी कुछ मुकाबलों में उपलब्ध नहीं रहे थे।

अब टीम प्रबंधन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हार्दिक पांड्या को आगे भी कप्तानी दी जाएगी या फिर मुंबई इंडियंस नए नेतृत्व की तरफ बढ़ेगी। क्रिकेट जगत में फिलहाल जसप्रीत बुमराह का नाम सबसे मजबूत दावेदार के रूप में देखा जा रहा है।
Fri, 29 May 2026 23:32:25 +0530

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